Bsc 2nd Year Botany V Cytology Genetics Evolution And Ecology Short Notes

Bsc 2nd Year Botany V Cytology Genetics Evolution And Ecology Short Notes :-

UNIT – I 

Cell structure, cell organelles, nucleus, chromosome structure, nucleosome and solenoid model, salivary gland, lampbrush and B chromosomes.

Cell division : mitosis, meiosis, their significance, chromosomal aberrations, cell cycle.

UNIT – II

Genetics : laws of inheritance, gene interaction, linkage and crossing over, cytoplasmic inheritance, sex determination.

UNIT – III 

Mutation : spontaneous, induced mutations, molecular mechanism and evolutionary significance, polyploidy origin, kinds and role in evolution. Evidences and theories of evolution,

UNIT – IV

Ecology : relation with other disciplines. Plant types : Hydrophytes-Hydrilla, Eichhornia, Nymphaea, Typha.

Xerophytes : Nerium, Casuarina, Asparaus, Calotropis, Parkinsonia. Plant sucession : xeroseres, hydroseres. Ecosystems : concept, basic types, components & functioning. Food chain, food web, energy flow and productivity.

खण्ड ‘अ’ :

लघु उत्तरीय प्रश्ऩ

प्रश्न 1 – रिक्तिका के कार्य पर टिप्पणी लिखों। 

उत्तर – रिक्तिका के कार्य

(Functions of Vacuole) 

रिक्तिका के कार्य निम्न प्रकार हैं.. 

(1) पादप कोशिका के अन्दर रिक्तिका स्फीति दाब (turgor pressure) को बनाए रखती है जिसके कारण कोशिका कला को कोशिका भित्ति के विपरीत बना रहना होता है तथा कोशिका का आकार बना रहता है। स्फीति दाब रिक्तिका के द्वारा उच्च परासरण दाब बनाने के कारण बनता है। टोनोप्लास्ट में अनेक सक्रिय अभिगमन तन्त्र तथा आयन पम्प आदि बाह्य द्रव के विपरीत अधिक होते हैं। रिक्तिका रस (cell sap) में उच्च आयन सान्द्रता के कारण ही जल परासरण द्वारा कोशिका में प्रवेश करता है।

(2) रिक्तिका द्वारा लगाए गए दाब के कारण ही पौधों के मुलायम ऊतक को सहारा मिलता है। यह कोशिका वृद्धि के समय कोशिका भित्ति को भी बनाने में सहायता करती है।

(3) रिक्तिकाएँ परासरण नियमन (osmoregulation) का कार्य करती हैं। ये संचयन तथा पाचन में भी सहायक हैं।

(4) रिक्तिकाओं में कुछ पाचक विकर भी मिलते हैं, जो कोशिकाद्रव्य के तत्त्वों तथा उपापचयी पदार्थों का विघटन कर सकते हैं। पादपों में लाइसोसोम नहीं मिलते हैं, परन्तु कुछ रिक्तिकाएँ जिनमें पाचक विकर मिलते हैं, जन्तुओं के लाइसोसोम की तरह ही कार्य करती हैं।

(5) पाचक विकर ER अथवा गॉल्जी तन्त्र में उत्पन्न होते हैं, वहाँ से वे कलायुक्त थैलियों के रूप में रिक्तिका तक पहुँचाए जाते हैं। कोशिका के जीवन में विकर की मात्रा परिवर्तित होती है तथा ये भिन्न-भिन्न मात्रा में भिन्न-भिन्न कोशिकाओं में मिलते हैं। कुछ रिक्तिकाओं में पाचक विकर बिल्कुल नहीं मिलते हैं।

(6) रिक्तिका का pH, Ht-ATPase द्वारा टोनोप्लास्ट में कम बनाए रखा जाता है। ये रिक्तिका रस में बाहर से प्रोटॉन भेजते रहते हैं।

(7) बहुत-से पादप रिक्तिका की प्रोटीन्स RER पर उपस्थित राइबोसोम द्वारा संश्लेषित होती हैं तथा गॉल्जी तन्त्र से होकर रिक्तिका तक पहुँचती हैं।

(8) विकसित हो रहे बीजों में 50% तक नए संश्लेषित होने वाली प्रोटीन्स रिक्तिकाओं में संचय की जाती हैं।

प्रश्न 2 – नवलैमार्कवाद के विषय में विवरण दीजिए। 

उत्तर – नवलैमार्कवाद या नियोलैमार्कवाद

(Neo – Lamarckism) 

कुछ वैज्ञानिकों ने लैमार्कवाद को सही माना 

  1. समनर का प्रयोग (Summer’s experiment)-समनर ने सफेद चूहों को 20° C-30° C पर पाला जिसके परिणामस्वरूप उनका शरीर, पूँछ तथा पिछली टाँगें लम्बी हो गईं। यह उपार्जित लक्षण उनमें पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानान्तरित होता गया।
  2. मैकडूगल का प्रयोग (McDugal’s experiment, 1938)-मैकडूगल ने 44 पीढ़ियों तक सफेद चूहों को पानी में टेढ़े-मेढ़े रास्ते से निकलने का प्रशिक्षण दिया। उन्होंने पाया कि शुरू में चूहों को काफी प्रशिक्षण देना पड़ता था लेकिन धीरे-धीरे पीढ़ी दर पीढ़ी इनका प्रशिक्षण समय कम होता गया।
  3. कैमरर का प्रयोग (Kammerer’s éxperiment, 1924)–सन् 1924 में कैमरर ने कुछ सैलामेण्डर को काले वातावरण में तथा कुछ को पीले वातावरण में रखा। कुछ वर्षों बाद काले वातावरण में रखे गए सैलोमण्डर के शरीर पर काले धब्बे तथा पीले वातावरण, में रखे गए सैलोमण्डर के शरीर पर पीले धब्बे पाए गए। यह गुण उनकी संतानों में वंशागत (inhert) भी हुए।
  4. टावर का आलू बीटल प्रयोग (Potato beetle experiment of Tower)टावर ने आलू बीटल के भ्रूण को प्रारम्भिक अवस्था में अत्यधिक नमी तथा ताप पर रखा जिससे उनसे उत्पन्न होने वाले नये जीव प्रभावित हुए। उसने यह भी पाया कि इस प्रकार उत्पन्न हुए परिवर्तन उनकी आगे आने वाली पीढ़ियों में भी वंशागत हुए।

उपर्युक्त प्रयोगों से यह स्पष्ट होता है कि वातावरण में परिवर्तन का प्रभाव जीवों पर पड़ता है। यह परिवर्तन जीवों के जननद्रव्य (germplasm) या जीन्स (genes) को प्रभावित करते हैं जो वंशागति द्वारा नयी पीढ़ियों में पहुँच जाते हैं। इसके आधार पर कुछ वैज्ञानिकों जैसे पैकर्ड (Packard), कोप (Cope), हयात (Hyatt), स्पेन्सर (Spencer) तथा गडो (Gadow) आदि ने लैमार्कवाद को एक नया रूप दिया जिसे नवलैमार्कवाद (Neo Lamarckism) कहते हैं।

बाद में वीजमान (Weismann) ने जननद्रव्य सिद्धान्त (germplasm theory) दिया जिसके अनुसार जीवों की दैहिक कोशिकाओं (somatic cells) में उपार्जित लक्षण अवंशागत होते हैं और जननद्रव्य (germplasm) में उत्पन्न परिवर्तन संतानों द्वारा उपार्जित किए जाते हैं।

प्रश्न 5 – उत्तर दीजिए

(i) मीसोसोम किसमें मिलता है? 

