Discuss Various Filters Avoid Ripples Notes

Discuss Various Filters Avoid Ripples Notes

Discuss Various Filters Avoid Ripples Notes:-Transistor biasing circuits base bias, emitter bias, and voltage divider .bias, D.C. load line. Basic A.C. equivalent circuits, low-frequency model, small-signal amplifiers, common emitter amplifier, common collector amplifiers, and common base amplifiers, current and voltage gain, R.C. coupled amplifier, gain, frequency response, the equivalent circuit at low medium and high frequencies, feedback principles.

 

प्रश्न 18. फिल्टर परिपथ क्या होता है? एक दिष्टकारी के निर्गत परिपथ में फिल्टर की क्या उपयोगिता है? ऊर्मिकाएँ दूर करने के लिए विभिन्न फिल्टरों का वर्णन कीजिए। 

What is a filter circuit? What are the advantages of a filter in the output circuit of a rectifier? Discuss the use of various filters to avoid ripples. 

 

उत्तर : फिल्टर परिपथ (Filter circuit)—किसी दिष्टकारी का निर्गत वोल्टेज (अथवा धारा) एकदिशीय तो होता है, परन्तु स्पन्दमान भी होता है अर्थात् इसका आयाम घटता- बढ़ता रहता है। इसको एक दिष्ट वोल्टेज तथा प्रत्यावर्ती वोल्टेज अवयवों (ऊर्मिकाओं) से मिलकर बना माना जा सकता है। इलेक्ट्रॉनिक’ परिपथों में नियत आयाम की दिष्ट धारा की आवश्यकता होती है। अत: दिष्टकारी के निर्गत वोल्टेज (अथवा धारा) में से ऊर्मिकाओं को अलग करना आवश्यक है। हम दिष्टकारी तथा लोड के बीच में चोक कुण्डलियों तथा संधारित्रों से मिलकर बने विद्युत परिपथ को लगाकर ऐसा कर सकते हैं। इस तरह के परिपथ को फिल्टर परिपथ अथवा समकारी परिपथ (smoothing circuit) कहते हैं। फिल्टर अनेक प्रकार के होते हैं |

 

  1. पार्श्व संधारित्र फिल्टर (Shunt Capacitor Filter) सबसे सरल फिल्टर एक संधारित्र को दिष्टकारी तथा लोड के बीच लोड के समान्तर-क्रम में जोड़कर प्राप्त किया जा सकता है [चित्र-50 (a)]। हम जानते हैं कि संधारित्र अपने सिरों पर लगे वोल्टेज में परिवर्तन का सदैव विरोध करता है। यदि वोल्टेज बढ़ता है तो यह अपनी प्लेटों के बीच जातरिक्त स्थिर विद्युत ऊर्जा का संचय कर लेता है और यदि वोल्टेज घटता है तो यह ऊर्जा कोनिरावेशन धारा में बदलकर वोल्टेज को घटने से रोकता है। संधारित्र का यही गण क्रिया में प्रयुक्त होता है।

 

