Bsc 2nd Year Botany IV Diversity Of Angiosperms Systematics Development & Reproduction Notes

Bsc 2nd Year Botany IV Diversity Of Angiosperms Systematics Development & Reproduction Notes :- 

 

UNIT- I

Systematics : Principles of classification, Binomial nomenclature; comparative study of different classification systems, viz. Linnaeus, Bentham & Hooker, Engler & Prantl, Hutchinson, and Cronquist.”

UNIT-II

Taxonomic study of following families and their economic importance :

Dicots ; Ranunculaceae, Malvaceae, Brassicaceae, Cucurbitaceae, Rosaceae, Leguminosacae, Myrtaceae, Rutaceae, Apiaceae, Apocynaceae, Asclepiadaceae, Solanaceae, Convolvulaceae, Acanthaceae, Lamiaceae, Asteraceae, Rubiaceae, Verbenaceae, Euphorbiaceae and Amaranthaceae.

Monocots : Cyperaceae, Poaceae, Arecaceae, Liliaceae.

UNIT-III

External morphology of vegetative and floral parts; modifications—phyllodes, cladodes, and phylloclades. Meristems-kinds, study of tissue system-epidermal, ground, and vascular.

Anatomy of roots, stems and leaves. Cambium-its function and anomalies in roots and stems; root-shoot transition .

UNIT-IV

Structure and development of male female gametophytes-microsporogenesis, microgametogenesis megasporogenesis and megagametogenesis embryo sac types. ‘Doble fertilization, development of embryo, endosperm, development and its morphological nature, apomixis and polyembryony.

खण्ड ‘ : लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न

प्रश्न 1 भारत के मुख्य हरबेरिया के नाम लिखिए।

उत्तर – भारत के मुख्य हरबेरिया (Important Herbaria of India). 

भारत के मुख्य हरबेरिया निम्नलिखित हैं

(1) Botanical Survey of India-कोयम्बटूर (केरल)

(2) Forest Research Institute-देहरादून (उत्तराखण्ड)

(3) Central National Herbarium-सिबपुर (कोलकाता)

(4) National Botanical Research Institute-लखनऊ (उत्तर प्रदेश)।

प्रश्न 2 भारत के कुछ मुख्य वानस्पतिक उद्यानों के नाम लिखिए। अथवा भारत के किन्हीं दो वानस्पतिक उद्यानों के नाम लिखिए। 

उत्तर – भारत के मुख्य वानस्पतिक उद्यान

(Important Botanical Gardens of India) 

भारत के कुछ मुख्य वानस्पतिक उद्यान निम्नलिखित हैं-

(1) लॉयड बोटेनिकल गार्डन (Llyod botanical garden), दार्जिलिंग (प० बंगाल)

(2) नेशनल बोटेनिकल गार्डन (National botanical garden), लखनऊ (उत्तर प्रदेश) “

(3) रॉयल बोटेनिकल गार्डन (Royal botanical garden), सिबपुर [कोलकाता __(प० बंगाल)]

(4) लाल बाग गार्डन (Lal Bagh garden), बंगलुरु (कर्नाटक)

(5) वृन्दावन बोटेनिकल गार्डन (Vrindavan botanical garden), मैसूर (कनाटक

(6) बोटेनिकल गार्डन (Botanical garden), ऊटी (तमिलनाडु)।

प्रश्न 3 – हरबेरियम के कार्यों का उल्लेख कीजिए। 

उत्तर – हरबेरियम के कार्य (Functions of Herbarium) 

सही पहचान तथा ऐल्फा टेक्सोनोमी इसके प्राथमिक कार्य हैं। छात्रों के सामान्य वर्गिकी तथा हरबेरियम के मध्य अन्तक्रिया इसका दूसरा कार्य है।

राष्ट्रीय हरबेरिया के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं-

(1) पौधे के विषय में पूरी वैज्ञानिक जानकारी देना।

(2) राष्ट्रीय पादप सम्पदा का संरक्षण।

(3) दूसरे हरबेरिया आदि से पादपों का विनिमय करना तथा वनस्पति जगत की दूसरी शाखाओं को भी इस संचयन से लाभ पहुँचाना।

हरबेरिया को वर्गीकृत कर सकते हैं-

(a) क्षेत्रीय हरबेरिया

(b) स्थानीय हरबेरिया

(c) यूनिवर्सिटी, इन्स्टीट्यूट तथा कॉलेज के हरबेरिया।

प्रश्न 4 गेहूँ व क्रोटोलेरिया का पुष्प आरेख बनाइए तथा पुष्पसूत्र लिखिए। 

उत्तर – मैहूँ एवं क्रोटोलरिया का पुष्प आरेख (Floral diagram of Wheat and Crotolaria)

Bsc 2nd Year Botany IV Diversity Of Angiosperms Systematics Development & Reproduction Notes
Bsc 2nd Year Botany IV Diversity Of Angiosperms Systematics Development & Reproduction Notes

गेहूँ : पुष्पसूत्र-Br, Br!Lemma) % Pe Lodicule) A3 G(1) क्रोटोलेरिया : पुष्पसूत्र– Br, POK(2/3) C1+ 2 + (2) A(10) GI

प्रश्न 5 धतूरा का पुष्पसूत्र लिखिए तथा पुष्प आरेख भी बनाइए। 

उत्तर – पुष्पसूत्र (Floral formula)-Ebr eKET CRAF.GA

धतूरा का पुष्प आरेख (Floral diagram of Dhatura)

चित्र-धतूरा का पुष्प आरेख।

प्रश्न 6 पोएसी कुल के आर्थिक महत्त्व के 10 पौधों के नाम लिखिए। 

उत्तर – पोएसी कुल के आर्थिक महत्त्व के 10 पौधे

(10 Plants of Family Poaceae for Economic Importance) . 

(1) Sorghum, Cynodon dactylon, Sporobolus, Agrostis आदि का प्रयोग

चारे के रूप में होता है। –

(2) Oryza sativa (चावल), Triticum vulgare (गेहूँ), Hordeum vulgare

(जौ), Zea mays (मक्का ), Avena sativa (जई) का उपयोग अनाज के रूप में होता है।

(3) Sorghum vulgare (ज्वार), Pennisetum typhoideum (बाजरा) इनका . प्रयोग मोटे अनाज के रूप में होता है।

(4) Saccharum officinarum (गन्ना) इससे चीनी बनती है।

(5) Vetiveria zizanoides (खस) से परफ्यूम निकलता है तथा इससे खस-खस की टट्टियाँ भी बनती हैं जो कूलर में प्रयुक्त होती हैं।

(6) Saccharum munja तथा Saccharum spontaneum से रेशा प्राप्त होता है।

(7) Eulaliopsis pinnata से कागज बनता है।

(8) Arundo donax से कलम बनाई जाती है।

(9) Cynodon dactylon: (दूब घास) जानवर खाते हैं।

(10) Dandrocalamus (बेंत) से फर्नीचर बनाते हैं।

प्रश्न 7 जस्टीशिया एवं बारलेरिया का पुष्प आरेख बनाइए व पुष्पसूत्र लिखिए। 

उत्तर – जस्टीशिया एवं बारलेरिया का पुष्प आरेख

(Floral diagrams of Justicia and Barleria). 

