Bsc 2nd Year Physics IV Physical Optics and Lesers Notes

Bsc 2nd Year Physics IV Physical Optics and Lesers Notes

Bsc 2nd Year Physics IV Physical Optics and Lesers Notes :-  

 

 

UNIT-I

Interference of Light: The principle of superposition, two-slit interference, coherence requirement for the sources, optical path retardations, lateral shift of fringes, Rayleigh refract meter and other applications, localized fringes, thin films, applications for precision measurements for displacements.

Haidinger Fringes :  Fringes of equal inclination. Michelson interferometer, its application for precision determination of wavelength, wavelength difference and the width of spectral lines, Twyman Green interferometer and its uses, intensity distribution in multiple beam interference, Tolansky fringes, Fabry-Perot interferometer and etalon.

 

UNIT-II

Fresnel Diffraction: Fresnel half-period zones, plates, straight edge, rectilinear propagation.

Fraunhofer Diffraction : Diffraction at a slit, half-period zones, phasor diagram and integral calculus methods, the intensity distribution, diffraction at a circular aperture and a circular disc, resolution of images, Rayleigh criterion, resolving power of telescope and microscopic systems, outline of phase contrast microscopy.

Diffraction Gratings : Diffraction at N parallel slits, intensity distribution, plane diffraction grating, reflection grating and blazed gratings, concave grating and different mountings, resolving power of a grating and comparison with resolving powers of prism and of a Fabry-Perot etalon.

 

UNIT-III

Polarization, double refraction in uniaxial crystals, Nicol prism, polaroids and retardation plates, Babinet’s compensator, analysis of polarized light, matrix representation of plane polarized waves, matrices for polarizers, retardation plates and rotators, application to simple system.

 

UNIT-IV

Laser System : Purity of a spectral line, coherence length and coherence time, spatial coherence of a source, Einstein’s A and B coefficients, spontaneous and induced emissions, conditions for laser action, population inversion.

Applications of Lasers : Pulsed lasers and tunable lasers, spatial coherence and directionality, estimates of beam intensity; temporal coherence and spectral energy density.

 


 

खण्ड ‘अ’ : लघु उत्तरीय प्रश्न

 

प्रश्न 1. कला-सम्बद्ध स्त्रोत क्या हैं?

उत्तर : यदि दो प्रकाश-स्रोतों से उत्सर्जित तरंगों के बीच कलान्तर समय के सापेक्ष पूर्णतया स्थिर रहे तो इन्हें कला-सम्बद्ध स्रोत कहते हैं। उनसे उत्सर्जित तरंगें पथ में स्थित पर्दे पर स्थायी व सुपरिभाषित फ्रिन्ज-प्रतिरूप बनाती हैं अर्थात् इसके प्रत्येक बिन्दु पर परिणामी तीव्रता स्थिर रहती है। अधिकतम तीव्रता दोनों तरंगों के आयामों के योग के वर्ग के बराबर होती है।

प्रश्न 2. तरंगों का अध्यारोपण का सिद्धान्त बताइए।

उत्तर : माध्यम के प्रत्येक कण का किसी क्षण परिणामी विस्थापन दोनों तरंगों द्वारा अलग-अलग उत्पन्न विस्थापनों के सदिश योग के बराबर होता है। इस सिद्धान्त को अध्यारोपण का सिद्धान्त कहते हैं।

 

प्रश्न 3. प्रकाश का व्यतिकरण क्या है?

उत्तर : दो प्रकाश-तरंगों के अध्यारोपण से प्रकाश की तीव्रता का असमान वितरण व्यतिकरण (interference) कहलाता है। कुछ बिन्दुओं पर परिणामी तीव्रता अधिकतम होती है तथा इन बिन्दुओं पर हुए व्यतिकरण को संपोषी व्यतिकरण (constructive interference) कहते हैं। कुछ बिन्दुओं पर तीव्रता न्यूनतम होती है (शून्य भी सम्भव है) तथा इन बिन्दुओं पर हुए व्यतिकरण को विनाशी व्यतिकरण (destructive interference) कहते हैं।

 

प्रश्न 4. समान आवर्तकाल तथा समान तरंगदैर्घ्यों की दो तरंगों के अध्यारोपण क्षेत्र

 

 

 

प्रश्न 5. कलान्तर तथा पथान्तर से आप क्या समझते हैं? इनके मध्य क्या सम्बन्ध होता है?

उत्तर : किसी बिन्दु पर मिलने वाली दो तरंगों की कलाओं के अन्तर को कलान्तर कहते हैं तथा तरंग स्रोत से बिन्दु तक पहुँचने के लिए तरंगों द्वारा तय किए गए वास्तविक पथो की लम्बाई के अन्तर को पथान्तर कहते हैं।

इनमें निम्नलिखित सम्बन्ध है,

 

 

 

 

 

प्रश्न 6. न्यूटन के दीप्त वलयों के व्यास का सूत्र बताइए।

 

 

 

 

प्रश्न 7. प्रकाश के व्यतिकरण के लिए प्रतिबन्धों का वर्णन कीजिए।

उत्तर : एक सुस्पष्ट तथा स्थायी व्यतिकरण प्रतिरूप प्राप्त करने के लिए, संपोषी तथा विनाशी व्यक्तिकरण वाले बिन्दुओं पर प्रकाश की तीव्रता क्रमश: अधिकतम तथा लगभग शून्य बनी रहनी चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित प्रतिबन्ध पूरे होने चाहिए। 

स्थायी व्यतिकरण के लिए प्रतिबन्ध

(i) व्यतिकारी तरंगें कला-सम्बद्ध होनी चाहिए, अर्थात् उनके बीच कलान्तर समय के सापेक्ष स्थिर रहना चाहिए।

(ii) दोनों तरंगें समान आवृत्ति की होनी चाहिए।

(ii) यदि व्यतिकारी तरंगें ध्रुवित (polarized) हैं तो वे ध्रुवण की समान अवस्था में होनी चाहिए।

(iv) दोनों कला-सम्बद्ध प्रकाश-स्रोतों के बीच की दूरी (2d) जितना हो सके, कम से कम होनी चाहिए।

