BSC Organic Chemistry Benzene structure Notes

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BSC Organic Chemistry Benzene structure Notes:-

 

खण्ड ‘इ’ : विस्तृत उत्तरीय प्रश्न?

प्रश्न 13. बेन्जीन की संरचना, केकुले संरचना के पक्ष में प्रमाण व कमियाँ तथा अनुनाद सूत्र का वर्णन कीजिए। अथवा बेन्जीन की संरचना की विवेचना कीजिए।

अथवा (क) बेन्जीन की संरचना में निम्नलिखित को समझाइए –

(i) आण्विक सूत्र असंतृप्त प्रवृत्ति प्रदर्शित करता है। 

(ii) ब्रोमीन जल या क्षारीय KMnO4, विलयन का प्रभाव।

(iii) केकुले सूत्र की कमियाँ। (ख) बेन्जीन संरचना की आधुनिक संकल्पनाओं का वर्णन कीजिए। 

उत्तर : बेन्जीन की संरचना— बेन्जीन की विशिष्ट संरचना को समझने के लिए समय-समय पर अनेक वैज्ञानिकों ने उसकी संरचना के विभिन्न पहलुओं को समझाने का प्रयास किया, जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है—

(i) आण्विक सूत्र (Molecular Formula)- तत्वों के विश्लेषण और अणु भार निर्धारण द्वारा बेन्जीन का आण्विक सूत्र CH: स्थापित होता है। इस आधार पर बेन्जीन एक असंतृप्त यौगिक होना चाहिए।

(ii) बेन्जीन का हैलोजेनीकरण एवं उत्प्रेरकीय हाइड्रोजनीकरण संभव है और इससे 6 हाइड्रोजन परमाणु या हैलोजेन परमाणु योग करते हैं। यह ओजोन के साथ योग करके ट्राइओजोनाइड बनाती है।

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इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि बेन्जीन में तीन द्विआबन्ध हैं, परन्तु ये द्विआबन्ध ऐलिफैटिक यौगिकों के समान नहीं हैं।

(iii) बेन्जीन 1% क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट (बायर अभिकर्मक) से ऑक्सीकृत नहीं होती और HX के साथ योग भी नहीं करती। इसके विपरीत यह हैलोजेनवाहक की उपस्थिति में प्रतिस्थापन अभिक्रिया देती है। अत: बेन्जीन की असंतप्तता ऐलिफैटिक यौगिकों की असंतप्तता से भिन्न होनी चाहिए।

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर CH: सूत्र से संभव निम्न विवृत संरचनाओं को निरस्त कर दिया गया

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केकुले सूत्र उपर्युक्त प्रमाणों को ध्यान में रखते हुए 1865 में केकुले ने क बेन्जीन अणु में छ: कार्बन परमाणुओं की एक चक्राय संरचना होती है जिसमे एकान्तर कर्म में एकल तथा द्वि-आबन्ध होते हिया बन परमाणुओं की एक चक्रीय संरचना होती है

 

केकले सूत्र की कमियाँकेकुले सूत्र की कमियों को निम्लिखित  बिन्दुओ के मध्यम से समझ सकते हैं

  • द्विआबन्धों की प्रकृति (Nature of double bonds) बेन्जी कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध सामान्य ऐलिफैटिक कार्बन-कार्बन द्विआबन्धों से मिल को निम्न प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है—

(i) बेन्जीन 5% Br, के CClu में विलयन को व 1% क्षारीय KMRA, (बायर अभिकर्मक) को रंगहीन नहीं करती है।

(ii) बेन्जीन हैलोजेन अम्लों (HX) व हाइपोहैलस अम्लों (HOX) के साथ ही अभिक्रिया नहीं देती है।

  • केकुले की संरचना, बेन्जीन में तीन द्विआबन्धों की उपस्थिति के उपरान्त भी उसके विशेष स्थायित्व को समझाने में असमर्थ है।
  • C–C आबन्धों की लम्बाई-बेन्जीन की केकुले संरचना के आधार पर C-CG आबन्ध की लम्बाई54 A तथा C=C आबन्ध की लम्बाई 1.34 A होनी चाहिए जबकि बेन्जीन में सभी छ: कार्बन-कार्बन आबन्धों की लम्बाई समान 1.39 A है।
  • बेन्जीन संतृप्त हाइड्रोकार्बनों के समान व्यवहार करती है और योगात्मक अभिक्रिया की अपेक्षा प्रतिस्थापन अभिक्रिया देती है।
  • 1, 2 तथा 1, 6 दो आर्थो व्युत्पन्नों की सम्भावना-बेन्जीन की केकुले संरचना के अनुसार इसके दो भिन्न o-द्विप्रतिस्थापित उत्पाद संभव हैं, जबकि बेन्जीन का केवल एक o-द्विप्रतिस्थापित व्युत्पन्न ज्ञात है।
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केकुले की संरचना की कमियों के निराकरण के लिए अनेक वैज्ञानिकों ने सम पर बेन्जीन के लिए विभिन्न संरचनाएँ प्रस्तुत की हैं. परन्त इन संरचनाओं में से का केकुले से उत्तम सिद्ध नहीं हुई और इसलिए ये सभी संरचनाएँ रद्द कर दी गई।

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बेन्जीन संरचना की आधुनिक संकल्पनाएँ

1.अनुनाद संकल्पना- बेन्जीन अणु की संरचना को एक सूत्र द्वारा पूर्ण निरूपित । किया जा सकता है। बेन्जीन अणु को निम्नांकित दो केकुले संरचनाओं I व II द्वारा निरूपति किया जाना सम्भव है

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उपर्युक्त दोनों संरचनाओं में परमाणुओं की स्थिति समान है, परन्तु बन्धों की स्थिति भिन्न-भिन्न है। इनमें से प्रत्येक संरचना बेन्जीन के अधिकांश गुणों को प्रदर्शित करती है, परन्तु पूर्णरूप से नहीं। अनुनाद संकल्पना के अनुसार बेन्जीन अणु की वास्तविक संरचना, उपर्युक्त संरचनाओं I व II की अनुनाद संकर (resonance hybrid) है। इस घटना को अनुनाद कहते हैं।

उपर्युक्त दोनों संरचनाओं को अनुनादी संरचनाएँ या कैनोनिकल संरचनाएँ कहते हैं क्योंकि ये दोनों अनुनाद संकर में योगदान करती हैं।

सुविधा के लिए बेन्जीन अणु की दो केकुले संरचनाओं I व II के अनुनाद संकर को संरचना III द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

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संरचना III में सीधी रेखाएँ C-C एकल बन्धों को प्रदर्शित करती हैं तथा षट्कोणीय रंग के केन्द्र में स्थित वृत्त छह आधे बन्धों को प्रदर्शित करता है।

अनुनाद संरचना के पक्ष में प्रमाण(i) बेन्जीन अणु केकुले संरचनाओं में अधिक ९ तथा अनुनाद ही बेन्जीन अणु को स्थायित्व प्रदान करता है। इस तथ्य की पुष्टि निम्नलिखित तथ्यों से होती है—