जस्टीशिया : पुष्पसूत्र (Floral formula)-

Br, Brl % @K(4-5) C2/3) A2 G(2)

बारलेरियाः पुष्पसूत्र (Floral formula)-Br08 K2+ 2 Ci/A) A, G (2)

चित्र-जस्टीशिया का पुष्प आरेख। चित्र-बारलेरिया का पुष्प आरेख। .

प्रश्न 8 रेननकुलस का पुष्प आरेख बनाइए व पुष्पसूत्र लिखिए।

उत्तर – रेननकुलस का पुष्प आरेख (Floral diagram of Ranunculus)

चित्र-रेननकुलस का पुष्प आरेख।

पुष्पसूत्र (Floral formula)-Br G ! KFCF Am Gon

प्रश्न 9 तुलसी का पुष्प आरेख बनाइए तथा पुष्पसूत्र लिखिए। 

उत्तर – तुलसी का पुष्प आरेख [Floral diagram of Basil (Ocimum)]

पुष्पसूत्र (Floral formula)—Br%CK(1/4) C-4/1) À 4 G(2)

प्रश्न 10 निम्नलिखित पादपों में से किन्हीं दो के लक्षणों के अनुसार उनके कुल तक का वर्गीकरण बेन्थम व हुकर के अनुसार कीजिए

(i) सिट्रस (Citrus), (ii) ओसिमम (Ocimum), (iii) पाइरस (Pyrus)

उत्तर-(i) सिट्रस (Citrus) :

डाइकॉटीलीडन्स (Dicotyledons) _ पॉलीपेटेली (Polypetalae)

डिस्कीफ्लोरी (Disciflorae) -जिरेनिएल्स (Geraniales) : रूटेसी (Rutaceae)

सिट्रस (Citrus)

(ii) ओसिमाना (Ocimum) : डाइकॉटीलीडन्स (Dicotyledons) गेमोपेटेली (Gamopetalae) बाइकार्पेलेटी (Bicarpellatae) लेमिएल्स (Lamiales)

लेमिएसी (Lamiaceae)

(iii) पाइरस (Pyrus):

डाइकॉटीलीडन्स (Dicotyledons)

पॉलीपेटेली (Polypetalae)

केलिसीफ्लोरी (Calyciflorae)

रोजेल्स (Rosales)

रोजेसी (Rosaceae)

पाइरस (Pyrus)

प्रश्न 11 – तुलसी, गेहूँ, अरण्ड, सन्तरा, अंजीर का एक-एक विशिष्ट लक्षण लिखिए। 

उत्तर – विशिष्ट लक्षण (Specific Character) 

(i) तुलसी (Ocimum) – वर्टीसिलास्टर पुष्पक्रम।

(ii) गेहूँ (Triticum) कैरियोप्सिस फल।

(iii) अरण्ड (Ricinus) -शाखित पुंकेसर।

(iv) सन्तरा (Citrus) हेस्पेरीडियम फल। न

(v) अंजीर (Ficus) – हाइपेन्थोडियम पुष्पक्रम।

प्रश्न 12 – एकेन्थेसी कुल के आर्थिक महत्त्व का वर्णन कीजिए। 

उत्तर एकेन्थेसी कल का आर्थिक महत्त्व (Economic Importance of Acanthaceae) : 

एकेन्थेसी कुल का आर्थिक महत्त्व निम्नवत् है –

(1) Adhatoda vasica की जड़ें एवं पत्तियाँ खाँसी, bronchitis एवं अस्थमा में

काम आती हैं।

(2) Barleria एक खूबसूरत पौधे के रूप में उद्यानों में लगाया जाता है।

(3) Thunbergia alata भी उद्यानों में लगाया जाता है।

(4) Justicia gandarussa एक सामान्य रूप में लगाया जाने वाला hedge

पौधा है। इसकी छोटी पत्तियों का काढ़ा rheumatism में उपयोगी होता है। इसकी

पत्तियाँ कान के दर्द में प्रयोग में लायी जाती हैं।

(5) Peristrophe bicalyculata साँप के काटने के इलाज में काम आती है।

प्रश्न 13 – सिट्रस का पुष्प आरेख बनाइए व पुष्पसूत्र लिखिए। 

उत्तर सिट्रस का पुष्प आरेख (Floral diagram of Citrus) 

पुष्पसूत्र (Floral formula) — Ebr © ¢ K%C5 A 00 (Polyadelphous) G()

प्रश्न 14 – डेल्फीनियम का पुष्प आरेख बनाइए। 

उत्तर – डेल्फीनियम का पुष्प आरेख (Floral diagram of Delphinium).

चित्र-डेल्फीनियम का पुष्य आरेख।

प्रश्न 15 – एपिएसी कुल के मुख्य लक्षण लिखिए। । 

उत्तर –  एपिएसी कुल के मुख्य लक्षण

(Salient features of Apiaceae) 

एपिएसी कुल के मुख्य लक्षण अग्रलिखित हैं –

(1) सामान्य रूप से एकवर्षीय अथवा बहुवर्षीय शाक।

(2) पत्तियाँ संयुक्त, एकान्तर (alternate) एवं अननुपत्री (exstipulate) होती हैं।

(3) पुष्पक्रम छत्रक (umbel) होता है। .