(ii) पादप में माइटोसिस कहाँ मिलती हैं? 

(iii) प्लाज्मोडेस्मेटा क्या है? 

(iv) जीन गुणसूत्र पर किस प्रकार विन्यसित होते हैं?

(v) बैक क्रॉस तथा टैस्ट क्रॉस में क्या अन्तर है? 

(vi) 70S राइबोसोम कहाँ मिलता है?

उत्तर – (i) मीसोसोम जीवाणु में मिलता है। यह कोशिकीय श्वसन में मदद करता है तथा माइटोकॉण्ड्रिया के समान कार्य करता है।

(ii) माइटोसिस पादप के वर्धी भागों-मूल तथा प्ररोह शीर्ष में होती है। माइटोसिस की क्रिया में गुणसूत्र संख्या मातृ कोशिका के समान ही रहती है। यह विभाजन अर्द्धसूत्री विभाजन के द्वितीय भाग में भी होता है जहाँ इसे इक्वेशन डिवीजन कहते हैं। का

(iii) प्लाज्मोडेस्मेटा (Plasmodesmata)-स्ट्रासबर्गर (Strasburger, 1900) ने बताया कि कोशिकाएँ एक-दूसरे से महीन तन्तुओं द्वारा जुड़ी रहती हैं। इन तन्तुओं को जीवद्रव्य तन्तु (Plasmodesmata) कहते हैं। इनसे विभिन्न पदार्थों का आवागमन तथा एक कोशिका का दूसरी कोशिका से तालमेल रहता है।

(iv) जीन गुणसूत्र पर रैखिक क्रम में विन्यसित होते हैं। इसका पता इस प्रकार से भी लगाया जा सकता है कि दो जीन के मध्य दूरी निकालकर इसका नक्शा बना सकते हैं जिससे गुणसूत्र पर जीन की स्थिति सही बताई जा सकती है।

(v) बैक क्रॉस – इस प्रकार के क्रॉस में F, सन्तति का क्रॉस प्रभावी समयुग्मजी जनक से कराते हैं तथा परिणाम में सभी जीव प्रभावी मिलते हैं।

टैस्ट क्रॉस-इस प्रकार के क्रॉस में F, संतति का क्रॉस अप्रभावी समयुग्मजी जनक से कराते हैं। इसका परिणाम 50 प्रतिशत के रूप में 1: 1 मिलता है अर्थात् 50% अप्रभावी तथा 50% प्रभावी जीव मिलते हैं।

(vi) 70S प्रकार का राइबोसोम जीवाणु कोशिका में पाया जाता है। इस प्रकार राइबोसोम क्लोरोप्लास्ट व माइटोकॉण्ड्रिया में भी मिलता है। इसकी दोनों इकाइयाँ क्रमश: 50s व 30s होती हैं।

प्रश्न 6 – टिप्पणी लिखिए –

(अ) समजीनी तथा समलक्षणी अनुपात। 

(ब) मरुक्रमक की विभिन्न अवस्थाएँ। 

(स) नीलहरित कोशिका का प्रकार। 

उत्तर – (अ) समजीनी तथा समलक्षणी.अनुपात

दृश्यरूप या समलक्षणी (Phenotype)-जब तुलनात्मक लक्षणों को ध्यान में रखकर जीवधारियों के मध्य संकरण कराया जाता है. तो प्राप्त सन्तानों के बाह्य रूप अनुपात को दृश्यरूप या समलक्षणी (phenotype) अनुपात कहते हैं।

जीनरूप या समजीनी (Genotype) उपर्युक्त संकरण में जीन संरचना के आधार पर अनुपात को समजीनी (genotype) अनुपात कहते हैं। 

उदाहरण – एकसंकर क्रॉस (monohybrid cross) में F2 पीढ़ी का दृश्यरूप अनुपात 3 : 1 तथा जीन-रूप अनुपात 1 : 2 : 1 होता है।

(ब) मरुक्रमक की विभिन्न अवस्थाएँ 

मरुक्रमक की विभिन्न अवस्थाएँ निम्न प्रकार हैं।

(1) क्रस्टोज लाइकेन अवस्था (Crustose lichen stage), 

(2) फोलियोज लाइकेन अवस्था (Foliose lichen stage), 

(3) मॉस अवस्था (Moss stage), 

(4) शाकीय अवस्था (Herbaceous stage), 

(5) झाड़ी अवस्था (Shrubs stage), 

(6) वन अवस्था (Forest stage)

(स) नीलहरित कोशिका का प्रकार 

जीवाणु तथा नील-हरित शैवाल की कोशिका प्रोकैरियोटिक प्रकार की होती है अर्थात् इसमें झिल्लीयुक्त कोशिकांग जैसे न्यूक्लियस, माइटोकॉण्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट आदि नहीं पाए जाते हैं।

प्रश्न 7 – समजातता के प्रकार बताइए।

उत्तर – समजातता के प्रकार

(Types of Homology) 

समजातता के प्रकार निम्न प्रकार हैं-

  1. जातिवृत्तीय समजातता (Phylogenetic homology)-जन्तु और पौधों की विभिन्न जातियों में पायी जाने वाली समजातता को जातिवृत्तीय समजातता कहते हैं; जैसेह्वेल का चप्पू, चमगादड़ का पंख, घोड़े की अगली टाँग तथा मनुष्य के हाथ।
  2. लैंगिक समजातता (Sexual homology)-एक ही जाति के दो लिंगों (sexes) के जन्तुओं में पायी जाने वाली समजातता को लैंगिक समजातता कहते हैं जैसे मादा में अण्डाशय तथा नर में वृषण का उद्भव समान होता है।
  3. क्रमिक समजातता (Serial homology)-एक ही जन्तु के दो या अधिक अंगों में उद्भव के आधार पर पायी जाने वाले समानता को क्रमिक समजातता कहते हैं जैसे मनुष्य के हाथ व पैर।

