Zoology Life History Of Fasciola

Zoology Life History Of Fasciola

 

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प्रश्न 1 – फैसिओला के जीवन-इतिहास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए और जीवन चक्र में पायी जाने वाली विभिन्न लारवा अवस्थाओं का महत्त्व समझाइए।

Describe the life-history of Fasciola and write the importance of different larval phases found in its life-cycle.

अथवा मिरासिडियम का नामांकित चित्र बनाइए।

Draw a labelled diagram of Miracidium.. 

अथवा यकृत वर्म के मिरासिडियम लारवा पर टिप्पणी कीजिए।

Write a note on Miracidium larva of Liver fluke. 

अथवा यकृतकृमि के किन्हीं तीन लारवा प्रावस्थाओं के नामांकित चित्र बनाद्वारा

Draw labelled diagrams of any three Larval stage Fasciola hepatica. 

उत्तर

फैसिओला का जीवन-इतिहास

 (Life – history of Fasciola) Notes

फैसिओला एक द्विपोषद ट्रिमेटोड है जिसका जीवन-इतिहास दो पोषदों में पूर्ण होता है। इसका प्राथमिक पोषद भेड़ या अन्य पशु तथा द्वितीय पोषद लिमनिया जाति का घोंघा है। इसका.जीवन-इतिहास जटिल होता है जिसमें अनेक लारवा अवस्थाएँ पायी जाती हैं।

मैथुन एवं निषेचन (Copulation and Fertilization)-इनमें पर-निषेचन होता है।

मैथुन परपोषी की पित्त वाहिनी में होता है निषेचन क्रिया अण्डवाहिनी के दूरस्थ सिरे में होती है। एक अकेला फैसिओला एक बार में लगभग 3,000 से 35,000 अण्डे उत्पन्न करता है और अपने जीवनकाल में लगभग दो लाख तक अण्डे उत्पन्न करता है।

प्रत्येक निषेचित अण्डे के चारों ओर पीतक कोशिकाएँ चिपक जाती हैं जिनसे उसे पातक और कवच पदार्थ प्राप्त होता है। कवच या कैप्सूल पीला या भरा और अण्डाकार होता है । जिस  पर एक ढक्कन (ऑपरकुलम) पाया जाता है।

विदलन तथा प्रारम्भिक परिवर्धन (Cleavage and primary Development) – विदलन गर्भाशय में ही आरम्भ हो जाता है। प्रथम विभाजन असमान कोशिकाएँ बनती हैं.

(i) बड़ी सोमैटिक या एक्टोडर्मल कोशिका जो विभाजित होकर लारवा की उपर्चम बनाती है।

(ii) छोटी प्रोपैगेटरी कोशिका जो विभाजित होकर दो प्रकार की सन्तति कोशिकाएं  बनाती है।

Zoology Life History Of Fasciola
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इनमें से एक प्रकार की सोमैटिक कोशिकाएँ अन्त में लारवा के शरीर का निर्माण करती हैं और दूसरे प्रकार की जनन या जर्म कोशिकाएँ लारवा के शरीर के पिछले भाग में एकत्र हो जाती हैं।

संपुटित या एनकैप्सुलेटेड (Encapsulated) – भ्रूण का गर्भाशय में इससे आगे परिवर्धन नहीं होता। कैप्सुल्स की एक बड़ी संख्या जनन छिद्र द्वारा बाहर निकल कर पित्त रस के साथ परपोषी की आंत्र में आ जाती है जहाँ से ये परपोषी के मल के साथ बाहर निकल आते हैं। कैप्सुल्स में आगे परिवर्धन उस समय होता है जब ये ऐसे जल या नम क्षेत्रों के सम्पर्क में आते हैं, जो कुछ अम्लीय होते हैं और जिनका तापमान 22°C से 25°C तक होता है। ऐसी परिस्थिति में एनकैप्सुलेटेड भ्रूण चार से पन्द्रह दिन के भीतर मिरासिडियम लारवा में बदल जाता है। यह अण्डे से बाहर आकर जल में तैरने लगता है। फैसिओला के जीवन-चक्र में निम्नलिखित लारवा प्रावस्थाएँ पायी जाती हैं –