(4) अधोवर्ती अण्डाशय (ovary inferior) एवं एक डिस्क होती है। डिस्क epigynous होती है।

(5) वर्तिका के नीचे शून भाग होता है जिसे वर्तिकापाद (stylopodium) कहते हैं।

(6) फल क्रीमोकार्प (भिदुर फल) है जो कि दो mericarps में विभाजित होता है।

(7) पौधे में तेल-ग्रन्थियाँ व वाहिकाएँ मिलती हैं जिनमें सुगन्धित तेल (aromatic oil)

मिलता है।

प्रश्न 16 – गेहूँ (ट्रिटिकम), धनिया (कोरिएन्ड्रम) तथा नाइजेला का वर्गीकरण कीजिए। 

उत्तर- (i) गेहूँ अथवा ट्रिटिकम (Triticum) :

मोनोकॉटीलीडन्सं (Monocotyledons)

ग्लूमेसी (Glumaceae) –

पोएसी (Poaceae)

ट्रिटिकम (Triticum)

(ii) धनिया अथवा कोरिएन्ड्रम (Coriandrum):

डाइकॉटीलीडन्स (Dicotyledons)

पॉलीपेटेली (Polypetalae)

केलिसीफ्लोरी (Calyciflorae)

अम्बेलेल्स (Umbellales)

एपिएसी (Apiaceae)

कोरिएन्ड्रम (Coriandrum)

(iii) नाइजेला (Nigella):

डाइकॉटीलीडन्स (Dicotyledons)

पॉलीपेटेली (Polypetalae)

थैलेमीफ्लोरी (Thalamiflorae)

रेनेल्स (Ranales)

रेननकुलेसी (Ranunculaceae)

नाइजेला (Nigella)

प्रश्न 17- एडाटोडा का पुष्प आरेख बनाइए तथा पुष्पसूत्र लिपि 

उत्तर – एडाटोडा का पुष्प आरेख (Floral diagram of Adhatoda)

पुष्प सूत्र (Floral formula)-Br % @K3/2 C(2/3)A2 G(2)

प्रश्न 18 अरण्ड (Ricinus) का पुष्प आरेख बनाइए।

उत्तर – अरण्ड का पुष्प आरेख (Floral diagram of Ricinus)

प्रश्न 19 मकोय का पुष्प आरेख बनाइए तथा पुष्पसूत्र लिखिए। 

उत्तर – मकोय का पुष्प आरेख (Floral diagram of Solanum nigrum)

पुष्पसूत्र (Floral formula)-Ebr GK(5) C5) A5 G(2)

प्रश्न 20 एस्क्लेपिआस ट्यूबेरोसा का पुष्प आरेख, पुष्प सूत्र देते हुए वर्णन कीजिए।

उत्तर – एस्क्लेपिआस ट्यूबेरोसा (Asclepias tuberosa) 

सजावटी शाक अथवा क्षुप

तना-वायवीय, ऊर्ध्व, शाखित, शाक व ठोस। –

पत्ती-स्तम्भिक व शाखिक, अनअनुपत्री, एकान्तर (ए० ट्यूबेरोसा) अथवा सम्मुख लेन्साकार, एकशिरीय जालिकावत् शिराविन्यास।

पुष्पक्रम – अक्षीय अथवा अन्तस्थ छत्रक।

पुष्प – असहपत्री, वृन्ती, त्रिज्या सममित, द्विलिंगी, पंचभागी, जायांगाधर।

बाह्यदलपुंज – 5 बाह्यदल छोटे।

दलपुंज – 5 दल, संयुक्तदली।

पुमंग – 5 पुंकेसर, दल लग्न, एकसंघी, परागकोश वर्तिकाग्र से संगलित होकर पुंवर्तिकाग्रछत्र बनाते हैं। कोरोनरी संरचनाएँ उपस्थित परागकोश पराग थैली बनाते हैं।

जायांग – द्विअण्डपी, युक्ताण्डप ऊर्ध्व अण्डाशयी, अण्डाशय स्वतन्त्र, सीमान्त बीजाण्डन्यास, वर्तिकाग्र, पंचकोणीय।

फल – फोलीकल।

पुष्पसूत्र 6, 8, K(5), C(5), [AF G(2)]

प्रश्न 21 एस्क्लेपिआडेसी कुल के मुख्य लक्षण लिखिए।

उत्तर : मुख्य लक्षण (Distinguishing Features)-पादप रबड़क्षीर युक्त, पत्ती : अनअनुपत्री, सम्मुख अथवा चक्रिक। पुष्प : त्रिज्यासममित, द्विलिंगी जायांगाधर दलपुंज : संयुक्तदली, कोरोनरी संरचनाएँ उपस्थित। पुमंग : पोलीनिया उपस्थित, पुंकेसर

एकसंघी, पुंकेसर नलिका में जायांग उपस्थित, दल लग्न पुंकेसर नलिका, परागकोश वर्तिकाग्र से संलग्न होकर पुंवर्तिकाग्रछत्र बनाते हैं। जायांग : द्विअण्डपी, युक्ताण्डप परन्तु अण्डाशय व वर्तिका मुक्त फल : फोलीकल का पुंज। बीज : भ्रूणपोषी रोमगुच्छ युक्त।

प्रश्न 22 साएथियम पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर- साएथियम (Cyathium)

इसमें सहपत्र चक्र (involucre of bracts) बनता है। इस चक्र के सभी सहपत्र आपस में संगलित होकर प्यालेनुमा (cup-shaped) संरचना बना लेते हैं। इस संरचना के बीच में एक

मादा पुष्प मिलता है, जो वृन्त (gynophore) पर लगा होता है। मादा पुष्प त्रिअण्डपी, – युक्ताण्डपी (tricarpellary, syncarpus) होता है। प्रत्येक सहपत्र के अक्ष में नर पुष्प वृश्चिकी एकलशाखी (scorpioid cyme) क्रम में लगे रहते हैं। यह पुष्पक्रम यूफोर्बिया (Euphorbia) वंश का विशिष्ट लक्षण है।

प्रश्न 23 परिभाषा लिखिए-

(i) पुंवर्तिकाग्रछत्र, (ii) स्टाइलोपोडियम, (iii) दलाभिमुख द्विवर्त पुंकेसरी। 

उत्तर – परिभाषाएँ (Definition) 

(i) पुंवर्तिकाग्रछत्र (Gynostegium)—यह वर्तिकाग्र (stigma) के परागकोश

(anther) के संगलित होने से बनता है। यह एस्क्लेपिएडेसी के सदस्यों में मिलता है।

(ii) स्टाइलोपोडियम (Stylopodium)-यह एपिएसी कुल के सदस्यों में

मिलता है। वर्तिका (style) का निचला हिस्सा शून होता है और वर्तिकापाद

(stylopodium) बनाता है।

(iii) दलाभिमुख द्विवर्त पुंकेसरी (Obdiplostemonous)-पुंकेसर दो चक्रों में

व्यवस्थित होते हैं, परन्तु बाह्य चक्र दल सम्मुख (opposite to petals) तथा भीतरी चक्र बाह्यदल सम्मुख (opposite to sepals) होता है जैसे कैरियोफिल्लेसी कुल के सदस्यों में।