(v) दोनों स्रोतों से पर्दे की दूरी (D) पर्याप्त बड़ी होनी चाहिए।

(vi) व्यतिकारी तरंगों के आयाम बराबर अथवा लगभग बराबर होने चाहिए। (vii) दोनों स्रोत संकीर्ण होने चाहिए।

(vii) दोनों स्रोतों से प्राप्त एकवर्णी अथवा लगभग एकवर्णी होना चाहिए। यदि श्वेत प्रकाश है तो व्यतिकारी तरंगों के बीच पथान्तर कम होना चाहिए।

 

प्रश्न 8. साबुन के बुलबुले पर व्यतिकरण प्रतिरूप किस प्रकार प्राप्त होता है? के

अथवा साबुन के बुलबुले पृष्ठ पर एक ही स्थान पर व्यतिकरण रंग प्रतिरूप निरन्तर परिवर्तित होता रहता है। क्यों

उत्तर : साबुन का बुलबुला श्वेत प्रकाश में देखे जाने पर रंगीन दिखाई देता है तथा ये रंग बुलबुले के पृष्ठ की मोटाई बदलने पर बदल जाते हैं । चूँकि साबुन के बुलबुले में साबुन का घोल बुलबुले की तली की ओर अपवाहित होता है, अत: साबुन की फिल्म शीर्ष पर पतली होती जाती है तथा रंग अधिकाधिक चमकीले होते जाते हैं। जब यह मोटाई तरंगदैर्घ्य की कोटि से कम हो जाती है तो शीर्ष पर एक काला बैण्ड बन जाता है। अतः साबुन के बुलबुले के पृष्ठ पर व्यतिकरण प्रतिरूप निरन्तर परिवर्तित होता है।

प्रश्न 9. न्यूटन की वलय क्या है?

उत्तर : जब एक बड़ी वक्रता-त्रिज्या के समतल-उत्तल (Plano-convex) लेन्स को काँच की एक समतल प्लेट पर इस प्रकार रखा जाता है कि लेन्स का उत्तल पृष्ठ समतल प्लेट के सम्पर्क में हो तो लेन्स के निचले पृष्ठ तथा प्लेट के ऊपरी पृष्ठ के बीच एक वायु-फिल्म (air-film) बन जाती है। फिल्म की मोटाई स्पर्श बिन्दु से बाहर की ओर को बढ़ती जाती है। जब इस वायु-फिल्म पर एकवर्णी प्रकाश अभिलम्बवत् डाला जाता है तो फिल्म में अनेक संकेन्द्री वलय (concentric rings) बन जाती हैं जो कि एकान्तर क्रम में दीप्त व अदीप्त (bright and dark) होती हैं। इन संकेन्द्री वलयों का केन्द्र-बिन्दु अदीप्त होता है। ये ‘न्यूटन की वलय (Newton’s rings) कहलाती हैं।

 

प्रश्न 10. फ्रेनल के अर्द्धकाल जोन को परिभाषित कीजिए।

उत्तर : फ्रेनल ने तरंगाग्र को अनेक कटिबन्धों (z0nes) में इस प्रकार विभाजित किया कि प्रत्येक कटिबन्ध का क्षेत्रफल लगभग यDA हो जहाँ D तरंगाग्र की किसी बाह्य बिन्दु से दूरी है।

 

प्रश्न 11. परावर्तित प्रकाश में व्यतिकरण होने पर उच्चिष्ठों तथा निम्निष्ठों के लिए प्रतिबन्ध बताइए।

 

 

 

 

 

प्रश्न 12. जोन प्लेट क्या होती है?

उत्तर : यह एक विशेष प्रकार का विवर्तक पर्दा होता है जिसे इस प्रकार डिजाइन किया जाता है कि फ्रेनल के केवल ‘एकान्तर’ अद्द्धावती कटिबन्ध ही प्रकाश के मार्ग में अवरोधक हों ।

प्रश्न 13. ग्रेटिंग की विभेदन क्षमता की व्याख्या कीजिए।

उत्तर : ग्रेटिंग की विभेदन क्षमता ग्रेटिंग पर अंकित रेखाओं की कुल संख्या तथा स्पेक्ट्रम के क्रम के गुणनफल के बराबर होती है।

 

प्रश्न 14. बाइप्रिज्म प्रयोग में पारदर्शी पदार्थ की पतली प्लेट की मोटाई का सूत्र लिखिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रश्न 15. माइकेल्सन व्यतिकरणमापी से आप क्या समझते हैं?

उत्तर : यह एक प्रकाशीय यन्त्र है जिससे विभिन्न आकृतियों की व्यतिकरण फ्रिन्जे प्राप्त की जा सकती है। इसमें एक प्रकाश-किरण को आंशिक परावर्तन व आंशिक पारगमन द्वारा दो भागों में विभक्त किया जाता है। ये दो किरणें एक-दूसरे के लम्बवत् दिशाओं में जाती हैं तथा पुन: लौटकर एक ही स्थान पर मिलती हैं। इनके बीच व्यतिकरण होता है तथा फ्रिन्जें बनती हैं।

 

प्रश्न 16. टॉलान्स्की फ्रिन्जें क्या होती हैं?

उत्तर : सन् 1945 ई० में वैज्ञानिक टॉलान्स्की ने एकवर्णी प्रकाश स्रोत के स्थान पर श्वेत प्रकाश स्रोत प्रयुक्त करके समान वर्णक क्रम की फ्रिन्जे प्राप्त की जिन्हें टॉलान्स्की फ्रिन्जें कहते हैं। ये फ्रिन्जें वेज फ्रिन्जों (wedge fringes ) की तुलना में अधिक तीक्ष्ण पायी गयीं।

प्रश्न 17. = 1-33 की साबुन की एक पतली फिल्म सोडियम प्रकाश (2 = 5893 A) द्वारा अभिलम्ब परावर्तन पर देखने पर काली प्रतीत पड़ती है। फिल्म की न्यूनतम मोटाई ज्ञात कीजिए।

 

प्रश्न 18. बाइप्रिज्म को परिभाषित कीजिए।

उत्तर : बाइप्रिज्म स्थायी व्यतिकरण के लिए दो कला-सम्बद्ध स्रोत प्राप्त करने की एक युक्ति है। यह अत्यल्प अपवर्तक कोणों के दो प्रिज्मों का संयोग होता है। ये आधारों पर जुड़े होते हैं। बाइप्रिज्म बनाने के लिए काँच की एक ही प्लेट को इस प्रकार घिसते हैं कि वह एक ऐसे प्रिज्म का रूप ले ले जिसका एक कोण 179° का तथा शेष दो कोण 30°-30° के हो तथा फिर इस पर पॉलिश कर लेते हैं।

 

प्रश्न 19. अवर्णक फ्रिन्जें क्या होती हैं?