इन उदाहरणों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि समजात अंग पाए जाने वाले विभिन्न जन्तुओं का विकास समान पूर्वज से हुआ है तथा उत्तरोत्तर पीढ़ियों में करोड़ों वर्षों में जीवों के समूह अपने पूर्वज़ से अधिक-से-अधिक अपसारी होते चले गए जिससे वह अपने आपको प्रकृति में पूर्ण रूप से अनुकूलित कर सके। इस प्रकार के जैव विकास को अपसारी जैव विकास या डाइवरजेन्ट इवोल्यूशन (divergent evolution) कहते हैं।

प्रश्न 8 – संतुलित पारिस्थितिक तन्त्र पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – संतुलित पारिस्थितिक तन्त्र

(Balanced Ecosystem) 

ईकोतन्त्र में विभिन्न खाद्य श्रृंखलाएँ (food chains) होती हैं जो आपस में मिलकर खाद्य जाल (food web) बनाती है। किसी ईकोतन्त्र के खाद्य जाल में जितने अधिक खाद्य शंखलाओं के वैकल्पिक रास्ते होंगे वह तन्त्र उतना ही अधिक संतुलित होगा तथा जीवों की संख्या भी स्थिर रहेगी। यदि खाद्य जाल की किसी एक खाद्य श्रृंखला में किसी उपभोक्ता की संख्या में कमी होने लगे तो उस खाद्य श्रृंखला के ठीक ऊपर की श्रेणी के उपभोक्ता दूसरी खाद्य श्रृंखला के उसी श्रेणी के उपभोक्ता को भोजन के रूप में उपभोग करने लगते हैं। अब दूसरी खाद्य श्रृंखला के पोषक उपभोक्ता की संख्या में वृद्धि होने लगेगी। इस प्रकार ईकोतन्त्र का संतुलन बना रहता है।

प्रश्न 9 – जाति, समष्टि तथा जैव समुदाय में अन्तर लिखिए। 

उत्तर – जाति, समष्टि तथा जैव समुदाय में अन्तर 

(Differences among Species, Population and Community)

प्रश्न 11 – नव-डार्विनवाद के विषय में लिखिए। 

उत्तर – नव-डार्विनवाद

(Neo-Darwinism)

डार्विनवाद को 1859 ई० से उन्नसवीं सदी के अन्त तक काफी मान्यता मिली। इस काल को डार्विन का भावुक काल (Romantic Period of Darwin) कहते हैं। इसके बाद बीसवीं सदी के आरम्भ में लगभग 40 वर्षों तक डार्विनवाद में लोगों का अधिक विश्वास नहीं रहा क्योंकि तब तक यह स्पष्ट हो गया था कि जीन्स में उत्पन्न परिवर्तन ही वंशागत हो पाते हैं, इस काल को डार्विन का अज्ञेयवादी काल (Agonistic Period of Darwin) कहते हैं।

कुछ वैज्ञानिकों जैसे वीजमान (Weismann), फिशर (Fischer), हेल्डेन (Haldane), हक्सले (Huxley), डॉबजेन्स्की (Dobzhansky), स्टेबिन्स (Stebbins) आदि ने सन् 1930 से सन् 1945 के बीच डार्विनवाद को नया रूप दिया जिसे नव-डार्विनवाद (Neo-Darwinism) कहते हैं।

नव-डार्विनवाद को जैव विकास का आधुनिक संश्लेषणात्मक (The Modern Synthetic Theory of Evolution) भी कहते हैं। आधुनिक संश्लेषणात्मकवाद का नाम हक्सले (Huxely) ने सन् 1942 में दिया। इसके अनुसार जैव विकास में पाँच मूल प्रक्रियाएँ होती हैं

  1. जीनी उत्परिवर्तन (gene mutation) 
  2. गणसूत्रों की रचना एवं संख्या में परिवर्तन (change in structure and ____number of chromosomes) 
  3. जीनी पुनर्योजन (gene recombination) 
  4. प्राकृतिक वरण (natural selection)
  5. जनन पृथक्करण (reproductive isolation) । प्रथम तीन प्रक्रियाएँ जीनी विभिन्नताओं द्वारा जीवों में परिवर्तन (variations) लाती हैं। प्राकृतिक वरण तथा जनन पृथक्करण जीवों को अनुकूलित दिशा में ले जाते हैं। पाँच मूल प्रक्रियाओं के अतिरिक्त इसमें तीन सहायक प्रक्रियाएँ भी होती हैं; जैसे

(i) प्रवास (migration) (ii) संकरण (hybridization) (iii) अवसर (chance)

प्रवास एक समष्टि (population) के व्यष्टि (individual) को दूसरे समष्टि में पहुँचाता है जिसके कारण उसमें अनुकूलन के लिए परिवर्तन आते हैं।

मिलती-जुलती जातियों के बीच संकरण, जीनी विभिन्नताओं को समष्टि में बढ़ाता है।

छोटी समष्टि में संयोग से होने वाले परिवर्तन प्राकृतिक वरण द्वारा चयनित जैव विकास का मार्ग परिवर्तित कर देते हैं।

प्रश्न 12 – पारिस्थितिक तन्त्र के नियन्त्रण पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – पारिस्थितिक तन्त्र का नियन्त्रण

(Ecosystem Control) 

ईकोतन्त्र एक सक्रिय तन्त्र है जैसे जीव आहार लेते हैं फिर अन्य जीव का आहार बनते हैं। नमी व पोषक तत्त्व तन्त्र के अन्दर व बाहर प्रवाहित होते रहते हैं, मौसम आदि भी बदलते रहते हैं, लेकिन ईकोतन्त्र फिर भी बने रहते हैं। ईकोतन्त्र की सामर्थ्य को, जिसके द्वारा वह स्वयं को नियंत्रित (self regulation) व संपोषित करता रहता है समस्थापन (homeostatis) कहते हैं जैसे यदि सखा पड़ने पर एक घास के मैदान में पौधे ठीक से वृद्धि नहीं कर पाते हैं तो चूहे, जो घास पर

आश्रित हैं कुपोषित रह जाते हैं तब चूहों की जन्म-दर घट जाती है तथा वे बिल में चले जाते हैं एवं निष्क्रिय हो जाते हैं। उनको कम भोजन की आवश्यकता पड़ती है तथा वे परभक्षी (predaters) से बचे रहते हैं। इससे उनकी मृत्यु-दर घट जाती है। इससे घास एवं चूहों की जनसंख्या सन्तुलन की रक्षा होती है शीत निष्क्रियता (Hibernation) के कारण घास भी नहीं खायी जाती है। इस रचना तन्त्र को पनर्निवेशन नियमन (feedback regulation) कहते हैं। यह ईकोतन्त्र का संतुलन बनाने में सहायक है। ईकोतन्त्र में अनेक जीव होते हैं तथा प्रत्येक जीव अनेकों पुनर्निवेशन कुण्डलियों (feedback loops) के भाग हैं।

ईकोतन्त्र का एक घटक जो काम या माध्यम पर्यावरणीय तनावों के अन्तर्गत ईकोतन्त्र की स्थिरता को प्रभावित करता है वह स्पीशीज विविधता (species diversity), स्पीशीज संख्या या abundance ratio हो सकता है।