 

(अ) बेन्जीन की हाइड्रोज संरचना के परिकल्पित अणु का अन्तर 36 किलोकैलोरी मोल आता बन्जीन की हाइडोजेनीकरण ऊष्मा या दह कम होता है अर्थात् बेन्जीन अणु 36 किलोकैलोरी मोल-1 आता है। इस अन्तर को बेन्जीन की अननाद ऊर्जा कहते है। बेन्जीन की हाइड्रोजेनीकरण ऊष्मा या दहन ऊष्मा के प्रेक्षित मान तथा केकुले काल्पत अणु की हाइडोजेनीकरण ऊष्मा या दहन ऊष्मा का मान अनुमानित से 36 किलोकैलोरी मोल1 कम होता है अर्थात बेन्जीन अणु 36 किलो कैलोरी मोल -1 अधिक स्थायी है

(ब) बेन्जीन अणु समषटका तथा समतल है

(स) बेन्जीन शीघ्रता से प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती है।

(द) बेन्जीन योग अभिक्रियाओं का विरोध करती है।

(ii) X-किरण विवर्तन से ज्ञात हुआ है कि बेन्जीन अणु में सभी छह C−C  बराबर लम्बाई अर्थात् 1.39 A°  के हैं तथा बन्ध लम्बाई का यह मान C−C एकल बन्ध लम्बाई 1.54 A° तथा C−C द्वि-बन्ध नही है, बल्कि सी C−C बन्ध एकसमान हैं जो एकल व द्वि-बन्धों के बीच में हैं। वास्तव में बेन्जीन में c_c बन्ध कोटि 1.5 है।

  1. अणु कक्षक संकल्पना यह संकल्पना इस तथ्य पर आधारित है कि बेन्जीन अणु समषट्कोण तथा समतल है। दूसरे शब्दों में, बेन्जीन, अणु में छह कार्बन परमाण समषट्कोणीय रूप से व्यवस्थित हैं तथा प्रत्येक कार्बन परमाणु से एक हाइड्रोजन पर षट्कोणीय रिंग के तल से जुड़ा हुआ है। अणु-कक्षक सिद्धान्त के अनुसार बेन्जीन में प्रत्येक कार्बन परमाणु sp-संकरण अवस्था में है अर्थात् त्रिकोणीय संकरण में है तथा C−C कोण 120° का है [चित्र-41]। बेन्जीन अणु में छह C−H बन्ध तथा छह C−C विस्थानिक (delocalized) :इलेक्ट्रॉन हैं। बेन्जीन अणु में छह कार्बन परमाणुओं के

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p-ऑर्बिटलों के छह इलेक्ट्रॉन तीन इलेक्ट्रॉन युग्मों के रूप में कार्बन परमाणुओं के मध्य स्थानगत (localized) न होकर एक साथ एक विस्थानिक π-अण कक्ष बनाते हैं तथा वे सभी छह इलेक्ट्रॉन उस π-अणु कक्ष में रहते हैं। इस कारण बेन्जीन अणु में दो लगातार इलेक्ट्रान मेध होते हैं जिसमें से एक अणुओं के तल के ऊपर तथा दूसरा उसके नीचे होता है

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सविधा के लिए आजकल बेन्जीन अणु की संरचना, संलग्न-संरचना के अनुसार निरूपित की जाती है। इसमें सीधी रेखाएँ छहσ C-C बन्धों को तथा षटकोणीय रिंग के केन्द्र में स्थित वृत्त छह विस्थानिक ग-इलेक्ट्रॉनों को प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 14: अभिविन्यास में आप क्या समझते हैं? बेन्जीन के द्वि- या त्रि-प्रतिस्थापित उत्पादों का वर्णन कीजिए। 

उत्तर : अभिविन्यास-अभिविन्यास से अभिप्राय विभिन्न प्रतिस्थापियों की किसी पंखला या वलय पर सापेक्ष स्थितियों से है। वास्तव में अणु में परमाणुओं या परमाणुओं के समूह की वे स्थायी त्रिविम व्यवस्थाएँ जो सामान्य परिस्थितियों में एक-दूसरे में परिवर्तित नहीं होती हैं, अभिविन्यास को प्रदर्शित करती हैं। इन्हें आबन्ध विच्छेदन किए बिना एक-दूसरे में रमाण परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। उदाहरणार्थ- द्वि-प्रतिस्थापित बेन्जीन के निम्नलिखित पाँच

अभिविन्यास सम्भव हैं –

 

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उपर्युक्त में दो ऑर्थो, दो मैटा तथा एक पैरा अभिविन्यास सम्भव हैं, परन्तु वास्तव में, दोनों ऑर्थो संरचनाएँ समान हैं इसी प्रकार दोनों मैटा संरचनाएँ भी समान हैं, अत: ऑर्थो, मैटा तथा पैरा तीन अभिविन्यास सम्भव हैं।

बेन्जीन के द्वि-प्रतिस्थापन उत्पाद 

बेन्जीन वलय पर उपस्थित प्रतिस्थापी, इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन के प्रति बेन्जीन वलय की क्रियाशीलता को घटा भी सकते हैं और बढ़ा भी। इन अभिक्रियाओं में धनावेशित इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक पर नाभिकस्नेही बेन्जीन वलय का आक्रमण दर निर्धारक पद होता है। बेन्जीन वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ने पर इसकी नाभिकस्नेही प्रकृति में भी वृद्धि होती है। अत: वे प्रतिस्थापी जो बेन्जीन वलय को इलेक्ट्रॉन देने की क्षमता रखते हैं, वलय की इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन के प्रति क्रियाशीलता बढ़ा देते हैं तथा वे प्रतिस्थापी जो वलय से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की क्षमता रखते हैं, बेन्जीन वलय की इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन के प्रति ‘क्रियाशीलता कम कर देते हैं, अतः इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन की प्रति क्रियाशीलता का सापेक्ष कर्म है—

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X बेन्जीन वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व निम्न दो प्रकार से बढ़ा सकता है— (i) σ-आबन्ध से इलेक्ट्रॉनों का दान करके अर्थात् प्रेरणिक प्रभाव द्वारा इलेकर दान करके वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाया जा सकता है। ऐल्किल प्रतिस्थापी CH3, -C2H5), हाइड्रोजन के सापेक्ष इसी प्रकार इलेक्ट्रॉनों का दान करते हैं।