उत्तर : श्वेत प्रकाश का प्रयोग करके श्वेत व काली फ्रिन्जों का चित्र ही, जिनमें कोई रंग न हो अवर्णक फ्रिन्जे कहलाती हैं।

 

प्रश्न 20. पतली फिल्मों के रंगों को देखने के लिए विस्तृत स्त्रोत क्यों आवश्यक है?

उत्तर : विस्तृत स्रोत की आवश्यकता-आँख द्वारा फिल्म का बड़ा क्षेत्र एक साथ देखने के लिए यह आवश्यक है प्रकाश स्रोत विस्तृत हो।

जब कोई पतली फिल्म संकीर्ण स्रोत द्वारा प्रकाशित होती है तो विभिन्न आपतित किरणों के परावर्तन से प्राप्त विभिन्न व्यतिकारी किरण-युग्म काफी भिन्न-भिन्न दिशाओं में प्राप्त होते हैं। चूँकि आँख की पुतली छोटी होती है, अतः ये सभी किरणें आँख में प्रवेश नहीं कर सकतीं। फिल्म के केवल एक छोटे भाग से ही किरणें ऑँख में प्रवेश कर सकती हैं। अत: यदि आँख को एक स्थिर स्थिति में रखा जाए तो सम्पूर्ण फिल्म को नहीं देखा जा सकता। जब फिल्म को विस्तृत स्रोत से प्रकाशित किया जाता है तो स्रोत के विभिन्न बिन्दुओं से आने वाली किरणें फिल्म के भिन्न-भिन्न भागों से परावर्तित होकर एक निश्चित स्थिति में रखी आँख में प्रवेश कर जाती हैं। अत: आँख को सम्पूर्ण फिल्म एक साथ दिखाई देती है।

 

प्रश्न 21. फ्रेनल तथा फ्राउनहोफर विवर्तन के बीच अन्तर समझाइए।

उत्तर : फ्रेनल तथा फ्राउनहोफर विवर्तन में अन्तर – फ्रेनल विवर्तन में प्रकाश-स्त्रोत अथवा वह पर्दा जिस पर विवर्तन-चित्र प्राप्त किया जाता अथवा दोनों, विवर्तक अवरोध अथवा द्वारक से परिमित दूरी पर होते हैं। इस वर्ग के विवर्तन में लेन्सों का उपयोग नहीं किया जाता तथा आपतित तरंगाग्र गोलाकार अथवा बेलनाकार होता है

चित्र – 1 (a)]। फ्राउनहोफर वर्ग के विवर्तन में प्रकाश-स्रोत तथा पर्दा दोनों ही विवर्तक अनन्त दूरी पर होते हैं। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए स्रोत तथा पर्दे को दो लेन्सों के फोकस-तलों में रखते हैं। इसमें आपतित तरंगाग्र समतल होता है चित्र-1 (b)]।

उपर्युक्त वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि फ्राउनहोफर विवर्तन के लिए समतल s: तरंगाग्र आवश्यक है। परन्तु ऐसा आवश्यक नहीं है। फ्राउनहोफर विवर्तन गोलीय अथवा बेलनाकार तरंगाग्रों से भी प्राप्त किया जा सकता है। वास्तव में, फ्राउनहोफर विवर्तन में विवर्तन-चित्र स्त्रोत का प्रतिबिम्ब होता है जो कि विवर्तक अवरोध अथवा द्वारक पर विवर्तन द्वारा रूपान्तरित हो जाता है। फ्रेनल के विवर्तन में विवर्तन-चित्र विवर्तक अवरोध अथवा द्वारक की छाया होती है जो कि विवर्तन प्रभावों द्वारा रूपान्तरित हो जाती है । अत: फ्राउनहोफर विवर्तन के लिए आवश्यक प्रतिबन्ध यह है कि विवर्तन-चित्र उस तल में बनना चाहिए जो कि प्रकाश-स्रोत के तल के संयुग्मी (conjugate) हो। फ्राउनहोफर का विवर्तन फ्रेनल के विवर्तन की सीमान्त स्थिति है।

 

प्रश्न 22. प्रकाश के व्यतिकरण तथा विवर्तन के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : व्यतिकरण तथा विवर्तन में अन्तर- व्यतिकरण की परिघटना में, व्यतिकरण दो अथवा अधिक परन्तु परिमित संख्या में कला-सम्बद्ध स्रोतों से चलने वाली तरंगों के बीच होता है। दूसरी ओर विवर्तन में, एक ही तरंगाय के विभिन्न बिन्दुओं से चलने वाली द्वितीयक तरंगिकाओं के बीच व्यतिकरण होता है। परन्तु दोनों ही अध्यारोपण के प्रभाव हैं तथा सामान्यतया दोनों एक साथ उपस्थित होते हैं, जैसा कि यंग के प्रयोग में होता है। व्यतिकरण तथा विवर्तन प्रतिरूपों में निम्नलिखित अन्तर होते हैं

(1) व्यतिकरण प्रतिरूप में निम्निष्ठ सामान्यतया लगभग अदीप्त ( काले) होते हैं, जबकि विवर्तन प्रतिरूप में ऐसा नहीं होता।

(2) व्यतिकरण प्रतिरूप में सभी उच्चिष्ठ समान तीव्रता के होते हैं, परन्तु विवर्तन प्रतिरूप में ऐसा नहीं होता।