कातन्त्र म आहार जाल (food web) में यदि कोई स्पीशीज लुप्त या कम हो जाती है तो स्पीशीज पर इसका प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि उपभोक्ताओं पर अन्य विकल्प उपलब्ध रहते हैं। कृषि ईकोतन्त्र में एक विशेष फसल उगाई जाती है; जैसे—गेहूँ, धान। यह फसल केवल एक रोग या कीट के कारण छिन्न-भिन्न हो सकती है। अत्यधिक संतुलित तन्त्र में अनेकों प्रकार के जीवों की विभिन्न स्पीशीज होती हैं। कम स्पीशीज वाले तन्त्र की संतुलन क्षमता भी कम होती है। . ईकोतन्त्र पर परम संकट जैसे आग, अतिशोषण (over exploitation) या लम्बे समय तक चलने वाले तनाव (prolonged stress) जैसे सूखा, प्रदूषण आदि, नियन्त्रण विधि में । बाधा डालते हैं। इनसे ईकोतन्त्र का अवक्रमण (degradation) होता है।

प्रश्न 13 – संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए

(क) जड़, तना व पत्ती के मुख्य जलोद्भिद् लक्षण। 

(ख) सूत्री विभाजन का महत्त्व। 

उत्तर—(क) जड़, तना व पत्ती के मुख्य जलोद्भिद् लक्षण

(Main Hydrophytic Characters of Root, Stem and Leaf) 

जड़, तना व पत्ती के मुख्य जलोद्भिद् लक्षण निम्न प्रकार हैं’ 

(1) जड़ व तनों में रोम अनुपस्थित होते हैं। 

(2) बाह्य त्वचा में क्लोरोप्लास्ट मिल सकते हैं, क्यूटिकिल का अभाव होता है। 

(3) कॉर्टेक्स बहुस्तरीय होता है। इसमें वायुस्थान (air space) मिलते हैं. जो बहुत

विकसित होते हैं। इसको एरेनकाइमा (aerenchyma) भी कहते हैं। 

(4) यान्त्रिक ऊतक (mechanical tissue) का अभाव होता है। 

(5) संवहन ऊतक (conducting tissue) कम विकसित होते हैं। . 

(6) कैम्बियम (cambium) नहीं मिलती है। 

(7) म्यूसीलेज (mucilage glands) व स्क्ले रीड्स (sclereids) भी मिल सकते हैं। 

(ख) सूत्री विभाजन का महत्त्व

(Significance of Mitosis) 

सूत्री विभाजन का महत्त्व निम्नवत् है

(1) सूत्री विभाजन किसी जीव के अंगों की वृद्धि व विकास में सहायता करता है।’ 

(2) यह घावों को भरने में सहायता करता है। 

(3) इस क्रिया के द्वारा DNA व RNA की मात्रा में संतुलन बना रहता है। 

(4) यह क्रिया दो पुत्री कोशिकाओं के निर्माण में समाप्त होती है।

(5) पुत्री कोशिका व जनक कोशिका में गुणसूत्र संख्या व गुण समान होते हैं। 

(6) निम्न स्तर के जीवों में मुख्य प्रजनन अलैंगिक (asexual) प्रकार से होता है। यह

क्रिया मुख्यतः सूत्री विभाजन द्वारा ही होती है। 

प्रश्न 14 – रिपिटीटिव DNA अथवा सैटेलाइट DNA के विषय में संक्षेप में लिखिए। 

उत्तर – रिपिटीटिव DNA अथवा सैटेलाइट DNA .. (Repetitive DNA or Satellite DNA) 

DNA ऊष्मा के संसर्ग में विघटित (denature) हो जाता है। इसकी कुण्डली (helix) के दोनों रज्जुक पृथक् हो जाते हैं, परन्तु किन्हीं परिस्थितियों में दोनों रज्जुक एक बार फिर जडकर सक्रिय द्विक कुण्डली DNA बना सकते हैं। इस क्रिया को रिनेचुरेशन (renaturation) कहते हैं। यह क्रिया कठिन है क्योंकि विघटित अणु हेटरोजीनस समूह बना । सकते हैं। ब्रिटेन (Britten) व उनके साथियों ने सन् 1968 में दिखाया कि DNA के छोटे खण्ड फिर से जुड़ सकते हैं। तीन प्रकार के रिपिटीटिव DNA क्रम मिलते हैं

  1. सैटेलाइट DNA (Satellite DNA)—यह 5-100 क्षारक जोड़ों से बना छोटा खण्ड है। इसका .पुनरावर्तन कई बार होता है। ये 100 मिलियन क्षारक जोड़ों का समूह तक बना सकते हैं। डेन्सिटी ग्रेडिएन्ट सेन्ट्रीफ्यूगेशन (density gradient centrifugation) की क्रिया में ये क्रम निश्चित बैण्ड (band) बनाते हैं। अतः इन्हें सैटेलाइट DNA कहते हैं। ड्रोसोफिला विरिलिस में 3 सैटेलाइट क्रम मिलते हैं। प्रत्येक 7 न्यूक्लिटोटाइड लम्बा तथा लगभग समान क्रम वाला होता है। इससे पता चलता है कि तीनों एक ही आनुवंशिक उत्पत्ति (genetic origin) से हैं।
  2. मिनीसैटेलाइट DNA (Minisatellite DNA)-यह क्रम 12-100 क्षारक युग्म लम्बा होता है तथा समूह में मिलता है। प्रत्येक समूह में 30,000 के लगभग पुनरावर्तन क्रम (repeat sequence) मिलते हैं। किसी समष्टि (population) में मिनीसैटेलाइट DNA का लोकस (locus) अलग हो सकता है। इसका उपयोग अपराधी अथवा DNA फिंगर प्रिंटिंग द्वारा जनक की पहचान (paternity) आदि के लिए होता है। मिनीसैटेलाइट के स्थान (loci) परिवर्तन से कैन्सर व डायबिटीज जैसे रोग होते हैं।
  3. माइक्रोसैटेलाइट DNA (Microsatellite DNA)-यह 1-5 क्षारक जोड़े का बना सबसे छोटा क्रम है। यह DNA में समान रूप से फैला रहता है। मानव जीनोम में लगभग 30,000 भिन्न माइक्रोसैटेलाइट लोकाई मिलते हैं। इनमें परिवर्तन बहुत-से आनुवंशिक रोगों का संकेत है: जैसे-हंटिंगटन रोग।

सैटेलाइट DNA द्विगुणित (replicate) हो सकता है, परन्तु RNA का अनुलेखन (transcription) प्रोटीन संश्लेषण के लिए नहीं कर सकता है क्योंकि यह छोटा क्रम है तथा इसमें प्रोमोटर साइट न होने से RNA पॉलिमरेज, जो शृंखला आरम्भन के लिए आवश्यक है, नहीं मिलता है। रिपिटीटिव DNA निष्क्रिय होता है।