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(ii) अनुनाद द्वारा इलेक्ट्रॉनों का दान करके वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाया जा सकता है। बेन्जीन वलय से संयुक्त परमाणु पर अनाबन्धित (एकाकी) इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित होने पर, ये इलेक्ट्रॉन p-कक्षक अतिव्यापन द्वारा वलय पर विस्थानीकृत हो सकते हैं। इसे अनुनाद द्वारा इलेक्ट्रॉनों का दान कहते हैं। NH2, OH, OR, Cl आदि इसी प्रकार बेन्जीन वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाते हैं। यद्यपि ये प्रेरणिक प्रभाव के द्वारा वलय से इलेक्टॉनों को अपनी ओर आकर्षित भी करते हैं (क्योंकि बेन्जीन वलय से जुड़ा परमाणु H के सापेक्ष अधिक विद्युत ऋणात्मक होता है) परन्तु अनुनाद प्रभाव के प्रेरणिक प्रभाव की अपेक्षा अधिक प्रभावी होने के कारण, ये इलेक्ट्रॉन दानी समूह का कार्य करते हैं। (यद्यपि इनका यह प्रभाव -I प्रभाव द्वारा कुछ कम हो जाता है।)

 

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Y समूह बेन्जीन वलय से इलेक्ट्रॉनों को निम्न प्रकार ग्रहण करता है

(i) प्रेरणिक प्रभाव द्वारा इलेक्ट्रॉनों का ग्रहण- NH समूह इसी प्रकार इलेक्ट्रा को ग्रहण करता है।

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(ii)अननाद द्वारा इलेक्ट्रॉनों का ग्रहण- यदि प्रतिस्थापी का बेन्जीन वलय से सीधा जहा परमाण. अधिक विद्युतऋणी परमाणु से द्वि या त्रि-बन्ध द्वारा संयुक्त हों, तब वलय के π-इलेक्ट्रान प्रतिस्थापी के साथ विस्थानीकृत होते हैं। इसे अनुनाद द्वारा इलेक्ट्रॉनों का ग्रहण कहते हैं। बेन्जीन वलय से हाइड्रोजन के सापेक्ष अधिक विद्युत ऋणात्मक परमाणु के जुड़े होने के कारण ये प्रेरण द्वारा भी इलेक्ट्रॉन को ग्रहण करते हैं।

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उपर्युक्त के आधार पर प्रतिस्थापियों को निम्न तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है

  • मैटा निर्देशी विसक्रियक समूह
  • ऑर्थो/पैरा निर्देशी सक्रियक समूह
  • ऑर्थो/पैरा निर्देशी विसक्रियक समूह।

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अतः स्पष्ट है कि (i) सभी सक्रियक/दुर्बल विसक्रियक (deactivating) प्रतिस्थापी, आने वाले समूह को ऑर्थो/पैरा स्थिति पर निर्देशित करते हैं।

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यहाँ – COOH एक मैटा निर्देशी समूह है।

बेन्जीन के त्रि-प्रतिस्थापन उत्पाद 

यदि बेन्जीन वलय पर पहले से ही दो प्रतिस्थापी उपस्थित हों तो इलेक्ट्रान प्रतिस्थापन में आने वाले अन्य समूह की स्थिति ज्ञात करना थोड़ा जटिल होता है। इसका अग्र प्रकार ज्ञात की जाती है—

p-नाइट्रोटॉलूईन में, – CH3 समूह सक्रियक तथा o/p निर्देशी है एवं -NO2 समूह विसक्रियक एवं मैटा निर्देशी है, अत: आने वाले समूह की स्थिति निम्न प्रकार होगी—

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(यहाँ → आने वाले समूह की स्थिति को दर्शाता है।)

यद्यपि दो सक्रियक अथवा एक सक्रियक एवं एक विसक्रियक समूह के उपस्थित होने पर आने वाले समूह की स्थिति प्रबल सक्रियक समूह द्वारा निर्धारित की जाती है। उदाहरणार्थ

 

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दो विसक्रियक मैटा प्रतिस्थापियों के उपस्थित होने पर, उनके मध्य इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन नहीं या बहुत कम होता है।

 

प्रश्न 15. सक्रिय व निष्क्रिय समूह (ग्रुप) क्या होते हैं? -NH, तथा निर्देशी प्रभाव (डाइरेक्टिव प्रभाव) विभिन्न अनुनाद संरचनाओं द्वारा समझा 

उत्तर : सक्रिय व निष्क्रिय समूह- बेन्जीन वलय की द्वि- या त्रि-परि अभिक्रियाओं में आने वाले समूह की स्थिति बेन्जीन वलय पर पहले से उपस्थित (समूहों) द्वारा निर्देशित की जाती है।

वे समूह जो बेन्जीन वलय को इलेक्ट्रॉन देने की क्षमता रखते हैं, बेन्जीन वलय इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन के प्रति क्रियाशीलता को बढ़ा देते हैं अतः सक्रिय समर (Activating groups) कहलाते हैं। सामान्यतः इन समूहों में केन्द्रीय परमाणु की विद्या ऋणात्मकता, अन्य संलग्न परमाणुओं की अपेक्षा अधिक होती है। उदाहरणार्थ—NH2, –NR2, –OH, –OR, R आदि। ये सामान्यतया आर्थो-पैरा निर्देशी होते हैं। पर अ परन्तु F, Cl, Br इसके अपवाद हैं। वे समूह जो बेन्जीन वलय से इलेक्ट्रॉन युग्म को अपनी अभिक

ओर आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं, बेन्जीन वलय की इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन के प्रति निर्देश क्रियाशीलता को कम कर देते हैं, अत: निष्क्रिय या असक्रियक समूह कहलाते हैं। इन समूहों में केन्द्रीय परमाणु किसी अन्य अधिक विद्युत ऋणात्मक परमाणु से जुड़ा होता है। उदाहरणार्थ  -CHO, COR, COOH, NO2, -CN आदि। ये समूह सामान्यतया मैटा निर्देशी होते हैं क्योंकि ये मैटा स्थिति की अपेक्षा आर्थो/पैरा स्थितियों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम कर देते हैं।

अनुनाद संरचना के आधार पर –NH2 का निर्देशी प्रभाव- C6H5NH2 की अनुनादी संरचनाएँ निम्नवत् हैं –

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उपर्युक्त संरचनाओं से स्पष्ट है कि बेन्जीन वलय पर –NH2, समूह की उपस्थित इसकी आर्थो तथा पैरा स्थितियों (2.4 स्थितियों) पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ा देती है। इलेक्ट्रा घनत्व अधिक होने के कारण इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक इन स्थितियों पर अन्य स्थितिया का अपेक्षा सुगमता से आक्रमण करता है अतः –NH2, समूह आने वाले समूह को आर्था/परै स्थिति पर निर्देशित करता है। दूसरे शब्दों में, यह आर्थो/पैरा निर्देशी होता है।

अनुनाद संरचना के आधार पर –NO2, का निर्देशी प्रभाव- C6H5NO2 का अनुनादी संरचनाएँ अग्रवत् हैं—

 

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उपर्युक्त संरचनाओं से स्पष्ट है कि बेन्जीन वलय पर – NO2, समूह की उपस्थिति वलय की आर्थो तथा पैरा स्थितियों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम कर देता है जिस कारण मैटा स्थिति पर आर्थो/पैरा स्थितियों की अपेक्षा इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिक होता है अतः इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक आर्थो/पैरा की अपेक्षा मैटा स्थिति पर सुगमता से आक्रमण करता है अर्थात् मैटा निर्देशी होता है।

 

प्रश्न 16. इलेक्ट्रॉनस्नेही ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं से आप क्या समझते हैं? बेन्जीन की नाइट्रीकरण, सल्फोनीकरण तथा फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐसिलीकरण अभिक्रियाओं की क्रियाविधि की विवेचना कीजिए।

अथवा इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ क्या होती हैं? क्रियाविधि सहित विस्तृत वर्णन कीजिए। 

अथवा बेन्जीन के हैलोजेनीकरण की क्रियाविधि लिखिए।

अथवा फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐल्कलीकरण, इसकी क्रियाविधि एवं सीमाओं से आप क्या समझते हैं?