प्रश्न 24 टिप्पणी लिखिए-

(क) कूटचक्रक (ख) हाइपेन्थोडियम।

उत्तर – (क) कूटचक्रक (Verticillaster)-ये सम्मुख पर्ण (opposite leaves) के कक्ष में संघनित दो द्विशाखी ससीमाक्ष (dichasial cyme) अथवा वृश्चिकी ससीमाक्ष (scorpioid cyme) होते हैं। यह पुष्पक्रम लेबिएटी (Labiatae) कुल के पौधों में पाया जाता है; जैसे—तुलसी (Ocimum)।

(ख) हाइपेन्थोडियम (Hypanthodium)-इस पुष्पक्रम में पुष्पासन , (thalamus) मांसल होकर घड़े के आकार का हो जाता है। इसके मुख पर एक छिद्र (ostiole) होता है जो रोम (hair) से ढका रहता है। खोखले पुष्पासन की अन्त:सतह पर पुष्प लगते हैं जिनमें मादा अथवा नर दोनों प्रकार के एकलिंगी पुष्प होते हैं। अधिकांशतः मादा पुष्प आधार की तरफ तथा नर पुष्प छिद्र की ओर उपस्थित होते हैं; जैसे—बरगद।

प्रश्न 25 – वर्तिका पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – वर्तिका (Style) 

यह अण्डाशय का ऊपरी नलिका रूपी भाग है। अण्डाशय से जुड़ने की स्थिति के अनुसार वर्तिका तीन प्रकार की होती है-

(1) अन्तस्थ (Terminal)-अण्डाशय के शीर्ष पर वर्तिका मिलती है।

(2) पाश्विक (Lateral)-वर्तिका अण्डाशय के पार्श्व में स्थित होती है।

(3) जायांगनाभिक (Gynobasic)-वर्तिका पुष्पासन से सीधी जुड़ी प्रतीत होती है तथा अण्डाशय के मध्य से निकलती हुई दिखाई देती है जैसे लेबिएटी कुल के पौधों में।

प्रश्न 26 – जायांगाधर, परिजायांगी तथा जायांगोपरिक में अन्तर लिखिए। 

उत्तर – जायांगाधर, परिजायांगी व जायांगोपरिक में अन्तर

(Differences between Hypogyny, Perigyny and Epigyny)

क्र o

सं o

जायांगाधर (Hypogyny) परिजायांगी (Perigyny) जायांगोपरिक (Epigyny)
1. पुष्पाक्ष उत्तल, अथवा शंक्वाकार (convex or conical) होता है। पुष्पाक्ष डिस्क, प्यालेनुमा पुष्पाक्ष प्यालेनुमा

अथवा फ्लास्कनुमा disc shaped cup or flask shaped) होता है।

 

पुष्पाक्ष फ्लास्कनुमा flask shaped) होता है
2. पुमंग तथा परिदलपुंज जायांग के साथ-साथ अथवा उसके नीचे ही होता है। पुमंग तथा परिदलपुंज अण्डाशय से ऊपर होते हैं। पुमंग व परिदलपुंज (andro – ecium and perianth) अण्डाशय से ऊपर होते है।
3. पुष्पाक्ष तथा अण्डाशय अलग-अलग होते हैं। पुष्पाक्ष की परिधि पर पुमंग तथा परिदलपुंज मिलते हैं। पुष्पाक्ष तथा अण्डाशय संगलित (fused) होते हैं।

 

प्रश्न 27 – टिप्पणी लिखिए(क) असममित पुष्प (ख) त्रिज्यासममित पुष्प (ग) एकव्याससममित पुष्प

उत्तर – (क) असममित पुष्प (Asymmetrical or Irregular flower)-यदि पुष्प को किसी भी तल से दो बराबर भागों में विभाजित न किया जा सके तो वह पुष्प असममित कहलाता है; जैसे-कैना (Canna)।

(ख) त्रिज्यासममित पुष्प (Actiomorphic flower)-जब किसी पुष्प को किसी भी त्रिज्या से, लम्ब में काटने पर दो बराबर भागों में बाँटा जा सकता हो, तब वह त्रिज्यासममित पुष्प कहलाता है। जैसे-एमारेन्थस।

(ग) एकव्याससममित पुष्प (Zygomorphic flower)-जब किसी पुष्प को केवल एक ही तल से दो बराबर भागों में बाँटा जा सके तब वह एकव्याससममित पुष्प कहलाता है, यदि यह मध्यस्थ तल से दो बराबर भागों में बाँटा जाए तो मध्यस्थ एकव्याससममित (medinaly zygomorphic) पुष्प कहलाता है; जैसे—तुलसी (Ocimum) अथवा पार्वतल (lateral plane) से दो बराबर भागों में बाँटे जाने पर यह पाश्विक एकव्याससममित (laterally zygomorphic) पुष्प कहलाता है; जैसे—पाइसम सेटावइवम।

प्रश्न 28 – वसन्त काष्ठ व शरद् काष्ठ में अन्तर लिखो। 

उत्तर – वसन्त काष्ठ तथा शरद् काष्ठ मे अन्तर-

(Differences between Springwood and Autumn wood)

 क्र०सं०  वसन्त काष्ठ (Spring wood) |  शरद् काष्ठ (Autumn wood).
1. यह अनुकूल परिस्थितियों में बनती है। यह प्रतिकूल परिस्थितियों में बनती है।
2. यह काष्ठ वार्षिक वलय का मुख्य भाग है। वार्षिक वलय में शरद् काष्ठ बहुत सँकरी होती है।
3. इस काष्ठ का रंग हल्का होता है। इस काष्ठ का रंग गहरा होता है।
4. इसमें तन्तु बहुत कम पाए जाते हैं।  इसमें तन्तु बहुत अधिक होते हैं।
5.  इसमें वाहिकाएँ बड़ी तथा चौड़ी होती हैं। इसमें वाहिकाएँ छोटी तथा अपेक्षाकृत सँकरी होती हैं।

 

 

प्रश्न 29 – अन्तर लिखिए – 

(A) कोलेटरल तथा बाइकोलेटरल संवहन पूल में, (B) अन्तरापूलीय तथा अन्तःपूलीय संवहन पूल में,

उत्तर- (A) कोलेटरल तथा बाइकोलेटरल संवहन पूल में अन्तर (Differences between Collateral and Bicollateral Vascular Bundles)

क्रoसo कीलेटरल (Collateral ) बाइकोलेटरल (Bicollateral)
1. फ्लोएम, जाइलम के एक तरफ मिलता है। फ्लोएम जाइलम के दोनों तरफ मिलता है।
2. खुले संवहन पूल में जाइलम तथा फ्लोएम के मध्य एक कैम्बियम मिलता है। खुले संवहन पूल (bundle) में दो कैम्बियम की पट्टियाँ जाइलम के दोनों तरफ मिलती है।