Transistor biasing circuits base bias, emitter bias, and voltage divider .bias, D.C. load line. Basic A.C. equivalent circuits, low-frequency model, small-signal amplifiers, common emitter amplifier, common collector amplifiers, and common base amplifiers, current and voltage gain, R.C. coupled amplifier, gain, frequency response, the equivalent circuit at low medium and high frequencies, feedback principles.
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दिष्टकारी में प्राप्त स्पंदमान (pulsating) निर्गत वोल्टेज (rectified outputy चित्र-50 (b) में दिखाया गया है। संधारित्र की क्रिया चित्र-50 (c) में दिखाई गई है। संधारित्र प्रथम चौथाई-चक्र के अन्त तक, दिष्टकृत निर्गत वोल्टेज के शिखरमान तक आवेशित हो जाता है (बिन्दु p)। इसके बाद में अर्द्धचक्र में जब दिष्टकारी का निर्गत वोल्टेज घटकर शून्य हो जाता है तथा फिर बढ़ता है, तब संधारित्र धीरे-धीरे (चरघातांकी रूप से) लोड के द्वारा निरावेशित (discharge) हो जाता है। इस निरावेशन को चित्र-50 (c) में pq से दिखाया गया है। बिन्दुःq पर संधारित्र फ़िर से आवेशित होने लगता है तथा बिन्दु,r तक पहुँचकर दिष्टकृत निर्गत वोल्टेज (rectified output) के शिखर मान तक आवेशित हो जाता है। पुनः बिन्दु तक पहुँचकर यह निरावेशित हो जाता है। यही क्रम चलता रहता है। इस प्रकार संधारित्र के सिरों के बीच वोल्टेज (अर्थात् लोड के सिरों के बीच वोल्टेज) चित्र-50 (c) में खींचे मोटे वक्र की तरह स्पंदमान (घटता-बढ़ता) है। यह स्पंदन दिष्टकारी से प्राप्त वोल्टेज चित्र-50 (b) का तुलना में काफी कम है। यदि फिल्टर का कालांक (time constant, CRT) अधिक है ता संधारित्र बहुत धीरे-धीरे निरावेशित होता है तथा लोड के सिरों के बीच औसत दिष्ट वाल्टन (d.c. voltage) दिष्टकारी के निर्गत वोल्टेज के शिखर मान के लगभग बराबर होता है।

 

साधारण संधारित्र फिल्टर अधिक धारा देने वाले (अर्थात् कम लोड प्रतिरोध वाल) सिकारी में प्रयुक्त नहीं होता क्योंकि इस दशा में संधारित्र अधिक सीमा तंक निरावाशाजाता है तथा फिल्टर की क्रिया कम हो पाती है।

 

2.श्रेणी प्रेरक फिल्टर (Series inductor Filter)-दिष्टकारी तथा लोड प्रति के श्रेणीक्रम में एक प्रेरक जोड़कर भी ऊर्मिकाओं को कम किया जा सकता है |चित्र-51(a हम जानते हैं कि प्रेरक कुण्डली अपने में से होकर बहने वाली भाग में परिवर्तन का करती है। जब धारा बढ़ती है तो यह अपने चुम्बकीय क्षेत्र में अतिरिकर्जा का संच लेती है और जब धारा घटती है तो चुम्बकीय क्षेत्र से ऊर्जा लेकर धाराको घटने से रोकती है |

 

इस प्रकार श्रेणीक्रम में लगी प्रेरक कुण्डली दिष्टकारी से प्राप्त धारा के स्पंदनों को बहुत घटा देती है [चित्र-51 (b)]।

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श्रेणीक्रम में लगे प्रेरक की क्रिया पर एक अन्य प्रकार से भी विचार किया जा सकता है। प्रेरक दिष्ट धारा के मार्ग में बहुत कम प्रतिरोध (केवल कुण्डली का प्रतिरोध) लगाता है, परन्तु प्रत्यावर्ती ऊर्मिकाओं पर उच्च प्रतिबाधा (w L) लगाता है, अत: यह दिष्ट धारा को जाने देता है, परन्तु ऊर्मिकाओं को रोक लेता है।

 

एक अकेले प्रेरक द्वारा फिल्टर किया हुआ औसत दिष्ट वोल्टेज, संधारित्र फिल्टर द्वारा प्राप्त वोल्टेज से कम होता है, परन्तु लोड धारा में वृद्धि से उतना वोल्टेज पतन नहीं होता जितना कि संधारित्र फिल्टर के साथ होता है।

  1. प्रेरक-संधारित्र फिल्टर (L-C Filter)-व्यावहारिक फिल्टर वोल्टेज समकारी संधारित्र फिल्टर तथा धारा समकारी प्रेरक फिल्टर के संयोग से बनाया जाता है। इस प्रकार के फिल्टरों के विभिन्न संयोग उपलब्ध हैं। यदि फिल्टर का पहला अवयव दिष्टकारी के श्रेणीक्रम में जुड़ा एक प्रेरक है, तब इसे चोक निवेशी फिल्टर (choke input filter) अथवा L-सेक्शन फिल्टर (L-section filter) कहते हैं, परन्तु यदि फिल्टर का पहला अवयव दिष्टकारी के समानान्तर जुड़ा एक संधारित्र है, तब इसे संधारित्र निवेशी फिल्टर (capacitor input filter) अथवा Pie-सेक्शन फिल्टर (T-section filter) कहते हैं।