अथवा बेन्जीन के नाइट्रीकरण की क्रियाविधि लिखिए। 

उत्तर : इलेक्ट्रॉनस्नेही ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ- वे अभिक्रियाएँ जिनमें बेन्जीन वलय का एक या अधिक H परमाणु किसी इलेक्ट्रॉनस्नेही के द्वारा प्रतिस्थापित होता है, इलेक्ट्रॉनस्नेही ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। उदाहरण- बेन्जीन का हैलोजेनीकरण, नाइट्रीकरण, सल्फोनीकरण आदि। –

इन अभिक्रियाओं का क्रियाविधि सहित वर्णन निम्न प्रकार है

हैलोजेनीकरणबेन्जीन के अणु के हाइड्रोजन के हैलोजेन परमाणु द्वारा प्रतिस्थापन से बेन्जीन का हैलोजेन व्युत्पन्न प्राप्त होता है तथा इस अभिक्रिया को हैलोजेनीकरण कहते हैं। क्लोरीन व ब्रोमीन हैलोजेनवाहक (FeCI3, AICI3, I2, Fe-पाउडर) की उपस्थिति में बन्जीन से अभिक्रिया करके बेन्जीन के क्लोरी ब नौमी व्युत्पन्न देती हैं।

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यदि क्लोरीन की मात्रा अधिक हो तो द्वि- त्रि- व हेक्सा-क्लोरो व्यत्पन्न देती है—

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सीधा आयोडीकरण उत्क्रमणीय होता है, अत: इसके लिए ऑक्सीकारक की उपस्थिति आवश्यक होती है। सामान्यतः प्रयुक्त ऑक्सीकारक HIO 3 तथा HNO3 इत्यादि हैं।

C6H6 +I2 ⇌ CHI+ HI

 

यह अभिक्रिया HI के कारण उत्क्रमणीय है जिसको ऑक्सीकारक (HIO3 या HNO3) द्वारा I2 में ऑक्सीकृत कर देते हैं।

5HI + HIO3 → 3I2 + 3H2O

 

सीधा फ्लुओरीनीकरण निम्नलिखित प्रकार की अभिक्रिया के कारण असम्भव है—

 

C6H6 + 3F2 → 6C+ 6HF

 

हैलोजेनीकरण अभिक्रिया की क्रियाविधि- क्लोरीनीकरण अभिक्रिया का क्रियाविधि निम्न पदों की सहायता से स्पष्ट की जा सकती है

(i) इलेक्ट्रॉनस्नेही का उत्पादन-हैलोजेनवाहक के द्वारा CI2, CI+ आदि (इलेक्ट्रॉनस्नेही) का उत्पादन करती है।

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(ii) मध्यवर्ती कार्बोनियम आयन का निर्माण- CI+ इलेक्ट्रॉनस्नेही के रूप ब अणु से अभिक्रिया द्वारा माध्यमिक कार्बोनियम आयन बनाता है।

 

इस मध्यवर्ती की अनुनादिक संरचनाओं को निम्न प्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं

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(iii) प्रतिस्थापित उत्पाद का बनना- मध्यवर्ती कार्बोनियम आयन FeCI को प्रोटॉन देकर प्रतिस्थापित उत्पाद का निर्माण करता है।

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ब्रोमीनीकरण की क्रियाविधि भी ऊपर दी गई क्रियाविधि के समान ही होती है। ति

(2) नाइट्रीकरण-बेन्जीन से हाइड्रोजन परमाणु को —NO2, समूह द्वारा प्रतिस्थापित करने पर बेन्जीन का नाइट्रोव्युत्पन्न प्राप्त होता है इस अभिक्रिया को नाइट्रीकरण कहते हैं। जब बेन्जीन को सान्द्र HNO3 व सान्द्र H2SO4 (नाइट्रेटिंग मिश्रण) के साथ 50-60°C पर गर्म करते हैं तो नाइट्रोबेन्जीन प्राप्त होता है जबकि 90°C पर m-डाइनाइट्रोबेन्जीन प्राप्त होता है। त्रि-प्रतिस्थापित उत्पाद बहुत कठिनता से प्राप्त होता है क्योंकि —NO2 समूह मैटा प्रतिस्थापन समूह है।

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नाइट्रीकरण अभिक्रिया की क्रियाविधि– उपर्युक्त अभिक्रिया की क्रियाविधि को . निम्न पदों की सहायता से व्यक्त करते हैं

(i) इलेक्ट्रॉनस्नेही नाइटोनियम आयन का बनना– NO2 का निर्माण नाइट्रेटिंग मिश्रण द्वारा निम्न प्रकार से होता है

 (ii) मध्यवर्ती कार्बोनियम आयन का निर्माण- नाइट्रोनियम और साथ अभिक्रिया द्वारा मध्यवर्ती कार्बोनियम आयन बनता है।

 

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(3) सल्फोनीकरण- बेन्जीन के हाइड्रोजन परमाणु को सल्फोनिक समूह (-SO3H) द्वारा प्रतिस्थापित करने की अभिक्रिया सल्फोनीकरण कहलाती है। बेन्जीन अणु सान्द्र H2SO4 के साथ अधिक ताप (80-100°C) पर गर्म करने पर बेन्जीन सल्फोनिक अम्ल बनता है। यहाँ यदि सधूम (fuming) H2SO4 प्रयोग किया जाए तो m-डाइसल्फोनिक अम्ल प्राप्त होता है तीसरे –SO3H को बहुत कठिनता से ही लगाया जा सकता है।

सल्फोनीकरण अभिक्रिया की क्रियाविधि-इस अभिक्रिया की क्रियाविधि निम्न अ प्रकार से व्यक्त की जा सकती है

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सल्फोनीकरण प्रक्रम में SO3, इलेक्ट्रोफाइल के समान कार्य करता है। अग्र पदों में सम्पन्न होती है—

 

  • इलेक्ट्रानस्नेही (इलेक्ट्रोफाइल) का निर्माण— यह H2SO4 द्वारा. निम्नअभिक्रिया द्वारा बताता है