 

(B) अन्तरापूलीय तथा अन्तःपूलीय संवहन पूल में अन्तर

(Differences between Interfascicular and Intrafascicular Cambium)

क्र० स० अन्तरापूलीय कैम्बियम (Interfascicular Cambium) अन्तःपूलीय कैम्बियम (Intrafascicular Cambium)
1.  यह द्वितीयक विभज्योतक है। यह प्राथमिक विभज्योतक है।
2. यह केवल द्वितीयक वृद्धि के समय ही बनता है। यह संवहन पूल में आरम्भ से पाया बनता है।
3.  यह दो संवहन पूल के मध्य बनता है।  यह दो संवहन पूल के मध्य बनता है।

 

प्रश्न 30 ड्रेसीना के तने की अनुप्रस्थ काट का स्वच्छ विस्तृत नामांकित चित्र बनाइए। 

उत्तर – इसीना के तने की अनुप्रस्थ काट

(T.S. of Dracaena Stem)

प्रश्न 31 टाइलोसिस से आप क्या समझते हैं? चित्र द्वारा समझाइए। अथवा टाइलोसिस पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर- टाइलोसिस (Tylosis)

बहुत-से पौधों के तनों में मिलने वाली जाइलम वाहिकाओं (xylem vessels) में  गुब्बारे के आकार की तरह (balloon like) फली हई अतिवद्धियाँ (outgrowths)

मिलती हैं जिन्हें tylosis कहते हैं। ये द्वितीयक जाइलम की वाहिकाओं (vessels) में मिलते हैं। टाइलोसिस का आकार बढ़ने से वाहिका बन्द हो जाती है। पूर्ण विकसित टाइलोसिस में

रेजिन,टेनिन आदि पदार्थ भरे रहते हैं। एक वाहिका में एक से अधिक tylosis मिल सकते हैं। ये हार्ट वुड (heart wood) में मिलती हैं। टाइलोसिस से वाहिकाएँ रूंध जाती हैं, इसके कारण काष्ठ निष्क्रिय (inactive) हो जाती है।

प्रश्न 32 – प्ररोह शीर्ष तथा मूल शीर्ष में क्या अन्तर है

उत्तर – प्ररोह शीर्ष तथा मूल शीर्ष में अन्तर

(Differences between Shoot Apex and Root Apex)

क्र० सं० प्ररोह शीर्ष (Shoot Apex)

 

मूल शीर्ष (Root Apex)
1. यह अन्तस्थ (terminal) होता है। यह उपान्तस्थ (sub terminals) होता है।
2. यह गुम्बदाकार (dome-shaped) होता है। यह प्यालेनुमा (cup-shaped) होता है।
3. इसमें शान्त क्षेत्र (quiescent centre) नहीं मिलता है। इसमें शान्त क्षेत्र मिलता है।
4. प्ररोह शीर्ष तरुण पत्तियों से ढका रहता है। मूल शीर्ष, मूलगोप से ढका रहता है।
5. इसमें पत्तियाँ, शाखाएँ व पुष्प आदि निकलते हैं। इसमें पार्श्व अंग नहीं मिलते हैं।

 

6. इसमें प्लास्टोक्रोन होते हैं। इसमें प्लास्टोक्रोन नहीं मिलते हैं।
7. पार्श्व अंग बहिर्जात होते हैं। इसमें पार्श्व जड़ें अन्तर्जात होती हैं।
8. इसमें कोशिकाएँ निरन्तर विभाजित होकर नई कोशिकाएँ बनाती हैं। इसमें शान्त क्षेत्र की कोशिकाएँ विभाजित नहीं होती हैं।

 

 

प्रश्न 33 विस्तृत टिप्पणी लिखिएएकबीजपत्री तने में द्वितीयक वृद्धि

उत्तर एकबीजपत्री तने में द्वितीयक वृद्धि

(Secondary Growth in Monocot Stem) 

एकबीजपत्री तने के संवहन पूल बन्द (closed) होते हैं, परन्तु पाम में प्राइमरी थिकनिंग मेरिस्टेम (primary thickening meristem) द्वारा चौड़ाई में वृद्धि होती है।

एपिकल मेरिस्टेम (Apical meristem) जो पत्ती के प्राइमोर्डिया के आधार पर होता है, उसमें टेन्जेन्शियल विभाजन (tangential divisions) होते हैं। इससे ग्राउन्ड  पैरेन्काइमा (parenchyma) तथा प्रोकैम्बियल स्टैन्ड (procambial strand) बनते हैं जो बाद में संवहन पूल में विकसित होते हैं। प्राइमरी थिकनिंग के पश्चात् अक्ष की लम्बाई में वृद्धि होती : है तथा ग्राउन्ड पैरेन्काइमा की मोटाई भी बढ़ती है। यह कोशिका विभाजन तथा उनके दीर्धीकरण के कारण होती है। इस वृद्धि को डिफ्यूज द्वितीयक वृद्धि (diffuse secondary growth) कहते हैं।

यक्का तथा ड्रेसीना (Yucca and Dracaena) में विशेष प्रकार के कैम्बियम से द्वितीयक वृद्धि होती है। यह कैम्बियम प्राइमरी थिकनिंग मेरिस्टेम के सतत (continuation) पाया जाता है। इससे द्वितीयक संवहन पूल (secondary vascular bundles) तथा कन्जक्टिव ऊतक (conjunctive tissue) नीचे की तरफ बनता है, ऊपरी ओर कुछ मृदूतक (parenchyma) भी बन सकती है। द्वितीयक संवहन पूल फ्लोएमकेन्द्री या पोषवाह केन्द्री (amphivasal) हो सकते हैं।

प्रश्न 34 अन्तःकाष्ठ रसकाष्ठ पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर अन्तःकाष्ठ तथा रसकाष्ठ

(Heartwood and Sapwood) 

पौधों के पुराने तनों में काष्ठ (wood) का केन्द्रीय भाग (central portion) स्थाया रूप से बहुत कठोर हो जाता है। टेनिन (tannin), रेजिन (resin) तथा गोंद (gum) आदि पदार्थों की उपस्थिति के कारण इसका रंग गहरा बादामी या काला हो जाता है। इस भाग का हार्टवुड या ड्यूरामेन (heartwood or duramen) कहते हैं। इसकी वाहिकाएँ (vessels टाइलोसिस (tylosis) बनने के कारण सँध (plug) जाती हैं। इस भाग का मुख्य कार्य पौधों का यांत्रिक सहायता (mechanical support) देना है। यह काष्ठ निष्क्रिय होती है।