  1. मिरासिडियम लारवा (Miracidium larva) – मिरासिडियम स्वतन्त्रजीवी लारवा है जिसका शरीर लम्बा तथा शंक्वाकार होता है। शरीर का अगला चौड़ा भाग उभर कर शीर्ष पाली या एपीकल लोब (apical lobe) बनाता है जिसके शीर्ष पर बहुकेन्द्रक, थैले के समान शीर्ष ग्रन्थियाँ (apical glands) तथा बहुत-सी एककोशिक पेनिट्रेशन ग्रन्थियों के छिद्रं होते हैं। शीर्ष-पाली को छोड़कर इनके समस्त शरीर पर सीलिया पाए जाते हैं। मस्तिष्क तथा दृष्टि बिन्दु शरीर के अगले भाग में स्थित होते हैं। लारवा के शरीर में एक जोडी प्रोटोनेफ्रीडिया तथा जनन कोशिकाओं के समूह होते हैं।

द्वितीयक पोषद का संक्रमण (Infection of Secondary host) – मिरासिडियम लारवा स्वतन्त्रतापूर्वक तैरकर अपने द्वितीयक पोषद लिमनिया अथवा प्लैनॉरबिस जाति के घोंघे को खोजता है। मिरासिडियम केवल 4 से 30 घण्टे तक जीवित रहता है। यदि इसे द्वितीयक पोषक नहीं मिलता तो वह नष्ट हो जाता है। घोंघे में पहुँचकर यह फफ्फस कोष या पल्मोनरी चैम्बर में से होता हुआ पाचन ग्रन्थि में पहुँचता है। अब इस पर से रोम लुप्त हो जाते हैं और यह स्पोरोसिस्ट में परिवर्तित हो जाता है।

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  1. स्पोरोसिस्ट लारवा (Sporocyst larva) — स्पोरोसिस्ट 0.7 मिमी लम्बी थैले क समान रचना है जिस पर क्यूटिकल का पतला आवरण होता है। इसके भीतर जनन कोशिकाएँ तथा प्रोटोनेफ्रीडिया एवं आहार नाल के अवशेष भी पाए जाते हैं। मिरासिाडया लारवा के अन्य अंग नष्ट हो जाते हैं। जनन कोशिकाएं विभाजित होकर रेडिया लारवा बनाती हैं, परन्तु कभी-कभी सन्तति स्पोरोसिस्ट भी बनते हैं।
  2. रेडिया लारवा (Redia larva)-यह लगभग 1.3 मिमी से 1.6 मिमी लम्बा तथा बेलनाकार लारवा होता है और स्पोरोसिस्ट के फटने पर बाहर निकलता है। यह पतली क्यूटिकल की पर्त से ढका रहता है। अगले सिरे पर छोटा-सा मुख द्वार होता है जो पेशीयुक्त ग्रसनी में खुलता है। ग्रसनी की दीवार में बहुत-सी एककोशिक ग्रसनी ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं। इनके पीछे आंत्र होती है किन्तु गुदाद्वार नहीं होता। ग्रसनी के कुछ पीछे शरीर के अगले सिरे के निकट तक पेशीयुक्त पट्टी के समान कॉलर होता है और ठीक उसके पीछे जनन छिद्र पाया जाता है। शरीर के पिछले सिरे पर एक जोड़ी पार्श्व प्रवर्ध या लैपेट्स (lappets) निकले रहते हैं। शरीर के भीतर पैरेन्काइमा होता है जिसमें जनन-कोशिकाएँ तथा शाखान्वित शिखा कोशिकाएँ पायी जाती हैं। प्रोटोनेफ्रीडिया एक जोड़ी उत्सर्जी छिद्रों द्वारा बाहर खुलते हैं तथा जनन कोशिकाएँ विभाजित होकर ग्रीष्मकाल में सन्तति रेडिया तथा अन्य ऋतुओं में यह 14 से 20 सरकेरिया लारवा को जन्म देती हैं।
  3. सरकेरिया लारवा (Cercaria larva)-सरकेरिया लारवा का शरीर चपटा हृदयाकार होता है जिसके पिछले सिरे से एक लम्बी, लचीली पूँछ निकलती है। शरीर पर क्यूटिकल का पतला आवरण होता है जिसमें पीछे की ओर को निकले हुए बहुत-से काँटे पाए जाते हैं। शरीर के अगले भाग में मुख, पेशीय ग्रसनी, छोटी-सी ग्रासनली तथा द्विखण्डित आंत्र होती है। मुख को घेरे हुए मुख चूषक तथा आंत्र की दोनों भुजाओं के बीच अधर चूषक (ventral sucker) स्थित होता है। आन्तरिक गुहा में असंख्य जनन कोशिकाएँ, ज्वाला कोशिकाएँ तथा उत्सर्जन वाहिनियाँ (excretory ducts) पायी जाती हैं। उत्सर्जन वाहिनियाँ मूत्राशय या ब्लैडर में खुलती हैं। मूत्राशय से एक छोटी-सी उत्सर्जन वाहिनी निकलकर बाहर खुलती है। इसका उत्सर्जी छिद्र पूँछ के आधार पर स्थित होता है। देहभित्ति के नीचे बहत-सी सिस्टोजीनस ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं। इनसे स्रावित पदार्थ लारवा के चारों ओर सिस्ट का निर्माण करता है, जिसके पश्चात् सरकेरिया मेटासरकेरिया में बदल जाता है।
  4. मेटासरकेरिया (Metacercaria)-यह लगभग गोल होता है तथा इसके चारों ओर क्यूटिकल का मोटा आवरण होता है, जो सिस्ट बनाता है। इसके सरकेरिया में पायी जाने वाली सिस्टोजीनस ग्रन्थियाँ नष्ट हो जाती हैं तथा शिखा कोशिकाओं की संख्या अधिक हो जाती है।