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सधम H2SO4 में विलयित SO3  सीधे ही बेन्जीन से अभिक्रिया करती है।

(ii) माध्यमिक कार्बोनियम आयन का निर्माण- SO3 इलेक्ट्रॉनस्नेही के रूप में बेन्जीन से अभिक्रिया द्वारा माध्यमिक कार्बोनियम आयन का निर्माण करता है।

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इस कार्बोनियम आयन का स्थायित्व निम्न अनुनाद संरचनाओं के कारण होता है

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(iii) मध्यवर्ती कार्बोनियम आयन से H+ का निराकरण- मध्यवर्ती कार्बोनियम आयन HSO4 से अभिक्रिया द्वारा प्रोटॉन पृथक् करके बेन्जीन सल्फोनेट आयन देता है।

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(iv) बेन्जीन सल्फोनेट आयन H3O+ आयन की अभिक्रिया द्वारा बेन्जीन सल्फोनिक ध निम्न अम्ल का निर्माण करता है।

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चारों पदों में साम्य है, अत: यह स्पष्ट है कि सम्पूर्ण अभिक्रिया साम्य अभिक्रिया है। सान्द्र अम्ल में सम्पूर्ण अभिक्रिया पद (i) से पद (iv) तक का योग होती है—

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सध्म H2SO4 में पद (i) महत्त्वपूर्ण नहीं होता क्योंकि H2SO4 में विलीन साथ धीरे-धीरे अभिक्रिया करती है।

क्योंकि सल्फोनीकरण की अभिक्रिया में सभी पद साम्यावस्था के हैं, अतः सागर स्थिति अभिक्रिया में प्रयुक्त परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। बेन्जीन का सल्फोनीकरण करने के सान्द्र H2SO4 का अथवा सधूम H2SO4 का प्रयोग करना होगा। ऐसी अवस्था में साम्य दायीं.

ओर रहेगा और बेन्जीन सल्फोनिक अम्ल की अच्छी प्राप्ति होगी।

(4) ऐल्किलीकरण (फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया)- जब निर्जल AICI3 की उपस्थिति में बेन्जीन वलय के हाइड्रोजन परमाणु के ऐल्किल या ऐसिल समूह द्वारा प्रतिस्थापित । होकर बेन्जीन के ऐल्किल या ऐसिल व्युत्पन्न प्राप्त होते हों तो उस अभिक्रिया को फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया कहा जाता है। निर्जल AICI3 के स्थान पर FeCI3, ZnCl2, SnCl4, BF3, SbCl5, आदि उत्प्रेरक भी प्रयोग किए जा सकते हैं। उत्प्रेरकों की सक्रियता का क्रम AlCls > BF3 > SbCl5 > FeCl3 >SnCl4>ZnCI2 होता है, जबकि हैलाइडों का क्रम RI > RBr > RCI > RF होता है।

यह अभिक्रिया दो प्रकार से सम्भव है

  • फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐल्किलीकरण .
  • फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐसिलीकरण

(i) फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐल्किलीकरण- वह अभिक्रिया जिसमें बेन्जीन और उसके समजात, ऐल्किल हैलाइडों से निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड या अन्य लुईस अम्लों की उपस्थिति में अभिक्रिया द्वारा उनके ऐल्किल व्युत्पन्न देते हैं, फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐल्किलीकरण कहलाती है। इसके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार हैं−

 

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फ्रीडेल-काण्टस ऐल्किलीकरण अभिक्रिया की क्रियाविधिउपर्युक्त अभिक्रिया ५) का क्रियाविधि निम्न पदों में होती है

(i) इलेक्टॉनस्नेही (इलेक्ट्रोफाइल) का निर्माण मेथिल क्लोराइड, AIC13 के साथ अभिक्रिया करके मेथिल कार्बोकैटायन (कार्बेनियम) आयन बनाता है जो इलेक्ट्रोफाइल ‘का कार्य करता है।

CH3CI + AlCl3 → C+H3 + AICI4

(ii) माध्यमिक कार्बोनियम आयन का बनना– इलेक्ट्रोफाइल बेन्जीन के साथ अभिक्रिया करता है तथा माध्यमिक कार्बोनियम आयन बनाता है।

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(iii) माध्यमिक कार्बोनियम आयन से प्रोटॉन का निराकरण व उत्पाद निर्माणयह AICI की माध्यमिक कार्बोनियम आयन की अभिक्रिया द्वारा बनता है।

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फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐल्किलीकरण की कमियाँ 

  • ऐरिल व विनाइल हैलाइड यह अभिक्रिया नहीं देते हैं क्योंकि उनका और परमाणु कम क्रियाशील होता है।
  • —CH3 समूह बेन्जीन वलय की क्रियाशीलता बढ़ा देता है तथा दि- वन प्रतिस्थापित उत्पाद भी प्राप्त हो जाते हैं।
  • ऐल्किल समूह पुनर्विन्यासित हो जाता है तथा अधिक स्थायी कार्बोनियम आयनबनता है।
  • —NO, की उपस्थिति में फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया नहीं हो
  • बेन्जीन वलय में क्षारीय समूह की उपस्थिति उत्प्रेरक की क्रियाशीलता को नष्ट कर देती है।

 

उदाहरण- n-प्रोपिल क्लोराइड तथा बेन्जीन की अभिक्रिया से आइसोप्रोपिलानी बेन्जीन बनता है।

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यह इस कारण होता है कि n–प्रोपिल कार्बोनियम आयन अधिक स्थायी आइसोप्रोपिन आयन में परिवर्तित हो जाता है। इस आइसोप्रोपिल बेन्जीन का बनना निम्न क्रियाविधि द्वारा समझाया जा सकता है

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ऐल्किल कार्बोनियम आयन के स्थायित्व का क्रम इस प्रकार होता है .

तृतीयक > द्वितीयक > प्राथमिक > मेथिल कार्बोनियम आयन

(ii) फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐसिलीकरण- वह अभिक्रिया जिसमें बेन्जीन या उसक समजात ऐसिड क्लोराइड या ऐसिड ऐनहाइड्राइड के साथ निर्जल AICI3 या अन्य लुईस  अम्लों की उपस्थिति में अभिक्रिया करके बेन्जीन के ऐसिल व्युत्पन्न देते हैं फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐसिलीकरण कहलाती है।.