द्वितीय काष्ठ का परिधि वाला बाहरी भाग हल्के रंग का होता है। इसको सेपवुड या एलबर्नम (sapwood or alburnum) कहते हैं। यही काष्ठ (wood) का सक्रिय (active) भाग है। इसके द्वारा जल व खनिज लवण पौधों के अन्य भागों तक पहुँचते हैं।

प्रश्न 35 चालनी नलिकाओं तथा सहचर अथवा कम्पेनियन कोशिकाओं में अन्तर लिखिए।

उत्तर- चालनी नलिकाओं तथा सहचर कोशिकाओं में अन्तर-

(Differences between Sieve tubes and Companion cells)

क्र० सं० चालनी नलिकाएँ (Sieve tubes)

 

सहचर कोशिकाएँ (Companion cells)
1. ये लम्बी तथा पतली, जीवित कोशिकाएँ होती हैं। ये Sieve tube के साथ पायी जाने वाली लम्बी व पतली कोशिकाएँ होती है।
2. इनकी अनुप्रस्थ भित्ति में छिद्र होते हैं। इनमें छिद्र (pores) अनुपस्थित होते हैं।
3. प्रारम्भिक अवस्था के अतिरिक्त इनमें केन्द्रक नहीं होता है। ये कोशिकाएँ सदा प्रोटोप्लाज्म से घिरी रहती हैं तथा इनमें प्रत्येक में एक बड़ा केन्द्रक होता है।

 

4. ये सभी vascular पौधों में पायी जाती हैं। ये टेरिडोफाइटा तथा जिम्नोस्पर्मस में नहीं जाती हैं।

 

प्रश्न 36 टिप्पणी लिखिए-घाव का भरना। 

उत्तर – घाव का भरना (Healing of Wound) “

पौधों में बाह्य कारणों से घाव बन जाते हैं, जिनमें परजीवी कवक, जीवाणु; कीट आदि पनप सकते हैं। अतः घावों का भरना व सूखना आवश्यक होता है। चोटिल कोशिकाओं के नीचे

की परत से कुछ रक्षक पदार्थ जैसे सुबेरिन आदि निकलते हैं। कभी-कभी रबड़क्षीर (और भी निकलता है जिसकी परत घाव की रक्षा करती है।

गहरे घावों में आस-पास की कोशिकाएँ विभाजित होकर कैलस (callus) बना यह कैलस घाव को ढक लेता है। कहीं-कहीं इसके कारण गाँठ (knot) भी बनती है। इस में कॉर्क का निर्माण भी होता है। इसे आघात कॉर्क (wound cork) तथा इसको बनाने वा कैम्बियम को आघात कैम्बियम (wound cambium) कहते हैं। कैलस से घाव भरने । पश्चात् भी कुछ भाग खुला रहता है जिसे गाँठ (knot) कहते हैं। गाँठ शाखाओं के मख्य और में धंसने तथा उनके आधार पर द्वितीयक वृद्धि होने के कारण बनती है।

प्रश्न 37 सॉफ्ट वुड व हार्ड वुड में अन्तर लिखिए।

उत्तर – सॉफ्ट वुड तथा हार्ड वुड में अन्तर

(Differences between Soft wood and Hard wood) क्र०सं०/- सॉफ्ट वुड (Soft wood) हार्ड वुड (Hard wood)

क्र० सं० साँफ्ट वुड (Soft wood) हार्ड वुड (Hard wood)
1. यह काष्ठ जिम्नोस्पर्म में मिलती है। यह काष्ठ द्विबीजपत्री पौधों में मिलती हैं।
2. इस काष्ठ में वाहिकाएँ नहीं मिलती हैं। इस काष्ठ में वाहिकाएँ मिलती हैं।
3. यह काष्ठ नॉन-पोरस (non-porous) होती हैं।  यह काष्ठ पोरस (porous) होती है।
4. इस काष्ठ में जाइलम तन्तु बहुत कम मिलते हैं। इस काष्ठ में जाइलम तन्तु बहुतायत में मिलते है।
5. जाइलम में वाहिनिकाएँ (tracheids) अधिकता में मिलती है। जाइलम में वाहिनिकाएँ अपेक्षाकृत कम मिलती हैं।

 

प्रश्न 38 शान्त क्षेत्र पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – शान्त क्षेत्र (Quiescent Centre)

‘clowes (1958) ने शान्त क्षेत्र की खोज मक्का की जड़ (Maize root) में की। इसमें अपेक्षाकृत कम DNA, RNA व प्रोटीन होती है। इनमें माइटोकॉण्ड्रिया, केन्द्रक, केन्द्रिक, डिक्टियोसोम, E.R. भी छोटे होते हैं। ये कोशिकाएँ सक्रिय रूप से विभाजित नही होती हैं। यह जोन अर्द्धचन्द्राकार या डिस्कॉइड हो सकता है। इस क्षेत्र की कोशिकाआ की संख्या. 500-1000 तक हो सकती है। विभज्योतक कोशिकाओं की संख्या लगभग 1,25,000-2,50,000 तक हो सकती है। शान्त क्षेत्र (auiescent centre) की काशिकाएँ अन्य विभज्योतक कोशिकाओं की हानि होने पर सक्रिय हो सकती हैं। यह विकिरण (radiation) तथा सर्जिकल प्रयोगों (surgical treatment) द्वारा सिद्ध किया जा सकता है। शान्त क्षेत्र अन्य पादपों की मूल में मिलते हैं, परन्तु इसमें कोशिकाओं की संख्या भिन्न-भिन्न हो सकती है। उदाहरण-मक्का में 500, Sinapis alba में 600 वा faba में 1100 तक होती है।

मूलगोप शान्त क्षेत्र की कोशिकाओं को मूल विभज्योतक की एक विशिष्ट अवस्था में नियन्त्रित करती है।

शान्त क्षेत्र की कोशिकाओं पर समीप की विभाजित कोशिकाएँ दबाव डालती हैं तथा इनको अक्रिय (inactive) बनाने में सहयोग करती हैं।

रेडियोऐक्टिव थाइमिडीन द्वारा भी शान्त क्षेत्र की पुष्टि हुई है। इस क्षेत्र की कोशिकाएँ stand by zone बनाती हैं। मूल की मुख्य विभज्योतक कोशिकाओं को हानि होने पर (injury) ये कोशिकाएँ सक्रिय हो सकती हैं।

प्रश्न 39 मूल के विभिन्न क्षेत्रों का सचित्र वर्णन कीजिए। 

उत्तर – मूल के क्षेत्र (Regions of Root)