(3) व्यतिकरण फ्रिन्जे प्राय: समान चौड़ाई की होती हैं, परन्तु विवर्तन फ्रिन्जें कभी भी समान चौड़ाई की नहीं होती।

 

प्रश्न 23. किसी जोन प्लेट के केन्द्रीय जोन का व्यास 2. 8 x 10 मीटर है। यदि प्रकाश (2 = 5890 A) का बिन्दु स्त्रोत इससे 6 मीटर की दूरी पर हो, तब स्रोत के प्रथम प्रतिबिम्ब की स्थिति ज्ञात कीजिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रश्न 24. प्रकाश के विवर्तन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: यदि प्रकाश स्रोत तथा पर्दे के बीच कोई अपारदर्शक अवरोध या द्वारक रख दिया जाए तो पर्दे पर इसकी स्पष्ट छाया बनती है। इससे यह पता चलता है कि प्रकाश सरल रेखा में चलता है। यदि अवरोध या द्वारक प्रकाश की तरंगदैर्घ्य की कोटि का हो तो प्रकाश द्वारक के किनारों पर मुड़ जाता है। अवरोधक या द्वारक के नुकीले किनारों पर प्रकाश के मुड़ने की घटना को प्रकाश का विवर्तन कहते हैं।

 

प्रश्न 25. पतली फिल्मों में रंग क्यों दिखाई देते हैं?

उत्तर : पतली फिल्मों में रंग फिल्म के ऊपरी तथा निचले पृष्ठों से परावर्तित प्रकाश-तरंगों के बीच व्यतिकरण होने से उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 26. अवतल ग्रेटिंग का सिद्धान्त बताइए।

उत्तर : अवतल ग्रेटिंग का स्पेकुलम (speculum) धातु (32% टिन तथा 68% तॉबा) का पॉलिश किया हुआ अवतल पृष्ठ होता है जिस पर चाप की जीवा के अनुदिश (along the chord of the arc) समान दूरियों पर बहुत महीन समान्तर रेखाएँ खींची जाती हैं। जब इस प्रकार की ग्रेटिंग पर प्रकाश गिरता है तो विवर्तन के पश्चात् प्रकाश स्वत: ही, बिना लेन्सों की सहायता के फोकस हो जाता है।

प्रश्न 27. ग्रेटिंग की वर्ण-विक्षेपण क्षमता किसे कहते हैं?

उत्तर : जब श्वेत प्रकाश किसी ग्रेटिंग में से गुजरता है तो विवर्तन-चित्र में, विभिन्न तरंगदैर्घ्यों (रंगों) के उच्चिष्ठ विभिन्न दिशाओं में पड़ते हैं। दूसरे शब्दों में, विभिन्न तरंगदैघ्घ्ों के लिए विवर्तन कोण भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रकाश की तरंगदैर्घ्य के साथ विवर्तन कोण के परिवर्तन की दर को ग्रेटिंग की वर्ण-विक्षेपण क्षमता कहते हैं। यदि तरंगदैर्घ्य में d का परिवर्तन होने पर विवर्तन कोण में de का परिवर्तन हो, तो ग्रेटिंग की वर्ण- विक्षेपण क्षमता D0Dhसे व्यक्त की जाती है।

 

प्रश्न 28. सोडियम प्रकाश की रेखाओं (5890 A तथा 5896 A) के विभेदन हेतु ग्रेटिंग मेंआ वश्यक न्यूनतम रेखाओं की संख्या प्रथम क्रम के स्पेक्ट्रम के लिए ज्ञात कीजिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रश्न 29. ग्रेटिंग में कम-से-कम कितनी लाइनें होनी चाहिए, जिससे वह द्वितीय क्रम में 5890 A तथा 5896 A की तरंगों का पूर्णरूप से विभेदन कर सके? = nN में दिए गए मान रखकर N का मान ज्ञात किया जा सकता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रश्न 30. ग्रेटिंग की वर्ण-विक्षेपण क्षमता तथा विभेदन क्षमता में क्या अन्तर है?

उत्तर : विवर्तन ग्रेटिंग की वर्ण-विक्षेपण क्षमता से स्पेक्ट्रम की रेखाओं के बीच कोणीय हटाव (angular separation) का ज्ञान है। इसका मान de da द्वारा मापा जाता है, जहाँ de, d2 के तरंगदैर्घ्य-अन्तर की दो स्पेक्ट्रमी रेखाओं के बीच कोणीय हटाव है। इसका मान निम्नलिखित समीकरण द्वारा दिया जाता है-

विवर्तन ग्रेटिंग की विभेदन क्षमता स्पेक्ट्रमी रेखाओं की निकटता की उस कोटि को व्यक्त करती है जिससे उनमें विभेद किया जा सके। इसका मान da d, तरंगदैर्घ्य A पर वह न्यूनतम तरंगदैर्घ्य अन्तर है जिसको ठीक विभेदित किया जा सकता है। इसका मान निम्नलिखित समीकरण द्वारा दिया जाता है द्वारा मापा जाता है जहाँ

 

प्रश्न 31. एक संकीर्ण स्लिट के कारण फ्राउनहोफर विवर्तन चिह्न में केन्द्रीय उच्चिष्ठ की चौड़ाई क्या होती है?

उत्तर : एक संकीर्ण स्लिट के कारण फ्राउनहोफर विवर्तन चिह्न में केन्द्रीय उच्चिष्ठ की

 

 

 

प्रश्न 32. 6400 के प्रकाश तथा 16 सेमी फोकस दूरी की जोन प्लेट के लिए प्रथम जोन की त्रिज्या की गणना कीजिए।

 

प्रश्न 33. किसी प्रकाशिक यन्त्र की विभेदन क्षमता से आप क्या समझते हैं?