प्रश्न 15 – पॉलिटीन गुणसूत्र पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – पॉलिटीन गुणसूत्रः

(Polytene Chromosome) 

ड्रॉसोफिला (Drosophila) की लार ग्रन्थियों (salivary glands) में बहुत लम्बे तथा चौड़े गुणसूत्र मिलते हैं, इन्हें पॉलिटीन गुणसूत्र कहते हैं। इस प्रकार के गुणसूत्रों पर गहरी तथा हल्की पट्टियाँ (bands) मिलती हैं, जो क्रमशः यूक्रोमैटिन तथा हेटरोक्रोमैटिन की होती हैं। कहीं-कहीं पर ये गुणसूत्र फूले होते हैं। इन्हें पफ (puff) कहते हैं। यूक्रोमैटिन क्षेत्र में लप (loop) मिलते हैं। इन्हें बाल्बियानी वलय (Balbiani rings) कहते हैं। इस स्थल पर । mRNA बनता है।

ये गुणसूत्र कायिक कोशिका में भी युग्मित (paired) होते हैं। इस प्रकार के गुणसूत्र महागुणसूत्र (giant chromosome) की श्रेणी में आते हैं (चित्र)।

प्रश्न 16 – मानव में कुछ लिंग सहलग्नी रोगों के नाम लिखिए। 

उत्तर- मानव में कुछ लिंग सहलग्नी रोग

(Some Sex linked Diseases in Human) 

मानव में कुछ लिंग सहलग्नी रोग इस प्रकार हैं

(1) ग्लूकोस 6-फॉस्फेट डीहाइड्रोजिनेज की कमी। 

(2) -गैलेक्टोसाइडेज की कमी। 

(3) हीमोफीलिया A (फैक्टर VIII की कमी) 

(4) हीमोफीलिया B (फैक्टर IX की कमी) 

(5) फॉस्फोग्लिसरेटकाइनेस (ग्लाइकोलिसिस) 

(6) हाइपोजेन्थीन गुआनीन फॉस्फोरिबोसिल ट्रांसफरेज (HGPRT अथवा लेश नेहम सिन्ड्रोम). 

(7) डूचेन प्रकार मस्कुलर डिस्ट्रॉफी 

(8) हाइपोफॉस्फेटीमिया 

(9) ऑर्निथीन ट्रांसफारमाइलेस की कमी 

(10) एनहाइड्रिक एक्टोडर्मल डिस्प्लेसिया

(11) xg रुधिर कोशिकीय एण्टीजन 

(12) कॉपर स्थानान्तरण की कमी (मेन्किस किन्की-हेयर सिन्ड्रोम) 

(13) ब्रूटन टाइप एगामाग्लोब्यूलीनीमिया 

(14) टेस्टीकुलर फेमिनाइजेशन सिन्ड्रोम (Tfm)। 

प्रश्न 17 – लैम्पब्रश गुणसूत्र पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – लैम्पब्रश गुणसूत्र

(Lampbrush Chromosome) – 

लैम्पब्रश गुणसूत्र की खोज सर्वप्रथम सन् 1892 में Ruckert ने की। ये बहुत बड़े गुणसूत्र होते हैं एवं सामान्य तरह से ही आँखों से देखे जा सकते हैं। ये कुछ Vertebrates के Docyte केन्द्रकों में पाए जाते हैं; e.g. sharks, amphibians, reptiles एवं birds। इन गुणसूत्रों में lateral loops होते हैं जिससे कि ये ब्रश की तरह के प्रतीत होते हैं। इनकी केन्द्र की axis चार क्रोमैटिड्स की बनी होती है। क्रोमोनीमा के बाहर matrix होता है। लूप की axis का व्यास 30 Ā से 50 Ā तक होता है। इनके matrix में RNA एवं प्रोटीन होता है। रिस (1959) नामक वैज्ञानिक के अनुसार ये पतले fibrils के बने होते हैं। 

इन गुणसूत्रों का कार्य RNA विश्लेषण तथा प्रोटीन विश्लेषण है (चित्र)।

प्रश्न 19 – जीन परिकल्पना पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – जीन परिकल्पना (Concept of Gene) 

सटन नामक वैज्ञानिक ने जीन परिकल्पना को प्रतिपादित किया। जीन्स में निम्नलिखित गुण होते हैं 

(1) जीन्स (genes) गुणसूत्रों (chromosomes) पर लगे रहते हैं। 

(2) एक गुणसूत्र पर इनकी संख्या बहुत अधिक होती है। 

(3) जीन्स जीवों में भौतिक एवं कार्यिक गुणों का निर्धारण करते हैं। एक पीढ़ी से दूसरी

पीढ़ी में ये माता-पिता से उनकी सन्तानों में transmit हो जाते हैं। 

(4) प्रत्येक गुणसूत्र पर जीन्स एक विशेष स्थान एवं position में लगे रहते हैं। इस

position को लोकस (locus) कहते हैं। 

(5) गुणसूत्रों में जीन्स लम्बाई में लगे रहते हैं। 

(6) एक अकेला जीन विभिन्न अवस्थाओं में दिखाई दे सकता है। इसकी कार्यिक दशाएँ भी भिन्न हो सकती हैं। एक ही जीन की alternative अवस्थाओं को एलील (alleles) कहते हैं। 

(7) दिखाई देते समय जीन्स में अचानक परिवर्तन भी हो सकता है। ऐसे जीन्स को

उत्परिवर्तित जीन (mutant gene) कहते हैं। 

(8) जीन्स बहुत ही निश्चित तरीके से द्विगुणित होते हैं। 

(9) प्रत्येक जीन एक विशेष एन्जाइम का संश्लेषण करता है। 

(10) प्रत्येक जीन डी०एन०ए० का एक भाग होता है, जो कि एक एन्जाइम के लिए सूचना रखता है। यह सूचना न्यूक्लियोटाइड्स की भाषा में coded रहती है। 

प्रश्न 20 – मियोसिस का महत्त्व लिखिए। 

उत्तर – मियोसिस का महत्त्व

(Significance of Meiosis)

मियोसिस का महत्त्व निम्नवत् है

(1) कायिक कोशिका से युग्मकों में गुणसूत्र संख्या आधी रह जाती है। यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि लैंगिक जनन में एक बार गुणसूत्र संख्या आधी होती है (युग्मक निर्माण) तथा दूसरी क्रिया में युग्मकों के संलयन अर्थात् निषेचन द्वारा यह दो गुनी होकर कायिक गुणसूत्र संख्या के बराबर हो जाती है। अतः युग्मनज के निर्माण के लिए तथा जातियों में स्थायी निश्चित गुणसूत्र संख्या बनाए रखने के लिए लैंगिक जनन में एक बार अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis) तथा एक बार संलयन (fusion) आवश्यक है। 