ये निम्नलिखित प्रकार के हैं –

मूलगोप जोन (Root cap zone)-जलीय पादपों को छोड़कर यह प्रायः सभी पादपों में मूल के सिरे पर मिलती है। यह प्रोटोडर्म या एक विशिष्ट मेरिस्टेम केलिप्ट्रोजन (calyptrogen) से विकसित होती है।

कोशिका विभाजन क्षेत्र (Zone of cell division)—यह मूलगोप के ठीक पीछे होता है। इसकी कोशिकाएँ सक्रिय रूप से विभाजित होती हैं। इनका केन्द्रक, बड़ा तथा साइटोप्लाज्म सघन (dense cytoplasm) होता है।

कोशिका दीर्धीकरण क्षेत्र (Zone of cell elongation)-यह जोन कोशिका विभाजन क्षेत्र, (zone of cell division) के पीछे होता है। इसमें प्रोटोडर्म, ग्राउण्ड मेरिस्टेम तथा प्रोकैम्बियम (protoderm, ground meristem and procambium) विकसित होते हैं।

कोशिका परिपक्वन क्षेत्र (Zone of cell maturation)-इस क्षेत्र में कोशिकाएँ विभाजन, दीर्धीकरण व विकसित होकर परिपक्व हो जाती हैं। इसमें मूलरोम (root hairs) भी बनते हैं।

स्थायी ऊतक क्षेत्र (Zone of permanent tissue)-इस क्षेत्र की कोशिका परिपक्वन के पश्चात् स्थायी आकार ले लेती हैं तथा स्थायी ऊतक बनाती हैं।

प्रश्न 40 विभज्योतक तथा स्थायी ऊतक में अन्तर स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर – विभज्योतक तथा स्थायी ऊतक में अन्तर 

(Differences between Meristematic and Permanent Tissues)

क्र० सं० विभज्योतक स्थायी ऊतक
1. कोशिका भित्ति पतली होती है। कोशिका भित्ति पतली अथवा दृढ़ होती है।
2. कोशिकाएँ समव्यासी होती हैं। कोशिकाएँ विभिन्न आकार व आमाप की होती है।
3. अन्तराकोशिकीय अवकाश सामान्यत: नहीं पाए जाते हैं। अन्तराकोशिकीय अवकाश मिल सकते हैं।
4. कोशिकाद्रव्य सघन होता है। कोशिकाद्रव्य विरल होता है।
5. केन्द्रक बड़ा होता है। केन्द्रक छोटा होता है।
6. कोशिकाओं में विभाजन की क्षमता मिलती है। कोशिकाएँ प्रायः अविभाज्य होती हैं।
7. कोशिकाएँ अपरिपक्व व अविकसित होती है। कोशिकाएँ परिपक्व व विकसित होती हैं।
8. कोशिकाएँ सदैव जीवित होती हैं। कोशिकाएँ जीवित अथवा मृत हो सकती हैं।
9. इससे सभी प्रकार के स्थायी ऊतक बनते है। स्थायी ऊतक पौधे के विभिन्न तथा विशिष्ट कार्य करते हैं।

 

प्रश्न 41 रसकाष्ठ तथा अन्तःकाष्ठ में अन्तर लिखिए। 

उत्तर – रसकाष्ठ तथा अन्तःकाष्ठ में अन्तर

(Differences between Sapwood and Heartwood).

क्र० सं० रसकाष्ट (sapwood) अन्तः काष्ट (Heartwood)
1. इसकी वृद्धि तने के बाहरी भाग में होती है। इसकी वृद्धि तने के केन्द्र में होती है।
2. इस. काष्ठ में मृदूतक (parenchyma) की जीवित कोशिकाएँ भी मिलती है। इसमें किसी भी प्रकार की जीवित कोशिकाएँ नहीं मिलती हैं।
3. इसमें आमतौर पर रेजिन, टेनिन आदि नहीं मिलते है। इसमें रेजिन, टेनिन आदि मिलते है।
4. इसमें टाइलेसिस नहीं मिलते हैं। इसमें टाइलेसिस मिलते है।
5. यह काष्ठ क्रियाशील होती हैं। यह काष्ठ अक्रियाशील होती हैं।
6. यह काष्ठ कम भार की तथा हल्के रंग की होती हैं। यह काष्ठ गहरे रंग की तथा भारी होती है।
7. इसमें टाइलेसिस नहीं मिलतें हैं। इसमें टाइलेसिस मिलते है।

 

प्रश्न 42 परिपक्व परागकोश की अनुप्रस्थ काट का चित्र बनाइए। 

उत्तर – परिपक्व परागकोश की अनुप्रस्थ काट

(T. S. of Mature Anther) 

प्रश्न 43 – पंचानन महेश्वरी के कार्यों का उल्लेख कीजिए। 

उत्तर पंचानन महेश्वरी ,

भारत में भ्रूण विज्ञान के पिता पी० महेश्वरी हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में थे। वहीं भ्रूण विज्ञान का कार्य आरम्भ हुआ। वहाँ काम करने वाले प्रो० बी० एम० जौहरी, आर० एन० केपिल, आई० के० वसील, रंगास्वामी, चोपड़ा, सच्चर, वार्डला, स्टीफन, साउडनडस आदि थे। आजकल भोजवानी, भटनागर, शिवन्ना आदि इसमें कार्य कर रहे हैं।

पी० महेश्वरी ये दिल्ली विश्वविद्यालय में वनस्पति विभाग के अध्यक्ष थे। ये ‘भ्रूण विज्ञान के भारतीय पिता’ कहलाते हैं। इनका जन्म नवम्बर, 1904 में श्री विजयलाल महेश्वरी के घर जयपुर में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा जयपुर में तथा बाद की शिक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय में हुई। इन्होंने ‘भारतीय वनस्पतिशास्त्र सोसाइटी’ की नींव रखी।

अध्यापक के रूप में आगरा कॉलेज, इलाहाबाद, लखनऊ, ढाका आदि में इन्होंने काम किया। दिल्ली विश्वविद्यालय में इन्होंने मार्च, 1949 में अध्यक्ष पद का भार ग्रहण किया। सन् 1966 में इनका स्वर्गवास हुआ।