उत्तर : किसी प्रकाशिक यन्त्र द्वारा दो बहुत समीप की वस्तुओं के प्रतिबिम्बों को अलग-अलग करने की क्षमता को उस यन्त्र की विभेदन क्षमता कहते हैं। विभेदन दो प्रकार के होते हैं-(1) ज्यामितीय विभेदन, (2) स्पेक्ट्रमी विभेदन। जब दो पास – पास की वस्तुओं के बीच विभेदन करना होता है तो हम उसे ज्यामितीय विभेदन तथा जब दो तरंगदैर्घ्यों के बीच विभेदन करना होता है तो उसे स्पेक्ट्रमी विभेदन कहते हैं। दूरदर्शी एवं सूक्ष्मदर्शी द्वारा हमें ज्यामितीय विभेदन तथा प्रिज्म एवं ग्रेटिंग द्वारा स्पेक्ट्रमी विभेदन प्राप्त होता है।

विभेदन क्षमता की माप उस कोण से की जाती है, जिसे दो सन्निकट वस्तुएँ दूरदर्शी अथवा सूक्ष्मदर्शी के अभिदृश्यक लेन्स (objective lens) पर बनाती हैं। इस कोण का मान जितना छोटा होता है, यन्त्र की विभेदन क्षमता उतनी ही अधिक होती है। आँख की विभेदन क्षमता एक मिनट (कोण) के बराबर होती है, अर्थात् यदि दो सन्निकट वस्तुएँ आँख पर एक मिनट का कोण बनाएँ तो आँख उन्हें अलग-अलग देख सकेगी।

 

प्रश्न 34. किसी प्रकाशिक यन्त्र की विभेदन क्षमता के लिए रैले की कसौटी क्या है?

उत्तर : किसी प्रकाशिक यन्त्र द्वारा समान तीव्रता की दो निकटस्थ स्पेक्ट्रमी रेखाएँ तभी ठीक विभेदित होती हैं जबकि एक के विवर्तन-चित्र का मुख्य उच्चिष्ठ दूसरी के विवर्तन चित्र के प्रथम निम्निष्ठ से संपाती हो।

 

प्रश्न 35. रोलैण्ड के आरोपण को समझाइए।

उत्तर : इस आरोपण में क्षैतिज तल में एक-दूसरे के लम्बवत् दो लोहे की पटरियाँ होती हैं जिन पर खिसकने वाली दो ट्रॉलियों पर ग्रेटिंग G तथा प्लेट-होल्डर P लगे होते हैं। G तथा P को पटरियों पर चलाया जा सकता है तथा ये दृढ़ छड़ के द्वारा जुड़ी होती हैं जिसकी लम्बाई ग्रेटिंग की वक्रता त्रिज्या R के बराबर होती है। दोनों पटरियों के जंक्शन पर एक स्लिट S होती है।

 

प्रश्न 36. कम्पन-तल व ध्रुवण-तल से आप क्या समझते हो?

उत्तर : समतल-ध्रुवित प्रकाश में वह तल जो कम्पन की दिशा तथा प्रकाश-संचरण की दिशा से गुजरता है कम्पन-तल कहलाता है।

प्रकाश-संचरण की दिशा से जाने वाला वह तल जो कम्पन-तल के लम्बवत् है, ध्रुवण तल कहलाता है। अत: ध्रुवण-तल प्रकाश-संचरण की दिशा से गुजरने वाला वह तल है जिसमें कोई कम्पन नहीं होती।

 

प्रश्न 37. प्रकाश के ध्रुवण को परिभाषित कीजिए।

उत्तर : जब साधारण प्रकाश टूरमैलीन की दो ऐसी समान्तर पट्टिकाओं पर अभिलम्बवत् गिरता है जो अपनी क्रिस्टलीय अक्षों के समान्तर काटी गई हैं तो पट्टिका को प्रकाश के संचरण की दिशा के परितः घुमाने पर उससे निर्गत प्रकाश की तीव्रता में परिवर्तन होता है। इस प्रकाश को समतल धुवित प्रकाश कहते हैं। इस घटना को जिसके कारण प्रकाश में, संचरण की दिशा के सापेक्ष सममिती की कमी हो जाती है अथवा प्रकाश में संचरण की दिशा के सापेक्ष एक पार्श्व यता आ जाती है, ‘प्रकाश का ध्रुवण’ कहते हैं।

 

प्रश्न 38. ध्रुवण कोण क्या है?

उत्तर : ध्रुवण कोण वह आपतन कोण होता है जिस पर परावर्तित किरण पूर्णतः समतल ध्रुवित हो जाती है। वायु काँच के लिए ध्रुवण कोण का मान 57° होता है।

प्रश्न 39. किसी अपवर्तन सतह के लिए अपलानटिक बिन्दु क्या हैं?

उत्तर : अपलानटिक बिन्दु या अविपथी बिन्दु-किसी पृष्ठ का वह गुण जिसके कारण पृष्ठ की अक्ष पर स्थित किसी बिन्दु-वस्तु से चलने वाली सभी प्रकाश-किरणें, पृष्ठ से परावर्तित अथवा अपवर्तित होने के पश्चात् एक अकेले बिन्दु-प्रतिबिम्ब पर अभिसारित होती हैं अथवा इस बिन्दु से अपसरित होती प्रतीत होती हैं। ये विशिष्ट वस्तु बिन्दु तथा प्रतिबिम्ब-बिन्दु अपलानटिक या अविपथी बिन्दु कहलाते हैं तथा पृष्ठ को इन बिन्दुओं के सापेक्ष अविपथी कहा जाता है।

प्रश्न 40. बूस्टर का नियम क्या है? समझाइए।

उत्तर : जब अध्रुवित प्रकाश किसी पारदर्शी पदार्थ के पृष्ठ पर आपतित होता है तो परावर्तित तथा अपरिवर्तित प्रकाश पुंज आंशिक रूप से समतल-ध्रुवित होते हैं। परावर्तित प्रकाश में ध्रुवित प्रकाश की मात्रा आपतन कोण पर निर्भर करती है। एक विशेष आपतन कोण पर परावर्तित प्रकाश पूर्णतया ध्रुवित होता है। इस आपतन कोण को ध्रुवण कोण कहते हैं। ध्रुवण कोण p तथा पारदर्शी अपवर्तनांक में एक सरल सम्बन्ध होता है। यह सम्बन्ध ‘ब्रूस्टर का नियम कहलाता है।

u= tan p

 

प्रश्न 41. समतल-ध्रुवित प्रकाश क्या है?

