BSC Physics Define Rectifier Notes
BSC Physics Define Rectifier Notes:-Transistor biasing circuits base bias, emitter bias, and voltage divider .bias, D.C. load line. Basic A.C. equivalent circuits, low-frequency model, small-signal amplifiers, common emitter amplifier, common collector amplifiers, and common base amplifiers, current and voltage gain, R.C. coupled amplifier, gain, frequency response, the equivalent circuit at low medium and high frequencies, feedback principles.
प्रश्न 15. अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी की दक्षता तथा उर्मिका गुणांक के लिए व्यंजक व्युत्पन्न कीजिए।
उत्तर : दिष्टकारी (Rectifier)— एक ऐसी युक्ति है जो प्रत्यावर्ती धारा (अथवा वोल्टेज) को दिष्ट धारा (अथवा वोल्टेज) में परिवर्तित करती है, दिष्टकारी कहते हैं।
p-n सन्धि डायोड जब अग्र-अभिनत (forward biased) होता है तो धारा-प्रवाह के लिए इसका प्रतिरोध बहुत निम्न होता है, परन्तु उत्क्रम-अभिनत (reverse biased) होने पर इसका प्रतिरोध बहुत उच्च हो जाता है। इस प्रकार, यह धारा को केवल एक ही दिशा में अनुमत करता है, अर्थात् यह दिष्टकारी की भाँति कार्य करता है।
p-n सन्धि डायोड अर्द्ध— तरंग दिष्टकारी (p-n Junction Diode as Half Wave Rectifier)-यदि किसी p-n सन्धि डायोड के सिरों के बीच प्रत्यावर्ती (a.c.) वोल्टेज लगाएँ तो डायोड में धारा, वोल्टेज के केवल धनात्मक अर्द्ध-चक्रों (positive half-cycles) के दौरान ही प्रवाहित होगी। अत: एक अकेला सन्धि डायोड ‘अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी’ (half wave rectifier) का कार्य करता है।
p-n सन्धि डायोड का अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी परिपथ चित्र-46 (a) में तथा इसके निवेशी व निर्गत तरंग-रूपों (waveforms) को चित्र-46 (b) में दर्शाया गया है। प्रत्यावर्ती निवेशी वोल्टेज को एक उच्चायी ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक कुण्डली के सिरों P1 व P2 के बीच लगाया गया है, जिसकी द्वितीयक कुण्डली S1S2 है। द्वितीयक कुण्डली का एक सिरा S1 सन्धि डायोड के p-सिरे से जोड़ा गया है तथा दूसरा सिरा S एक लोड-प्रतिरोध R, के द्वारा डायोड के n-सिरे से जोड़ा गया है लोड RL के सिरों पर दिष्ट निर्गत वोल्टेज प्राप्त किया जा सकता है।
कार्य-विधि (Working)-a.c. वोल्टेज के पहले अर्द्ध-चक्र के दौरान, माना द्वितीयक का सिरा S1 धनात्मक है तथा सिरा S2 ऋणात्मक है। सन्धि डायोडं अग्र-अभिनत है। अतः लोड RL में धारा तीरों द्वारा प्रदर्शित दिशा में प्रवाहित होती है। यह धारा लोड के सिरों के बीच, निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के अर्द्ध-चक्र के रूप का ही निर्गत वोल्टेज स्थापित करती है। a.c. वोल्टेज के दूसरे अर्द्ध-चक्र के दौरान, द्वितीयक कुण्डली का सिरा S1 ऋणात्मक तथा सिरा S2 धनात्मक होता है। अब सन्धि डायोड उत्क्रम-अभिनत हो जाता है तथा धारा को अनमत नहीं करता। अत: परिपथ में धारा लगभग शून्य होती है तथा RL के सिरों के बीच निर्गत वोल्टेज भी लगभग शून्य होता है। यही प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है। स्पष्ट है कि अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी में निर्गत धारा एकदिशीय (unidirectional), परन्तु आन्तरायिक (intermittent) तथा स्पन्दमान (pulsating) होती है। चित्र-46 (b) के निचले भाग में धारा का तरंग-रूप दर्शाया गया है जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर धारा के एकदिशीय स्पन्द दिखाई देते हैं।
चूँकि निर्गत धारा निवेशी वोल्टेज तरंग के केवल अर्द्ध भाग में होती है, अत: इस प्रक्रिया को ‘अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी‘ कहते हैं।
ऊर्मिका गुणांक (Ripple Factor)-दिष्टकारी से निर्गत धारा अथवा. वोल्टेज एकदिशीय तो होती है परन्तु स्थायी.नहीं होती। यह स्पन्दमान होती है। निर्गत धारा के फोरियर विश्लेषण (Fourier analysis) से पता चलता है कि इसमें i0/ Pie परिमाण का दिष्ट-धारा अवयव (d.c. component) तथा w, 2w, 4w,… आवृत्तियों के प्रत्यावर्ती-धारा अवयव (a.c. components) विद्यमान हैं; जबकि निर्गत धारा का शिखरमान है तथा w निवेशी आवृत्ति हैं प्रत्यावर्ती अवयवों को ‘ऊर्मिकाएँ’ (ripples) कहते हैं। इन ऊर्मिकाओं के संगत निर्गत वोल्टेज अवयव को ‘ऊर्मिका वोल्टेज‘ कहते हैं।
निर्गत धारा अथवा वोल्टेज के स्थायित्व से विचलन को ऊर्मिका गुणांक (ripple factor)r से व्यक्त करते हैं
ऊर्मिका गुणांक का मान 1 से अधिक है। अत: अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी a.c. को d.c. में बदलने के लिए उपयुक्त नहीं है।
Sir, mere ko bsc 2nd year ke notes chahiye
Sir, mere ko bsc 2nd year ke electronics ke notes chahiye