(2) गुणसूत्र खण्डों के विनिमय के कारण ही नई जातियाँ तथा विविधताएँ मिलती हैं। 

(3) इस क्रिया के फलस्वरूप आनुवंशिकता विभिन्नता मिलती है। 

(4) द्वितीय मियोसिस (Meiosis II) में केवल गुणसूत्र का काइनेटोकोर अथवा सेन्टोमियर विभक्त होता है जिससे उसके दोनों क्रोमैटिड (अर्धगुणसूत्र) अलग होते हैं। 

(5) चारों पुत्री कोशिकाओं में विभिन्न प्रकार के क्रोमैटिड आते हैं।

(6) पुत्री कोशिका में गुणसूत्र संख्या अगुणित (haploid) होती है।

प्रश्न 21 –  कैजुराइना के तने की अनुप्रस्थ काट का केवल चित्र बनाइए। 

उत्तर – कैजुराइना के तने की अनुप्रस्थ काट

प्रश्न 22 – मोजैक तथा गाइनैन्ड्रोमार्फ पर टिप्पणी लिखो। 

उत्तर – मोजैक तथा गाइनैन्ड्रोमार्फ

(Mosaic and Gynadromorph) 

असामान्य गुणसूत्र व्यवहार के परिणामस्वरूप कीट में गाइनैन्ड्रोमार्फ व लैंगिक मोजैक बनते हैं। इनमें जन्तु का आधा भाग नर व आधा मादा होता है। ड्रोसोफिला में गाइनैन्ड्रोमार्फ पार्श्व होते हैं। एक भाग में नर के रंग का शरीर आकार, जनन अंग आदि मिलते हैं तथा दसरे भाग में सभी मादा लक्षण मिलते हैं। एक ही कीट में दोनों जनन अंग मिलते हैं।

इस प्रकार के गाइनैन्ड्रोमार्फ जाइगोट के माइटोसिस में प्रथम विभाजन के समय हुई अनियमितता के कारण बनते हैं। XX’ गुणसूत्र में से एक x गुणसूत्र पीछे रह जाता है तथा दूसरे केन्द्रक तक नहीं पहुँचता है। इस प्रकार एक केन्द्रक में एक ‘X’ तथा दूसरे केन्द्रक में

XX रहता हैं (चित्र) । इस स्थिति में एक ‘X’ वाला भाग नर तथा ‘XX’ वाला भाग मादा में

होता है। ब्रेकन बेब्टर में गाइनैन्ड्रोमॉर्फ ऊपर व नीचे के भाग में बनता है जैसे सिर मटा का तथा धड़ नर का अथवा सिर नर का तथा धड़ मादा का होता है।

प्रश्न 23 – गुणसूत्रीय विपथन (एबेरेशन) किसे कहते हैं? 

उत्तर – गुणसूत्रीय विपथन (एबेरेशन)

(Chromosomal Aberrations) 

गुणसत्र की रचना में होने वाले आकृतिकीय परिवर्तनों से उत्परिवर्तन (mutations) दस प्रकार के परिवर्तन गुणसमूह के विभिन्न भागों में होने से होते हैं। इस प्रकार के टटे. सत्र के भाग दूसरे भागों से जुड़कर नई प्रकार की रचना बनाते हैं। यह सब तब बहत ही तरीके से होता है, जबकि क्रॉसिंग-ओवर होता रहता है। लेकिन कभी-कभी गणसूत्रों में होने वाले इन मुख्य परिवर्तनों को गुणसूत्रीय विपथन (Chromosomal aberrations) अथवा गुणसूत्रीय पुनर्विन्यास (chromosomal rearrangement) कहते हैं। अधिकतर गणसत्रीय विपथन (एबेरेशन) दुर्घटना से अथवा गुणसूत्र के induced होने से होते हैं।

गुणसूत्रीय विपथन (एबेरेशन) निम्नलिखित दो प्रकार की हो सकती है

(i) Intrachromosomal Aberration – यह केवल एक गुणसूत्र में ही होती

(ii) Interchromosomal Aberration – यह homologous – गुणसूत्र के जोड़े के दोनों गुणसूत्रों में होती है।

प्रश्न 24 – कनेर की पत्ती की अनुप्रस्थ काट केवल चित्र की सहायता से दर्शाइए। 

उत्तर – कनेर की पत्ती की अनुप्रस्थ काट

प्रश्न 25 – प्रोटोप्लाज्म अथवा जीवद्रव्य पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – जीवद्रव्य (Protoplasm).. 

काशकावाद के अनुसार, प्रत्येक जीवधारी का शरीर एक अथवा एक से अधिक “कोशिकाओं से बना होता है। एक कोशिका से बने जीवधारी एककोशिकीय (unicellular)

तथा एक से अधिक कोशिकाओं से बने जीवधारी बहकोशिकीय (multicellular) जीव कहलाते हैं। सजीव कोशिकाओं में एक महत्त्वपर्ण जीवित पदार्थ पाया जाता है जिसे जीवद्रव्य (protoplasm) कहते हैं। जीवद्रव्य एक सजीव कोशिका कला (cell membrance of plasmalemma) से घिरा रहता है। 

कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) + Nucleus = Protoplasm]

जीवद्रव्य या प्ररस (protoplasm) कोशा का जीवित भाग है जो कोशा भित्ति (cell wall) द्वारा घिरा रहता है। वास्तव में प्ररस ही जीवन का भौतिक आधार (protoplasm is . the physical basis of life) है। इनके द्वारा ही जन्तुओं एवं पौधों के सभी जीवन सम्बन्धी कार्य जैसे वृद्धि, पोषण, भोजन निर्माण, श्वसन, प्रजनन आदि सम्पन्न होते हैं। 

रासायनिक दृष्टि से भी प्ररस (protoplasm) एक जटिल यौगिक (complex compound) है। यह मुख्य रूप से प्रोटीन्स (proteins) का बना होता है जिसमें carbon, hydrogen, oxygen, nitrogen, sulphur phosphorus होते हैं। प्ररस में प्रोटीन्स (proteins) के अतिरिक्त कार्बोज, कार्बोहाइड्रेट्स, तेल व चर्बी, अकार्बनिक लक्षण भी होते हैं। स्वभाव में प्ररस क्षारीय (alkaline) होता है।

जीवद्रव्य के दो मुख्य भाग होते हैं—(i) कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) तथा (ii) केन्द्रक (nucleus)।

कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) दो भागों एक्टोप्लास्ट (ectoplast) तथा मीसोप्लास्ट (mesoplast) में बँटा होता है। मीसोप्लास्ट में कोशिकीय अन्तर्वस्तुएँ (cytoplasmic inclusions) पायी जाती हैं। कोशिकीय अन्तर्वस्तुओं में जीवित कोशिकांग (living inclusions or cell organelles) तथा निर्जीव अन्तर्वस्तुएँ (non-living inclusions) होती हैं। कोशिकांग के रूप में कोशिका में सूत्रकणिका (mitochondria), गॉल्जीकाय (golgi body), राइबोसोम्स (ribosomes), अन्त:प्रद्रव्यी जालिका (endoplasmic reticulum) इत्यादि पाए जाते हैं।

प्रश्न 26 – मृदीय जीव पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – मृदीय जीव

(Soil Organisms) 

मृदा में कवक, शैवाल, जीवाणु, रोगाणु, निमेटोड (nematodes), दीमक (termites), केंचुए, मोलस्क, आर्थोपोड आदि जीव तथा अनेक प्रकार के बीजाणु (spores) मिल सकते हैं। मृदा में मिलने वाले सूक्ष्म जीवों द्वारा कार्बनिक पदार्थों का अपघंटन होता है, जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। कुछ अति विशेष प्रकार के नीले-हरे शैवाल (blue-green algae) तथा जीवाणु वायुमण्डल की स्वतन्त्र नाट्रोजन को नाइट्रोजन यौगिकीकरण (nitrogen fixation) द्वारा मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं। राइजोबियम (Rhizobium) जीवाणु फलीदार पौधों (legumes) की जड़ों में मिलने वाली ग्रन्थिकाओं (nodules) में रहते हैं तथा नाइट्रोजन को स्थिर- (fix) करने का कार्य करते हैं। नीले-हरे शैवाल, केंचुए, जीवाणु आदि म्यूकस (mucous) का स्रावण करते हैं, जिससे मृदा के कण परस्पर जडे रहते हैं। कुछ कवक तथा अन्य जीव वृद्धिनियामक पदार्थ (growth regulatory substances) जैसे IAA, GA बनाते हैं, जिनसे पौधों की वृद्धि प्रभावित

इसके अलावा कवकों, जीवाणु तथा अन्य सूक्ष्म जीवों से विषैले पदार्थों का स्रावण

जो पौधों को हानि पहुंचाते हैं। नाइट्रोजन यौगिकीकरण, प्रतिजीविता (antibiosis), .. जनित रोग (soil borne diseases), मृदा का निर्माण, कार्बनिक पदार्थों का अपघटन आदि से मृदा की संरचना प्रभावित होती है।

प्रश्न 27 – निम्न के उत्तर लघु स्वरूप में दें –

(क) कपलिंग व रिपल्शन हाइपोथीसिस किसने दी और अनुपात क्या बताया? 

(ख) TMV का जेनेटिक पदार्थ क्या हैं?  

(ग) मिओसिस पादप की किस प्रकार की कोशिका में होती है?

(घ) साइटोप्लाज्मिक इनहेरिटेन्स में किस कोशिका के कोशिकाद्रव्य का प्रभाव दिखाई देता है?

उत्तर – (क) कपलिंग व रिपल्शन हाइपोथीसिस बेटसन व पुनेट ने दी। कपलिंग व रिपल्शन के द्वारा यह बताया गया कि जीन के मध्य आसक्ति मातृ रूप में अधिक होती है। इसका परिणाम 9 : 3 : 3 : 1 के स्थान पर 7 : 1 : 1 : 7 अथवा 1 : 7 : 7 : 1 होता है। .

(ख) TMV का जेनेटिक पदार्थ RNA है। TMV एक विषाणु है जो प्रोटीन कवच व न्यूक्लिक अम्ल से बनता है। इसमें कोशिकाद्रव्य नहीं मिलता है। यह एक पादप विषाणु है।’ अधिकांश पादप विषाणुओं में RNA ही न्यूक्लिक अम्ल के रूप में मिलता है। ..

(ग) मिओसिस पादप की लघु बीजाणु मातृ कोशिका में तथा गुरुबीजाणु मातृ कोशिका में ही होती है। इस क्रिया के फलस्वरूप गुणसूत्र संख्या आधी रह जाती है।

(घ) साइटोप्लाज्मिक इनहेरिटेन्स में मातृ कोशिका के कोशिकाद्रव्य का प्रभाव दिखाई देता है। इसमें प्लास्मोसोम अथवा क्लोरोप्लास्ट व माइटोकॉण्ड्रिया की जीन भाग लेती हैं। – 

प्रश्न 28 – परॉक्सीसोम के जैव संश्लेषण पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – परॉक्सीसोम का जैव संश्लेषण

(Biogenesis of Peroxisome). 

अभी तक जैव संश्लेषण की सम्पूर्ण क्रिया पूरी तरह से ज्ञात नहीं है, परन्तु यह पता चल चुका है कि परॉक्सीसोम की कला (membrane) में मिलने वाली प्रोटीन ER में बनती है। दोनों कोशिकांगों ER तथा परॉक्सीसोम की कला में मिलने वाली प्रोटीन भिन्न प्रकार की होती है। पहले यह माना जाता था कि परॉक्सीसोम ER के अन्तिम सिरे से मुकुलित (budding) होते हैं, परन्तु इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चलता है कि ER तथा पराक्सीसोम में कोई सम्बन्ध नहीं है। परॉक्सीसोम में मिलने वाले विकर कोशिकाद्रव्य में उपस्थित मुक्त राइबोसोम पर बनते हैं तथा तब इन कोशिकांगों में पहुँचाए जाते हैं। 

इसका मुख्य विकर केटालेस (catalase) साइटोसोल (cytosol) में निर्मित होता है, . तब परॉक्सीसोम में पहुँचता है। यह पहले मोनोमेरिक विकर (monomeric enzyme) . अथवा एपोएन्जाइम (apoenzyme) के रूप में बनाया जाता है जिसकी अर्द्धआयु (half ite) 14 मिनट होती है। कोशिकांग में पहुँचकर उनमें हीम (haem) युक्त लौहतत्त्व (iron) मिल जाता है तथा होलोएन्जाइम (holoenzyme) बनता है जिसकी अर्द्धआयु 36 घण्टे हाता है। परॉक्सीसोम धीरे-धीरे वृद्धि करता है, परन्तु स्वनष्टीकरण अथवा स्वभक्षण (autophagy) से नष्ट हो जाता है। इसका पूर्ण जीवन काल 5-6 दिन होता है।

31 – परॉक्सीसोम पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – परॉक्सीसोम (Peroxisome) 

सर्वप्रथम टोलबर्ट (Tolbert) ने सन् 1969 में इसकी खोज की थी। ये गोलाकार व शिल्ली वाली रचनाएँ हैं। ये केवल प्रकाशीय श्वसन (photorespiration) करने वाले, पौधों में ही पाए जाते हैं। ये ER से बनते हैं। परॉक्सीसोम की झिल्ली में एन्टीमायसिन A. दी NADH साइटोक्रोम रिडक्टेज पाया जाता है। ऐसी ही रासायनिक संरचना माटोकॉण्डिया की बाह्य झिल्ली, ER में तथा केन्द्रक कला (nuclear membrane) में भी मिलती है। परॉक्सीसोम की कला (membrane) ऐमीनो अम्ल, व-हाइड्रॉक्सी अम्ल तथा यूरिक अल के लिए पारगम्य है। लेकिन पिरिडीन न्यूक्लियोटाइड के लिए पारगम्य नहीं होती है।