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प्रथम पोषद का संक्रमण (Infection of the Primary or Final host)-भेड़ के द्वारा जलीय पौधों को खाने पर परजीवी का मेटासरकेंरिया भोजन के साथ आंत्र में पहुँचता है। आंत्र में सिस्ट पाचक रसों के प्रभाव से घुल जाती है और परजीवी स्वतन्त्र हो जाता है। यकृत निवाहिका तत्र (Hepatic Portal System) के साथ यह यकृत में पहुँचता है तथा पित्त वाहिनी में अपना जीवन व्यतीत करता है।

फैसिओला के जीवन-चक्र में विभिन्न लारवा अवस्थाओं का महत्त्व

 (Importance of various Larval Stages in Life-cycle of Fasciola)

Notes Question Answer

  1. जननों का एकान्तरण या मेटाजेनेसिस या हेटरोगैमी (Alternation of generations or Metagenesis or Heterogamy)-यह माना जाता है कि प्रौढ़ लीवर फ्लूक (फैसिओला) लैंगिक पीढ़ी को प्रदर्शित करता है तथा विभिन्न लारवा अवस्थाएँ (स्पोरोसिस्ट, रेडिया तथा सरकेरिया इत्यादि) अनिषेकजनन (parthenogenesis) की पीढ़ियाँ हैं। इन दोनों पीढ़ियों में एकान्तरण पाया जाता है। इस मत के अनुसार फैसिओला में जननों का एकान्तरण पाया जाता है, क्योकि इसमें एक लैंगिक पीढ़ी और कई अनिषेकजनन प्रावस्थाओं में एकान्तरण होता है। इस प्रकार यह हेटरोगैमी प्रदर्शित करता है। अब इस सिद्धान्त की मान्यता समाप्त हो चुकी है, क्योंकि इसमें प्रौढ़ तथा लारवा में पायी जाने वाली समानताएँ महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।
  2. बहुभ्रूणता (Polyembryony) – इसके अनुसार जनन कोशिकाओं में बनी फैसिओला की विभिन्न लारवा अवस्थाओं को अलैंगिक वर्धन का एक स्वरूप माना गया है। रेडिया तथा सरकेरिया का वर्धन बहुभ्रूणता प्रदर्शित करता है।
  3. परिवर्धित कायान्तरण (Extended metamorphosis)-इसके अनुसार लारवा का अलैंगिक वर्धन इस प्रकार का कायान्तरण है जिससे परजीवी अपने पोषक तक पहुँच सकने में समर्थ हो जाएँ।
  4. उन्नत लारवा अवस्थाएँ (Advanced Larval stages)-लारवा में देहगुहा, संवेदी अंग एवं चलन अंग होते हैं। मिरासिडियम एवं सिस्टीसर्कस प्रौढ़ की तुलना में अधिक उन्नत होते हैं। परजीवी जीवन के कारण, प्रौढ़ कई प्रकार से अपघटित होते हैं।
  5. जीवन-चक्र में जटिलता (Complex Life-cycle)-अनेक लारवा अवस्थाओं की उपस्थिति के कारण फैसिओला का जीवन-चक्र जटिल होता है। यह दो पोषदों में पूरा होता है। इसमें से भेड़ प्राथमिक पोषद तथा स्वच्छ जलीय घोंघा द्वितीयक पोषद है। ऐसे परजीवी जिनका जीवन-चक्र दो पोषकों में पूरा होता है, द्विपरपोषी (digenetic) कहलाते हैं।