उदाहरणार्थ- फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया के कुछ उदाहरण निम्नलिखित है –

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फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐसिलीकरण अभिक्रिया की क्रियाविधि उपर्युक्त अभिक्रियाओं में अभिक्रिया (a) की क्रियाविधि निम्न पदों में समझायी जा सकती है

(i) इलेक्ट्रॉनस्नेही (इलेक्ट्रोफाइल) का उत्पादनऐसिड क्लोराइड निर्जल AICI3 के द्वारा ऐसिल कार्बोनियम आयन का निर्माण करते हैं जो इलेक्ट्रोफाइल का कार्य करते हैं।

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(ii) माध्यमिक कार्बोनियम आयन का बननाइलेक्ट्रोफाइल के बेन्जीन वलय पर आक्रमण द्वारा माध्यमिक कार्बोनियम आयन बनता है।

(iii) माध्यमिक कब्रोनियम आयन से H+ प्रोटान का निराकरण व् उत्पाद निर्माण—

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प्रश्न 17. नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं को समझाइए। SN1 एव SN2 यानों की क्रियाविधि बताइए। इन अभिक्रियाओं को प्रभावित करने वाले कारक का भी वर्णन कीजिए |

अथवा नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं से आप क्या समझते हैं? SN1 एवं SN2 क्रियाओं में अन्तर लिखिए

उत्तर :             नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ 

जब किसी क्रियाधार (substrate) का कोई परमाणु या समूह किसी नाभिकस्नेही पॅटिलयोफिलिक) अभिकर्मक के द्वारा प्रतिस्थापित होता है तो इसको नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं। .

RX+ OH → R-OH + X

 

RX क्रियाधार है, OH समंह नाभिकस्नेही अभिकर्मक तथा X हटने वाला समूह है, अत: इसको नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं. तथा SN सना करत हैं क्योंकि S = substitution तथा N = nucleophilic है। SN आभ क्रियाविधि एकाणक (unimolecular) तथा द्विअणक (bimolecular) दो प्रकार है, जिनको क्रमशः SN1 व SN2 के रूप में व्यक्त करते हैं।

  1. SN1 या एकाणुक क्रियाविधि- यह अभिक्रिया दो पदों में सम्पन इसमें पहले पद में ऐल्किल हैलाइड (आधार यौगिक) धीरे-धीरे विषमाश द्वारा विखण्डित होकर कार्बोनियम आयन उत्पन्न करता है पद में तीव्रता से नाभिकस्नेही (nucleophilic) अभिकर्मक स अ देता है।

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चूँकि दर निर्धारक पद (rate determining step), (i). में केवल एक अणु (RX) के सहसंयोजक बन्ध का विघटन होता है अतएव इसकी कोटि एक है और इसको एकाणुक अभिक्रिया (unimolecular reaction) कहते हैं। यह एक प्रथम कोटि की अभिक्रिया है, जिसमें अभिक्रिया की दर केवल ऐल्किल हैलाइड के सान्द्रण पर निर्भर करती है।

दर ∝[क्रियाधार] अर्थात् अभिक्रिया की दर ∝ [RX]

अतएव इसको SN1 से नामांकित करते हैं। तृतीयक ऐल्किल हैलाइड की प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ सामान्यत: SN1 क्रियाविधि द्वारा होती हैं।

इस अभिक्रिया में प्रथम पद में कार्बोनियम आयन (कार्बोधनायन) बनता है, जिनका स्थायित्व (प्रेरणिक तथा अतिसंयुग्मन प्रभाव के कारण) निम्न होता है

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इस पद में कार्बोनियम आयनों के स्थायित्व का क्रम उनके स्थायित्व क्रम पर निर्भर करता है। इस कारण ऐल्किल हैलाइडों में SN1 अभिक्रिया का बढ़ता क्रम निम्न प्रकार से है

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कार्बोनियम आयन कार्बोनियम आयन समतल (planar) होता है क्योंकि केन्द्रीय धनावेशित कार्बन sp2

संकरित होता है। कार्बोनियम आयन पर कोई भी नाभिकस्नेही किसी भी ओर से आक्रमण  कर सकता है

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अतः तृतीयक ऐल्किल हैलाइड का जल-अपघटन मुख्यत: SN1 क्रियाविधि से ही होगा।

SN1 अभिक्रिया के प्रति RX की क्रियाशीलता का क्रम R—I > R—Br > R—CI  > R—F होता है।

 

  1. SN2 या द्विअणुक क्रियाविधिजैसा कि इसके नाम से ज्ञात होता है इसकी क्रियाविधि में दो अणुओं का साथ-साथ सान्द्रण परिवर्तित होता है। अत: यहाँ पर अभिक्रिया कावेग ऐल्किल हैलाइड क्रियाधार तथा नाभिकस्नेही दोनों के सान्द्रण पर निर्भर करता है।

अभिक्रिया का वेग ∝ [ऐल्किल हैलाइड] [नाभिकस्नेही]

यह एक पद में सम्पन्न होने वाली अभिक्रिया है। इसमें दर निर्धारक पद में दो पद में दो अणुओं की सहसंयोजकता परिवर्तित होने के कारण एक मध्यवर्ती यौगिक बनता है—

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मध्यवर्ती यौगिक तेजी से टूटकर उत्पाद देता है।

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चूँकि वेग निर्धारक पद (1) में दो अणुओं का सान्द्रण परिवर्तित हो रहा है, अत: इसकी। आण्विकता दो है और इसको द्विअणुक अभिक्रिया (bimolecular reaction) कहते हैं व SN2 से नामांकित करते हैं।

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यहाँ नाभिकस्नेही [OH ] का आक्रमण पीछे की दिशा से होता है। यहाँ विन्यास इस प्रकार बदल जाता है जैसे छाता तीव्र आँधी में पलट जाता है। यदि प्रारम्भिक यौगिक प्रकाशिक सक्रिय है तो इसके d-समावयवी का J-समावयवी में या J-समावयवी का d-समावयवी में परिवर्तन हो जाएगा। इसको वाल्डन या, प्रकाशिक प्रतिलोमन भा कहते हैं। प्राथमिक ऐल्किल हैलाइडों की प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ सामान्यतःSN2 क्रियाविाय से, परन्तु द्वितीयक ऐल्किल हैलाइडों की प्रतिस्थापन क्रियाएँ SN1 तथा SN2 दा क्रियाविधियों के द्वारा हो सकती हैं।

ऐल्किल हैलाइडों का SN2 अभिक्रिया के प्रति क्रियाशीलता का क्रम ऐल्किल समूह । सापेक्ष p > s >t—ऐल्किल हैलाइड तथा हैलोजेन के सापेक्ष R—I > R—Br > R—CIT

R—F होता है।

 

SN1 तथा SN2 क्रियाओं में अन्तर

 

 

s.no.