प्रश्न 32 – मियोसिस I की विभिन्न अवस्थाओं को संक्षेप में दर्शाइए। 

उत्तर – तालिका : मियोसिस I की विभिन्न अवस्थाएँ (संक्षेप में)

प्रश्न 33 – डार्विन का पैन्जेनेसिस सिद्धान्त के विषय में लिखिए। 

उत्तर – डार्विन का पैन्जेनेसिस सिद्धान्त

(Darwin’s Pangenesis Theory) _

डार्विन ने यह महसूस किया कि प्रकृतिवाद तब तक पूरा नहीं होगा जब तक कि यह समझाया नहीं जाए कि नई विभिन्नताएँ कैसे अण्डाणु या शुक्राणु से दूसरी पीढ़ी में जाती हैं। इसके लिए उन्होंने एक नया सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसे पैन्जेनेसिस का सिद्धान्त कहते हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार शरीर का प्रत्येक अंग, ऊतक, यहाँ तक कि प्रत्येक कोशिका एक सूक्ष्म कण बनाती है जिसे जेम्यूल्स या पैनजीन्स (gemmules or pangenes) कहते हैं। इनमें इन्ह उत्पन्न करने वाली कोशिका के गुण होते हैं। ये जैम्यूल पूरे शरीर में घूमते रहते हैं और बाद म जनन कोशिका में एकत्रित हो जाते हैं। यह जनन कोशिका पैतृक शरीर की प्रतिकृति | (replica) होती है जो उसी के समान शरीर (सूक्ष्म विवरण सहित) बनाने में समर्थ होती है।

प्रश्न 34 – पेकीटीन पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – पेकीटीन (Pachytene) 

गुणसूत्रों का जोड़े बनाना समाप्त हो जाता है तथा गुणसूत्र छोटे व मोटे (shorter and acker) हो जाते हैं। गुणसूत्र युग्मन (pairing) से बाइवेलेन्ट अथवा युग्म गुणसूत्र

(bivalent) बनते हैं। इससे गुणसूत्रों की संख्या आधी जान पड़ती है। इन युग्म गुणसूत्रों (bivalent) के प्रत्येक गुणसूत्र दो अर्द्ध गुणसूत्र (chromatid) होते हैं जिससे इन्हें गुणसूत्र चतुष्क’ (tetrad) भी कहते हैं। प्रत्येक चतुष्क में 4 काइनेटोकोर (दो समजातीय व दो सिस्टर क्रोमैटिड) बनते हैं। प्रत्येक क्रोमैटिड का अपना काइनेटोकोर (kinetochore) होता है। प्रत्येक समजात गुणसूत्र के दो क्रोमैटिड को भगिनि अर्द्धगुणसूत्र (sister chromatid) कहते हैं। मिओसिस I में सिस्टर क्रोमैटिड के काइनेटोकोर भी क्रियात्मक इकाई (functional unit) की तरह कार्य करते हैं। सभी गुणसूत्र युग्मन का कार्य समाप्त कर लेते हैं तथा सिनेप्टोनीमल कॉम्प्लैक्स के द्वारा जो क्षेत्र घेरा जाता है, वह इसी प्रकार बना रहता है।

पेकीटीन के दौरान दो क्रोमैटिड समजात गुणसूत्र (nonsister chromatids) से आपस में खण्ड विनिमय करते हैं, इसे पुनर्योजन (recombination) भी कहते हैं।

पेकीटीन में सिनेप्टोनीमल कॉम्प्लैक्स रीकम्बीनेशन नोड्यूल अथवा बार (bar) का भी प्रदर्शन करता है, जो क्रॉसिंग-ओवर के निश्चित स्थल (site) होते हैं।

लेप्टोटीन व जाइगोटीन की प्रक्रिया कुछ घण्टों में समाप्त हो जाती है, परन्तु पेकीटीन के समाप्त होने में कुछ दिन का समय भी लग सकता है।

प्रश्न 35 – मानव में हानिकारक अप्रभावी लिंग सहलग्नी जीन के विषय में संक्षिप्त टिप्पणी लिप्रिए। 

उत्तर – मानव में हानिकारक अप्रभावी लिंग सहलग्नी जीन

(Deleterious Recessive Sex linked Genes in Human) 

कन्जेनाइटल हाइपरप्यूरीसीमिया (लेश नेहम सिन्ड्रोम)-इस रोग में यूरिक अम्ल का उत्पादन अधिक होता है तथा यह रोग लिंग सहलग्नी अप्रभावी जीन वंशागति का उदाहरण है। इसका जीन मादा के ‘X’ गुणसूत्र से युग्मनज में पहुँचता है। रोगी में हाइपोजेन्थीन गुआनीन फॉस्फोराइबोसिल ट्रांसफरेज (HGPRT) विकर की कमी होती है। मूत्र में नारंगी यूरिक अम्ल के रवे मिलते हैं। बच्चे की मांसपेशियाँ इतनी कमजोर हो जाती हैं कि बच्चा बैठने, चलने व बोलने में अक्षम होता है। 20 वर्ष की उम्र तक मर जाता है। ___

डूचेन प्रकार मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (Duchene type muscular distrophy)यदि माता इस रोग की वाहक हो तो इसकी सन्तति में आधे पुत्र रोग से प्रभावित होते हैं। इसका रोगी किशोरावस्था से पहले ही मांसपेशियों के शिथिलन का शिकार हो जाता है। 21 वर्ष की आयु तक पहुँचने से पहले ही उसकी मृत्यु हो जाती है। सभी पुत्रियाँ रोग की वाहक होती हैं, परन्तु लक्षण प्ररूप (phenotype) सामान्य होता है। इस रोग के होमोजाइगस रिसेसिव जीवित नहीं रहते हैं। अत: मादा में यह रोग कभी प्रकट नहीं होता है।

हन्टर सिन्ड्रोम (Hunter syndrome)—यह सबसे खतरनाक रोग है जो X सहलग्नी अप्रभावी वंशागति से सम्बन्धित है। इसके रोगी की खड़े असामान्य रोम (हिरसुटिज्म), नाक ‘चौड़ी, बड़ी तथा जीभ बाहर निकली रहती है। इस जीन के लिए होमोजाइगस रोगियों की त्वचा

की कोशिकाओं में म्यूकोपॉलिसैकेराइड एकत्र हो जाता है। इसके रोगी की पहचान एम्नियोसेन्टेसिस (amniocentesis) से की जा सकती है।

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