उत्तर : समतल-ध्रुवित प्रकाश वह प्रकाश होता है जिसमें प्रकाश-वेक्टर, प्रकाश के संचरण की दिशा के लम्बवत् तल में एक स्थिर लम्बरेखा के अनुदिश कम्पन करता है।

प्रश्न 42. साधारण तथा असाधारण किरणें क्या हैं? अलग-अलग दिशाओं में असाधारण किरणों के लिए अपवर्तनांक का मान अलग-अलग क्यों होता है?

उत्तर : जब अध्रुवित प्रकाश की कोई किरण कैलसाइट (अथवा क्वार्ट्ज) क्रिस्टल पर आपतित की जाती है तो यह दो अपवर्तित किरणों में विभक्त हो जाती है । इन दो अपवर्तित किरणों में से एक किरण अपवर्तन के नियमों का पालन करती है, अर्थात यह सदैव आपतन-तल में रहती है तथा क्रिस्टल में इसका वेग सभी दिशाओं में समान होता है। इस किरण को ‘साधारण किरण’ (ordinary ray) कहते हैं। दूसरी अपवर्तित किरण अपवर्तन के नियमों का पालन नहीं करती। यह क्रिस्टल में विभिन्न दिशाओं में विभिन्न चालों से चलती है। इस किरण को ‘असाधारण किरण’ (extraordinary ray) अथवा E-किरण कहते हैं। चूंकि असाधारण किरण क्रिस्टल के भीतर अलग-अलग दिशाओं में अलग-अलग चालों से चलती है अत: इस किरण के लिए अलग-अलग दिशाओं में क्रिस्टल का अपवर्तनांक भी अलग-अलग होता है।

प्रश्न 43. वृत्त ध्रुवित प्रकाश को समझाइए।

उत्तर : जब दो समतल-ध्रुवित प्रकाश तरंगें एक-दूसरे पर अध्यारोपित होती हैं तो कुछ विशेष परिस्थितियों में परिणामी प्रकाश वेक्टर के कम्पन संचरण की दिशा के अभिलम्बवत् तल में एक निश्चित आयाम से परिभ्रमण करता है। इस अवस्था में वैद्युत वेक्टर की नोक एक वृत्त का अभिलेखन (tracing) करती है । इस प्रकाश को वृत्त ध्रुवित प्रकाश कहते हैं।

प्रश्न 44. दीर्घवृत्त ध्रुवित प्रकाश को समझाइए।

उत्तर : जब दो समतल ध्रुवित तरंगें एक-दूसरे पर इस प्रकार अध्यारोपित होती हैं कि कुछ विशेष परिस्थितियों में परिणामी वैद्युत वेक्टर प्रकाश संचरण की दिशा के अभिलम्बवत् तल में परिभ्रमण करता है तथा इनका आयाम आवर्तरूप (periodically) से अधिकतम व न्यूनतम के बीच बदलता रहता है। इस परिस्थिति में वैद्युत वेक्टर की नोक (tip) एक दीर्घवृत्त का अभिलेखन करती है। इस प्रकार प्राप्त प्रकाश को दीर्घवृत्त ध्रुवित प्रकाश (elliptically polarized light) कहते हैं।

प्रश्न 45. किसी पदार्थ के विशिष्ट घूर्णन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर : विशिष्ट घूर्णन-किसी विशेष ताप तथा प्रकाश की किसी विशेष तरंगदैर्घ्य के लिए, किसी पदार्थ का विशिष्ट घूर्णन s उस घूर्णन (डिग्री में) के बराबर है, जो उस पदार्थ के घोल की एक डेसीमीटर लम्बाई द्वारा उत्पन्न होता है, जबकि घोल की सान्द्रता 1 ग्राम प्रति घन सेमी है, अर्थात् एक विलयन के लिए

 

 

 

जहाँ 0 (डिग्री में) घूर्णन है, 1 घोल की (डेसीमीटर में) लम्बाई है तथा C घोल की (ग्राम प्रति घन सेमी में) सान्द्रता है।

 

प्रश्न 46. मैलस का नियम समझाइए।

उत्तर : जब एक समतल रेखा ध्रुवित प्रकाश विश्लेषक पर आपतित होता है, तब इससे पारगमित प्रकाश की तीव्रता, ध्रुवक व विश्लेषक के संचरण तलों अथवा प्रकाशिक अक्षों के बीच के कोण 0 की कोज्या के वर्ग के समानुपाती होती है, 

प्रश्न 47. पोलेरॉइड क्या है?

उत्तर : यह समतल-ध्रुवित प्रकाश उत्पन्न करने की एक सस्ती व्यापारिक विधि है। यह एक बड़े आकार की ध्रुवण-फिल्म होती है जिसे दो काँच की प्लेटों के बीच रखा जाता है। इस ध्रुवण फिल्म को तैयार करने के लिए कार्बनिक यौगिक हरपेथाइट (herpathite or iodosulphate of quinine) के अतिसूक्ष्म क्रिस्टल (ultramicroscopic crystals) नाइट्रोसेलुलोस (nitrocellulose) की एक पतली चादर पर किसी विशेष विधि द्वारा इस प्रकार फैला दिए जाते हैं. कि सभी क्रिस्टलों की प्रकाशिक अक्षें एक दिशा में हों।

 

प्रश्न 48. पोलेरॉइड के उपयोगों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर : पोलेरॉइड के उपयोग-

(1) इनका उपयोग प्रयोगशाला में समतल-घध्रुवित प्रकाश उत्पन्न करने एवं विश्लेषण करने में किया जाता है।

(2) इनका उपयोग धूप के चश्मों में किया जाता है।

(3) इनका उपयोग वायुयान, रेलगाड़ी आदि की खिड़कियों से अन्दर आने वाले प्रकाश की चकाचौंध को रोकने के लिए किया जाता है।

(4) इनके द्वारा त्रिविमीय चित्रों को देखा जा सकता है।

 

प्रश्न 49. समतल ध्रुवित प्रकाश के धुवण-घूर्णन से आप क्या समझते हैं?