 

L-सेक्शन अथवा चोक निवेशा फिल्टर (L-Section or Choke input Filter) – चित्र-52 में एक L-सेक्शन (चोक निवेशी) फ़िल्टर दिखाया गया है। प्रेरक L, दिष्टकारी से निर्गत धारा u (rectified current) से दिष्ट (d.c.) अवयव को जाने देता है, परन्तु प्रत्यावर्ती (a.c.) अवयवों को उच्च प्रतिबाधा (OL) के द्वारा जाने से रोकता है। इन प्रत्यावर्ती अवयवों का जो भाग प्रेरक से होकर निकल भी जाता है, वह संधारित्र C के उपमार्ग (by-pass) द्वारा वापस हो जाता है

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(लोड में नहीं जा पाता) क्योंकि संधारित्र प्रत्यावर्ती धारा के लिए बहुत निम्न प्रतिबाधा (1/OC) उत्पन्न करता है, जबकि दिष्ट धारा को अपने से होकर नहीं जाने देता। अतः लोड में जाने वाली धारा लगभग स्थायी. (steady) होती है। इस प्रकार के दो अथवा अधिक क्रम जोड़कर धारा को और अधिक स्थायी बनाया जा सकता है।

 

संधारित्र C के सिरों पर और इस प्रकार लोड के सिरों पर निर्गत d.c. वोल्टेज का मान दिष्टकारी से प्राप्त निर्गत वोल्टेज के शिखर मान से कुछ कम होता है। इसका कारण यह है कि प्रेरक L लोड की उपस्थिति में संधारित्र C को वोल्टेज के शिखर मान तक आवेशित नहीं होने देता। केवल इस थोड़े से वोल्टेजपतन को छोड़कर चोक निवेशी फिल्टर से प्राप्त d.c. वोल्टेज लोड धारा के विभिन्न मानों के लिए लगभग एकसमान रहता है। इस प्रकार इस फिल्टर का वोल्टेज नियन्त्रण (voltage regulation) काफी अच्छा होता है।

 

चोक निवेशी फिल्टर का प्रयोग अधिक धारा वाली पावर सप्लाई में किया जाता है।

pie-सेक्शन अथवा संधारित्र निवेशी फिल्टर (T-Section or Capacitor Input Filter)-इस प्रकार का फिल्टर चित्र-53 में दर्शाया गया है। सर्वप्रथम दिष्टकारी से निर्गत वोल्टेज (rectified output) संधारित्र को अपने +शिखर मान तक आवेशित करता है। उत्तरोत्तर वोल्टेज स्पन्दों के बीच तथा संधारित्र C के सिरों के बीच

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वोल्टेज, प्रेरकत्व L तथा लोड के माध्यम से थोड़ा-सा निरावेशन होने के कारण कुछ गिर जाता है, परन्तु फिर भी यह शिखर मान के आस-पास ही बना रहता है। धारा में बचे a.c. अवयवों में से कुछ प्रेरकत्व L द्वारा रोक लिए जाते हैं तथा कुछ संधारित्र C2 के उपमार्ग से वापस लौट जाते हैं। इस प्रकार के कई फिल्टरों को श्रेणी में जोड़कर धारा को और अधिक समकारी (smoothing) किया जा सकता है।

संधारित्र निवेशी फिल्टर में लोड के सिरों के बीच उपलब्ध d.c. वोल्टेज चोक निवेशी फिल्टर की तुलना में अधिक होता है; परन्तु वोल्टेज नियन्त्रण की दृष्टि से चोक निवेशी फिल्टर – श्रेष्ठ होता है। संधारित्र निवेशी फिल्टर से प्राप्त d.c. वोल्टेज लोड धारा में वृद्धि होने पर घट जाता है।

संधारित्र निवेशी फिल्टर का प्रयोग कम धारा वाली पावर सप्लाई में किया जाता है।


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