SN1(एकआण्विक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन)

 

SN2 (द्विआण्विक नाभिकस्नेही

प्रतिस्थापन)

 

1. इस अभिक्रिया की कोटि एक होती है। इस अभिक्रिया की कोटि दो होती है।
2. इसमें अभिक्रिया की दर केवल अभिकारक की सान्द्रता पर निर्भर करती है। यह नाभिकस्नेही की सान्द्रता से स्वतन्त्र होती है। दर ∝ (अभिकारक) इसमें अभिक्रिया की दर अभिकारक एवं नाभिकस्नेही दोनों के सान्द्रण पर निर्भर करती है। दर ∝ [अभिकारक] Nu ]

 

3. यह अभिक्रिया दो पदों में पूर्ण होती है। यह अभिक्रिया केवल एक पद में पूर्ण होती है।
4. यह मध्यवर्ती के निर्माण द्वारा सम्पन्न होती है। इसमें कोई संक्रमण अवस्था नहीं

आती है।

इसमें संक्रमण अवस्था आती है।
5. यह त्रिविम विशिष्ट व त्रिविम चयनात्मक नहीं होती है। यह त्रिविम विशिष्ट एवं त्रिविम चयनात्मक

होती है।

6. इसमें रेसिमिक मिश्रण प्राप्त होता है यदि अभिकारक प्रकाश सक्रिय है।

 

इसमें विन्यास का प्रतिलोमन होता है।

 

 

नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं को प्रभावित करने वाले कारक 

नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं को प्रभावित करने वाले कारकों का संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है

(i) ऐल्किल समूह की प्रकृति

(a) ध्रुवीय प्रभाव-क्रियाधार में + I तथा – I समूहों की उपस्थिति ध्रुवता को प्रभावित करती है।

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C—X वाले C पर CH3– समूहों की संख्या बढ़ने से इस कार्बन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है जिससे उसके ऊपर ऋणावेश बढ़ता है और यह नाभिकस्नेही अभिकर्मक के आक्रमण का विरोध करता है। अतः ध्रुवता बढ़ने से अभिक्रिया SN2 प्रक्रम से न होकर, SN1 प्रक्रम से होगी।

SN1 प्रक्रम में कार्बोनियम आयन बनते हैं। कार्बोनियम आयन का स्थायित्व बढ़ने से इसकी सक्रियण ऊर्जा घटती है। अत: SN1 अभिक्रिया तेजी से होती है।

 

tब्यूटिल ब्रोमाइड > आइसोप्रोपिल ब्रोमाइड > एथिल ब्रोमाइड

 

CH3Br का क्षारीय अपघटन SN2 प्रक्रम द्वारा होता है, जबकि इसके H परमाणी को फेनिल समूह से प्रतिस्थापित करने पर अभिक्रिया SN1 प्रक्रम द्वारा होने लगती है। इस कारण अधिक स्थायी कार्बोनियम आयन का बनना है।

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उपर्युक्त कार्बोनियम आयन अनुनाद द्वारा स्थायी हो जाता है। फेनिल समूहों की संख्या बढ़ने से SN1 अभिक्रिया तेजी से होने लगती है।

(b) त्रिविम प्रभावSN2 प्रक्रम की संक्रमण अवस्था में कार्बन परमाणु पर पाँच समूह लगे रहते हैं, यदि इनका आकार बढ़ जाए तो इसमें त्रिविम तनाव बढ़ेगा तथा अभिक्रिया की दर घटेगी। अतः त्रिविम प्रभाव बढ़ने से अभिक्रिया SN2 प्रक्रम से न होकर SN1 प्रक्रम से होगी। निओपेन्टिल क्लोराइड यद्यपि एक प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड है, परन्तु इसकी प्रतिस्थापन अभिक्रिया SN2 प्रक्रम से न होकर SN1 प्रक्रम से होती है।

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उपर्युक्त में आक्रमण पीछे की तरफ से नहीं हो सकता है क्योंकि इस परिस्थिति में अत्यधिक त्रिविम बाधा होती है। अतः जितना अधिक त्रिविम प्रभाव होगा, उतनी ही अधिक अभिक्रिया SN1 प्रक्रम से होगी।

(ii) हैलोजेन परमाणु की प्रकृतिऐल्किल हैलाइड के हैलोजेन परमाणु की प्रकृति बदलने से भी अभिक्रिया की दर परिवर्तित हो जाती है। SN1 तथा SN2 प्रक्रमों के ऐल्किल हैलाइडों की क्रियाशीलता की दर का घटता क्रम निम्न होता है—

R—I > R—Br > R—Cl > RF

उपर्युक्त व्यवहार के लिए निम्न दो कारक उत्तरदायी होते हैं

 (a) त्रिविम तनाव  हैलोजेन परमाणु का आकार बढ़ने से त्रिविम तनाव बढ़ता है।

I > Br > Cl > F

(b) ध्रुवणता यह निम्न क्रम में घटती है

C—I > C—Br > C—CI > C—F

(iii) विलायक की प्रकृतिचूँकि SN1 प्रक्रम में आयन बनते हैं, अत: विलायक की ध्रुवता (polarity) बढ़ने से SN1 प्रक्रम की दर बढ़ती है, जबकि SN2 प्रक्रम की दर घटती है। कुछ विलायकों की ध्रुवता का घटता क्रम निम्न है—

H20 > HCOOH > CH3OH > CH3CH2OH > CH3COOH

 

विलायक की प्रकृति बदलकर SN1 तथा SN2 प्रक्रमों को परस्पर परिवर्तित कर सकते हैं।

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अत: एक अच्छा आयनीकृत विलायक SN2 प्रक्रम को धीमा करता है।

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अत: ध्रुवीय विलायक SN1 प्रक्रम का तथा अध्रुवीय विलायक SH2 प्रक्रम का समर्थन करते हैं।

(iv) छोड़ने वाले समूह की प्रकृति चूँकि छोड़ने वाला समूह (X) क्षार के रूप में निकलता है। अतः क्षीण क्षारक प्रबल क्षारक की अपेक्षा आसानी से प्रतिस्थापित होते हैं। जितना कम क्षारीय समूह क्रियाधार में लगा होगा उतनी ही आसानी से यह SN अभिक्रिया में विलायक से हटेगा। ऐल्किल हैलाइडों की प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में हैलाइड आयन के हटने का घटता क्रम अग्र होता है

 

I > Br > CI> F

यहाँ 1 क्षीण क्षार तथा F- प्रबलतम क्षार है, अत: I आसानी से तथा F-कठिनाई से हटेगा। यह क्रम कार्बन-हैलोजेन आबन्ध की बन्धन सामर्थ्य के ठीक विपरीत है।

(v) नाभिकस्नेही की प्रकृति— 

(a) SN1 प्रक्रम में नाभिकस्नेही दर निर्धारण पद में प्रयुक्त नहीं होता है। अत: नाभिकस्नेही की प्रकृति का SN1 प्रक्रम पर कोई प्रभाव नहीं होता है, परन्तु यदि किसी अभिक्रिया में कई नाभिकस्नेही उपस्थित हों तो कार्बोनियम आयन प्रबल नाभिकस्नेही से संयुक्त होकर उत्पाद बनाता है। अत: नाभिकस्नेही की नाभिकस्नेहिता (nucleophilicity) के आधार पर विभिन्न नाभिकस्नेही उत्पाद के संगठन को बदल सकते हैं, परन्तु अभिक्रिया की दर अपरिवर्तित रहती है।