उत्तर : ध्रुवण-घूर्णन अथवा घूर्णी धुरुवण- जब समतल-ध्रुवित प्रकाश कुछ विशिष्ट पदार्थों से गुजरता है तो प्रकाश का ध्रुवण-तल ( plane of polarization) प्रकाश के संचरण की दिशा के परितः किसी कोण से घूम जाता है। यह परिघटना ‘ध्रुवण-घूर्णन’ (optical rotation) अथवा ‘घूर्णी-ध्रुवण (rotatory polarization ) कहलाती है वे पदार्थ जो कि ध्रुवण-तल को घुमाते हैं, ‘ध्रुवण-घूर्णक’ (optically-active) कहलाते हैं तथा यह गुण ‘ध्रुवण घूर्णकता’ (optical activity) कहलाता है।

प्रश्न 50. निकॉल प्रिज्म किस सिद्धान्त पर कार्य करता है?

उत्तर : यह कैलसाइट क्रिस्टल से बना एक विशेष प्रिज्म होता है जो समतल ध्रुवित प्रकाश को उत्पन्न करने तथा विश्लेषित करने के काम आता है। यह द्वि-अपवर्तन के सिद्धान्त पर कार्य करता है।

प्रश्न 51. बाई-क्वार्ट्ज ध्रुवणमापी का उपयोग तथा मुख्य भाग बताइए।

उत्तर : इस विधि द्वारा ध्रुवण-घूर्णक पदार्थों का ध्रुवण-घूर्णन सरलता एवं यथार्थता से जात किया जा सकता है। इसमें अर्द्ध- आवरण ध्रुवणमापी की तरह एक उत्तल लेन्स, एक ध्रुवक निकॉल, एक बाई-क्वार्ट्स प्लेट, एक नलिका जिसमें ध्रुवण- घूर्णक घोल भरा होता है, एक विश्लेषक निकॉल तथा एक दूरदर्शक व्यवस्थित होते हैं। परन्तु इसमें अर्द्ध- आवरण प्लेट के स्थान पर बाई-क्वार्ट्ज प्लेट होती है तथा इसमें सोडियम प्रकाश के स्थान पर श्वेत प्रकाश से प्रदीप्त किया जाता है।

प्रश्न 52. अर्द्ध-तरंग पट्टिका को वर्णित कीजिए । धुवित प्रकाश के अध्ययन में इसका क्या उपयोग है?

उत्तर : यह एक, एक-अक्षीय, द्वि-अपवर्तक क्रिस्टल की प्लेट होती है, जिसकी प्रकाशिक-अक्ष इसके अपवर्तक तलों के समान्तर होती है। इस प्लेट की मोटाई इतनी रखी जाती है कि यह साधारण (O) तथा असाधारण (E) तरंगों के बीच 2/2 का पथान्तर अथवा का कलान्तर उत्पन्न कर दे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

इसके कम्पन की दिशा आपतित प्रकाश के कम्पन की दिशा से 20 कोण पर झुकी रहती है. जहाँ से आपतित कम्पन तथा मुख्य परिच्छेद के बीच का कोण है। इसका उपयोग ध्रुवणमापी में अर्द्ध-आवरण प्लेट के रूप में दृष्टि-क्षेत्र को दो भागों में विभक्त करने के लिए किया जाता है।

 

प्रश्न 53. चतुर्थांश-तरंग पट्टिका क्या ध्रुवित प्रकाश का अध्ययन करने में इसका क्या उपयोग है?

उत्तर : चतुर्थांश-तरंग पट्टिका- यह एक-अक्षीय, द्वि-अपवर्तक क्रिस्टल की प्लेट होती है, जिसकी प्रकाशिक-अक्ष इसके अपवर्तक तलों के समान्तर होती है। इस प्लेट की मोटाई इतनी रखी जाती है कि यह साधारण (O-तरंग) तथा असाधारण (E-तरंग) तरंगों के बीच π /4 का पथान्तर अथवा π /2 का कलान्तर उत्पन्न कर दे। माना । तरंगदैर्घ्य का एकवर्णी प्रकाश (214) प्लेट पर अभिलम्बवत् आपतित होता है, प्लेट के अन्दर प्रकाश, 0 तथा E तरंगों में विभक्त हो जाता है। हाइगेन्स की द्वि-अपवर्तक रचना के अनुसार दोनों तरंगें क्रिस्टल के तल के अभिलम्बवत् एक ही मार्ग का अनुसरण करती हैं, परन्तु इनके वेग अलग-अलग होते हैं।

 

अत: एक ही  π  के लिए (π / 4) प्लेट की मोटाई (π /2) प्लेट से आधी होती है। π /4 प्लेट, वृत्त-ध्रुवित तथा दीर्घवृत्त ध्रुवित प्रकाश उत्पन्न करने के काम में लायी जाती है। निकॉल प्रिज्म के साथ यह सभी प्रकार के ध्रुवित प्रकाशों के विश्लेषण में प्रयुक्त की जाती है।

 

प्रश्न 54. दो निकोल प्रिज्म अपने मुख्य समतलों के मध्य 30° के अन्तर के साथ रखे हैं। आपतित अध्रुवित प्रकाश का कितने प्रतिशत इस व्यवस्था से पार होगा?

 

प्रश्न 55. प्रकाशिक-अक्ष के समान्तर कटे क्वार्ट्ज क्रिस्टल पर समतल-ध्वित प्रकाश आपतित होता है। क्रिस्टल की कम-से-कम क्या मोटाई हो कि O एवं E किरणें मिलकर समतल-धुवित प्रकाश बना सकें? दिया है : 0 = 1.5442, 4 = 15533 तथा 2 = 5 x 10-5 सेमी।

 

प्रश्न 56. द्वि-अपवर्तन से आप क्या समझते हैं?