  6. जनन की उच्च दर (High Rate of Reproduction)-फैसिओला अपन जीवन-चक्र में 2 लाख से भी अधिक अण्डे उत्पन्न करता है। अण्डों से मिरासिडियम लारवा विकसित होते हैं। ये स्पोरोसिस्ट (sporocysts) में विकसित होते हैं। प्रत्येक स्पोरोसिस्ट से 5-8 रेडिया बनते हैं। प्रत्येक रेडिया से द्वितीय पीढ़ी के 8-12 रेडिया बनते हैं तथा इनमें से प्रत्येक से 14-20 सरकेरिया बनते हैं। इस प्रकार एक अण्डे से 1,000 से 2,000 तक सरकेरिया बनते हैं, किन्तु इनमें से कुछ ही जीवित रहते हैं और शेष नष्ट हो जाते हैं।
  7. मृत्यु की सम्भावनाएँ (Chances of death)-लम्बे जीवन-चक्र एवं लारवाओं की उपस्थिति के कारण परजीवी के नष्ट होने की सम्भावनाएँ हैं। सर्वप्रथम पोषद के मल के साथ बाहर निकले भ्रूण (encapsulated embryos) को उग्र वातावरण का सामना करना पड़ता है। ये केवल एक उचित ताप, pH एवं नमी में ही विकसित होने में समर्थ होते हैं। अण्डों से निकले मिरासिडियम लारवा केवल द्वितीयक पोषद (स्वच्छ जलीय स्नेल) के कोमल ऊतकों में ही परिवर्धन करने में समर्थ होते हैं। 24 घण्टे से अधिक विलम्ब होने पर ये नष्ट हो जाते हैं। द्वितीयक पोषद के चारों ओर के जल में निकले सरकेरिया लारवा को अनेक विपदाओं का सामना करना पड़ता है। मेटासरकेरिया में . परिवर्तित होने से पूर्व ही कशेरुकी के शरीर में पहुँचने पर उसकी आहार नाल में इनका पाचन हो जाता है। अधिक समय तक प्राथमिक पोषद के उपलब्ध न होने पर मेटासरकेरिया नष्ट हो जाते हैं।

फैसिओला अपना जीवन-चक्र दो पोषदों में व्यतीत करता है तथा नये पोषदों को खोजने में परजीवी के जीवन को पर्याप्त भय रहता है। हजारों मिरासिडियम में से कुछ ही उचित द्वितीयक पोषद में पहुँच पाते हैं। शेष सभी पोषद को खोजने का प्रयत्न करते हुए मार्ग में ही नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार बहुत-से मेटासरकेरिया में से केवल कुछ ही भेड़ में पहुँच पाते हैं। बहुत-से .. सरकेरिया तथा रेडिया घोंघे के नष्ट होने के साथ ही नष्ट हो जाते है। अत: प्रत्येक कदम पर . परजीवी को नष्ट होने का भय है रहता । इस भय को दूर करने के लिए तथा जाति की स्थिरता के लिए परजीवी की जनन क्षमता अत्यधिक बढ़ी हुई होती है तथा उसके लारवा में भी अलैंगिक वर्धन होता है। इसीलिए लम्बा तथा जटिल जीवन-चक्र परजीविता के अनुरूप अनुकूलन है।

 


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