(b) नाभिकस्नेही की प्रकृति SN2 प्रक्रम को अत्यधिक प्रभावित करती है। प्रबल नाभिकस्नेही SN2 प्रक्रम को बढ़ावा देते हैं। जितनी अधिक किसी नाभिकस्नेही की नाभिकस्नेहिता होती है उतना ही अधिक वह SN1 की अपेक्षा SN2 प्रक्रम की ओर मुखर होता है। यदि नाभिकस्नेही दुर्बल हो तो अभिक्रिया SN2 से SH1 में परिवर्तित हो जाती है।

−OH आयन प्रबल क्षार तथा अच्छा नाभिकस्नेही है, जबकि आयोडाइड आयन एक दुर्बल क्षार होते हुए भी अच्छा नाभिकस्नेही होता है। विभिन्न नाभिकस्नेहियों की प्रबलता का घंटता क्रम निम्न होता है

C6H5S  > CN>I > OH>C2H5O > Br > CI > NO3

 

प्रश्न 18. क्लोरोबेन्जीन के बनाने की विधियों तथा गुणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर :             क्लोरोबेन्जीन के निर्माण की विधियाँ

क्लोरोबेन्जीन का निर्माण निम्नलिखित विधियों द्वारा किया जा सकता है

  1. ऐरीन के सीधे क्लोरीनीकरण से ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन को किसी हैलोजेन वाहक की उपस्थिति में साधारण ताप पर सीधे क्लोरीनीकृत करके क्लोरोबेन्जीन आसानी से बनाए जा सकते हैं।

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क्लोरीनीकरण से नाभिकीय प्रतिस्थापन उत्पाद की प्राप्ति बहुत अच्छी मात्रा में होती है।

  1. औद्योगिक निर्माण बेन्जीन वाष्प, वायु और हाइड्रोजन क्लोराइड के मिश्रण को तप्त CuO या Cu-Fe उत्प्रेरक के ऊपर गुजारने पर क्लोरोबेन्जीन प्राप्त होती है। इस प्रक्रम को राशिग प्रक्रम (Raschig process) कहते हैं।

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लोरोबेन्जीन के प्रमुख रासायनिक गुणधर्म क्लोरोबेन्जीन की महत्त्वपूर्ण रासायनिक अभिक्रियाएँ अग्रलिखित हैं

(i) नाइटीकरण हैलोजेन परमाणु ऑर्थो व पैरा दिष्टकारी परन्त निष्क्रियक । अतः ज़ब क्लोरोबेन्जीन को 50°C ताप पर सान्द्र नाइट्रिक व सल्फ्यरिक अम्लों के मिश्रण के साथ नाइट्रीकृत किया जाता है तो o- तथा p-क्लोरोनाइट्रोबेन्जीन बनती हैं, परन्तु नाइटीकरण की दर बेन्जीन की अपेक्षा तीन गुना कम होती है।

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(ii) हैलोजेनीकर यह हेलोजेंवाह्क (Fe, FeC3, FeBre3 आदि) की उपस्थिति में हेलोजेनो (Cl2/Br2) के साथ हैलोजेनीकरण अभिकिर्या देता है

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(iii) सल्फोनीकरणइसे सधूम H, SO के साथ गर्म करने पर, यह सल्फोनीकरण अभिक्रिया देता है। .

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(iv) ऐल्किलीकरणयह निर्जल AlCl3 या अन्य लुईस अम्लों की उपस्थिति में ऐल्किल हैलाइडों के साथ फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐल्किलीकरण अभिक्रिया देता है।

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नोट यह देखा गया है कि बेन्जीन नाभिक पर हैलोजेन परमाणु के सापेक्ष ऑर्थो अथवा पैरा या दोनों स्थितियों पर इलेक्ट्रॉन आकर्षी समूह जैसे —NO2,-COOH, —SOH3H, —CHO, —COR आदि उपस्थित होने पर ऐरिल हैलाइड नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन के लिए सहायक होता है।

  1. क्लोरीन परमाणु के कारण अभिक्रियाएँ
  2. नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ C—X आबन्ध की प्रकृति पर निर्भर करती हैं। हैलोऐरीन, हैलोऐल्केन की अपेक्षा कम क्रियाशील होते हैं क्योंकि इनमें C—X आबन्ध का विदलन प्रायः कठिन होता है।

अत: हैलोऐरीन की नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ विशेष परिस्थितियों में उच्च पाप व दाब पर ही सम्भव हैं जो निम्न प्रकार से हैं

(i) हैलोजेन परमाणु का –OH समूह द्वारा प्रतिस्थापनहैलोऐरीन उच्च ताप (900°C) व उच्च दाब पर जलीय NaOH के साथ अभिक्रिया करके फीनॉल देते हैं।

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फोनॉल बनने के इस प्रक्रम को डॉव प्रक्रम (Dow’s process) कहते हैं।

(ii) हैलोजेन परमाणु का (-NH2) समूह द्वारा प्रतिस्थापनहैलोऐरीन Cu2O की व व 200° C ताप पर NH3 से अभिक्रिया करके ऐमीनो ऐरीन देते हैं।

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ऐनिलीन ऐनिलीन, KNH2, या NaNH2, की निम्नलिखित अभिक्रिया द्वारा भी बनती है—

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(iii) हैलोजेन परमाणु का सायनाइड समूह [(-CN)] द्वारा प्रतिस्थापनपिरिडीन की उपस्थिति में Cu2, (CN)2, के साथ 200°C ताप पर ऐरिल हैलाइड अभिक्रिया द्वारा ऐरिल सायनाइड देते हैं।

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III. अन्य अभिक्रियाएँ 

(i) धातु से अभिक्रिया- क्लोरोबेन्जीन शुष्क ईथर विलयन में मैग्नीशियम के साथ अभिक्रिया करके ऐरिल मैग्नीशियम क्लोराइड (ग्रिगनार्ड अभिकर्मक) बनाती है। यह उसी प्रकार से अभिक्रिया करता है, जिस प्रकार मेथिल मैग्नीशियम हैलाइड करते हैं।

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(ii) वु-फिटिग अभिक्रिया- जब किसी ऐरिल हैलाइड को किसी ऐल्किल हैलाइड के साथ, धात्विक सोडियम की उपस्थिति में ईथर विलयन में अभिकृत किया जाता है तो बेन्जीन का ऐल्किल व्युत्पन्न प्राप्त होता है। यह अभिक्रिया वु-फिटिग अभिक्रिया कहलाती है।

 

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ऐरिल हैलाइड इन्हीं परिस्थितियों में स्वयं अपने आप से ही अभिक्रिया करके द्विनाभिकीय हाइड्रोकार्बन भी बना सकता है। यह अभिक्रिया फिटिग अभिक्रिया कहलाती है;

जैसे—

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(iii) अपचयन- Ni_Al मिश्रधातु एवं ऐल्कोहॉल की अभिक्रिया द्वारा प्राप्त नवजात हाइड्रोजन हैलोऐरीन का अपचयन करके, बेन्जीन देती है।

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