उत्तर : अध्रुवित प्रकाश का एक किरण पुंज जब कैलसाइट अथवा क्वार्ट्ज क्रिस्टल पर आपतित होता है, तब अपवर्तन के पश्चात् यह दो किरण पुंजों में विभक्त हो जाता है । इसी घटना को द्वि-अपवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 57. कला-सम्बद्ध लम्बाई व कला-सम्बद्ध समय को परिभाषित कीजिए।

उत्तर : वह औसत समयान्तराल जिसमें वैद्युत क्षेत्र ज्यावक्रीय रहता है, प्रकाश पुंज का सम्बद्धता काल या कला-सम्बद्ध समय कहलाता है। इसे कैसे व्यक्त करते हैं। वह दूरी जिसके लिए वैद्युत क्षेत्र ज्यावक्रीय रहता है कला-सम्बद्ध लम्बाई अथवा सम्बद्धता लम्बाई कहलाती है।

L=tC

जहां c प्रकाश की चाल तथा L प्रकाश पुंज की कला-सम्बद्ध लम्बाई है। प्रश्न 58. पूर्णतः सम्बद्ध तरंग से आप क्या समझते हो? उत्तर : वह तरंग जो कि अनन्त काल तक अथवा शुद्ध ज्या तरंग (sine wave) के रूप में प्रतीत हो, पूर्णतः सम्बद्ध तरंग कहलाती है।

प्रश्न 59, कालिक-सम्बद्धता क्या है?

उत्तर : वह औसत समयान्तराल जिसमें वैद्युत क्षेत्र ज्यावक्रीय रहता है, प्रकाश-पुंज का के सम्बद्धता काल (coherence time) अथवा कालिक-सम्बद्धता (temporal स coherence) कहलाता है तथा r से निरूपित किया जाता है। वह दूरी L जिसके लिा ज्यावक्रीय रहता है, निम्न होगी –

L=tc

जहाँ c प्रकाश की चाल है। L प्रकाश-पुंज की सम्बद्धता लम्बाई (coherences length) कहलाती है।

 

प्रश्न 60. ‘स्पेक्ट्रमी रेखा की शुद्धता’ का क्या अर्थ है?

उत्तर : प्रत्येक स्पेक्ट्रमी रेखा की एक परिमित चौड़ाई होती है। इसका अर्थ है कि स्पेक्ट्रमी रेखा में एक संकीर्ण तरंगदैर्घ्य अन्तराल में (माना 2 व 2 + A2 के बीच) तरंगदैर्यों का सतत वितरण होता है।

 

प्रश्न 61. जनसंख्या प्रतिलोमन तथा पम्पन प्रक्रिया को समझाइए।

उत्तर : वह स्थिति जिसमें उच्च ऊर्जा-अवस्था में परमाणुओं की संख्या निम्न ऊर्जा अवस्था की संख्या से अधिक हो जाती है (N2 >N) ‘समष्टि व्युत्क्रमण अथवा जनसंख्या प्रतिलोमन’ कहलाती है। इस स्थिति में परमाणुओं से लेसर क्रिया होती है।

समष्टि व्युत्क्रमण प्राप्त करने की क्रिया को ‘पम्पन’ कहते हैं। पम्पन क्रिया कई प्रकार होती है, परन्तु सर्वाधिक प्राकृतिक क्रिया ‘प्रकाशिक पम्पन’ है।

प्रश्न 62. शक्कर के घोल का विशिष्ट घूर्णन ज्ञात कीजिए, यदि यह कम्पन तल को 13.2 से घुमा दे। नली की लम्बाई जिसमें घोल रखा जाता है 20 सेमी है तथा घोल की सान्द्रता 10% है।

 

प्रश्न 63. किसी भी लेसर के मुख्य घटक क्या होते हैं?

उत्तर : किसी भी लेसर युक्ति के तीन मुख्य घटक होते हैं

  1. ऊर्जा स्त्रोत-इसे प्रायः पम्प कहते हैं। इसका कार्य लेसर माध्यम के अणुओं को ऊर्जा देकर उन्हें किसी मितस्थायी ऊर्जा स्तर में एकत्रित करना होता है।
  2. लेसर माध्यम-यह एक ऐसा पदार्थ होता है जिसके अणुओं के सामान्य ऊर्जा स्तरों का के बीच कोई मितस्थायी ऊर्जा स्तर होता है जहाँ अणु अपेक्षाकृत पर्याप्त समय तक रुक सकते हैं।
  3. दो अथवा अधिक परावर्तक-इनका कार्य अनुनाद द्वारा कला-सम्बद्ध प्रकाश की तीव्रता को बढ़ाना है।

 

प्रश्न 64. लेसर के कुछ अनुप्रयोग बताइए।

उत्तर : लेसर-पुंज, संकीर्ण, तीव्र, समान्तर, एकवर्णी तथा उच्च सम्बद्धता का होता है, अत: इसके विभिन्न क्षेत्रों के अनुप्रयोग लगातार बढ़ रहे हैं।

(i) चिकित्सा के क्षेत्र में, लेसर-पुंज का उपयोग अत्यन्त सूक्ष्म शल्य क्रिया (सर्जरी) जैसे कॉर्निया ग्राफ्टिंग (cornea grafting) में किया जाता है।

(ii) युद्ध स्तर पर लेसरों का उपयोग शत्रु की मिसाइलों को पहचान कर नष्ट करने में किया जाता है।

(iii) तकनीकी तथा औद्योगिक क्षेत्र में, लेसर-पुंज एक ओर तो कपड़ों के लिए धागे (fabric) काटने के काम आता है तथा दूसरी ओर स्टील की चादरों को भी काटने के काम आता है।

(iv) लेसर का उपयोग त्रिविमिय फोटोग्राफी (holography) तथा अरेखीय प्रकाशिकी (non-linear optics) में किया जाता है।

(v) लेसर किरणें नाभिकीय विस्फोटों तथा भूकम्पों के संसूचन में, रॉकेटों के ठोस ईंधन के वाष्पन में तथा दूर-स्थित ग्रहों व उपग्रहों के गहन अध्ययन में अत्यन्त उपयोगी साबित हुई है।

 

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