मुख्यत: प्रो० पी० महेश्वरी ने भ्रूण विज्ञान व आकारिकी में कार्य किया। इनके द्वारा पुस्तक An Introduction to the Embryology of Angiosperms’ महत्त्वपूर्ण सन् 1950 में ये भारतीय विज्ञान कांग्रेस के सभापति बने। सन् 1954 में वे Nati Institute of Sciences के सदस्य बने तथा सन् 1959 में उन्हें Indian Botanical Society से Birbal Sahni पुरस्कार मिला। सन् 1957 में वे American Academyat Art and Sciences के अवैतनिक सदस्य बने तथा सन् 1959 में उन्हें मैकगिल यनिवर्सिी से D.Sc. की उपाधि मिली। सन् 1961 में वे जर्मन सरकार के कहने पर जर्मनी गए। 18सा 1965 को रॉयल सोसाइटी ने उन्हें F.R.S. से सम्मानित किया।

प्रश्न 44 –  एनाटोपस बीजाण्ड की संरचना पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर एनाट्रोपस बीजाण्ड की संरचना

(Structure of Anatropous Ovule) 

बीजाण्ड प्लेसेन्टा से funicle के माध्यम से जुड़ा रहता है। वह स्थान जहाँ funicle बीजाण्ड के शरीर से जुड़ा रहता है, हाइलम (hilum) कहलाता है। इस प्रकार के बीजाण्ड में funicle हाइलम से आगे भी बीजाण्ड के शरीर पर एक उभार के रूप में चला जाता है। इस उभार को raphe कहते हैं।

बीजाण्ड का मुख्य भाग साधारण, गोल अथवा अण्डाकार होता है, जो कि लगभग एक ही प्रकार की कोशिकाओं का बना होता है। यह भाग nucellus कहलाता है। Nucellus में megaspore mother cell विकसित होती है। Nucellus के चारों ओर एक या दो परतें छल्ले के रूप में होती हैं जिन्हे intediments कहते हैं। Nucellus को leinteguments केवल एक स्थान के अलावा सभी ओर से घेरे रहते हैं। इस खाली स्थान को micropyle कहते हैं।

Nucellus के मुख्य भाग में भ्रूणकोष (embryo sac) होता है। पूर्ण रूप से विकसित embryo sac में तीन एण्टीपोडल कोशिकाएँ (antipodal cells). एक द्वितीयक केन्द्रक (secondary nucleus), दो सिनर्जिड (synergids) एवं एक अण्ड कोशिका (egg cell) होती है।

प्रश्न 45 परागण तथा निषेचन की परिभाषा लिखिए। 

उत्तर – परागण (Pollination) 

परागकणों के परागकोश से वर्तिकाग्र तक पहुँचने की क्रिया को परागण (pollination) कहते हैं। परागण की क्रिया अनेक माध्यमों जैसे कीट, वायु, पश, पक्षी, घोंघा आदि द्वार होती है।

निषेचन (Fertilization)

नर व मादा केन्द्रकों में संलयन होने की क्रिया को निषेचन (fertilization) कहते है। आवतबीजी पादपों में द्विनिषेचन (double fertilization) की क्रिया मिलती हैं। इनमें एक नर केन्द्रक अण्ड कोशिका के साथ संलयन कर भ्रूण बनाता है तथा दूसरा नर केन्द्रक द्वितीयक केन्द्रक के साथ संलयन कर भ्रूणपोष बनाता है।

प्रश्न 46 क्विन्चीमेलियम में भ्रूणपोष चूषक का चित्र बनाइए। 

उत्तर- क्विन्चीमेलियम में भ्रूणपोष चूषक

(Endosperm Sucker in Quinchimalium)

प्रश्न 47 जीनिया व मेटाजीनिया से क्या समझते हैं? संक्षेप में उल्लेख करो। 

उत्तर – जीनिया व मेटाजीनिया

(Xenia and Metaxenia) 

जीनिया यह शब्द फोक (Foeke) ने सन् 1881 में दिया। परागकण का प्रभाव जब बीज व फल पर अर्थात् भ्रूण के अतिरिक्त जैसे संकर जातियों में पहुँचता है तो उसे जीनिया कहते हैं। आजकल इस शब्द का प्रयोग केवल भ्रूणपोष के परिप्रेक्ष्य में करते हैं।

यह परिघटना मक्का की दो किस्मों में देखी जा सकती है। एक में पीला भ्रूणपोष मिलता है तथा दूसरे में सफेद भ्रूणपोष। यदि सफेद भ्रूणपोष वाले मादा का संलयन पीले भ्रूणपोष वाले नर (परागकण) से कराया जाए तो संकरण से प्राप्त भ्रूणपोष पीला होगा अर्थात् परागकण का प्रभाव भ्रूणपोष पर पड़ता हैं।

केवल द्विनिषेचन की नवाशीन द्वारा जानकारी दिए जाने के बाद ही यह पता चल पाया कि परागकण का प्रभाव भ्रूणपोष पर हो सकता है क्योंकि भ्रूणपोष एक नर युग्मक से संलयन पर ही बनता है। व्युत्क्रम क्रॉस में यदि सफेद भ्रूणपोष वाले पौधे से नर युग्मक (pollen grain) तथा पीले भ्रूणपोष बाले पौधे से मादा तो भ्रूणपोष पीला ही होगा क्योंकि पीला रंग. प्रभावी है। वहाँ पर परागकण का प्रभाव नहीं दिखाई देगा।

जीनिया केवल संकर जातियों में मिलता है। यह सिद्ध करता है कि भ्रूणपोष नर युग्मक से संलयन के पश्चात् ही बन सकता है। इस प्रकार यह भगिनी बीजाणुउद्भिद् (sister sporophyte) है।

मेटाजीनियापरागकणों का प्रभाव जब बीज के बीजचोल व फलभित्ति पर मिल तब इसे मेटाजीनिया कहते हैं। इस परिघटना का पता स्विगलर (Swingler) ने सन 100 खजूर में लगाया। उनके अनुसार निषेचन में भाग लेने वाले परागकणों के प्रकार का ही परिपक्वन व आमाप पर प्रभाव पड़ता है। यह हॉर्मोन का प्रभाव हो सकता है जो भ्रण अब भ्रूणपोष अथवा दोनों द्वारा स्रावित होते हैं तथा बीजचोल एवं फलभित्ति तक विसरित होते हैं।

प्रश्न 48 भ्रूणपोष के कार्य लिखिए। 

उत्तरभ्रूणपोष के कार्य

(Functions of Endosperm). 

भ्रूणपोष के निम्नलिखित कार्य हैं:

(1) विकसित होते भ्रूण के लिए पूर्ण पोषण का प्रबन्ध करना।

(2) भ्रूणपोष के विकास के साथ ही भ्रूण वृद्धि करता है। यदि ऐसा न हो तो बीज जीवनक्षम नहीं हो पाता है। (3) अभ्रूणपोषी बीजों में भ्रूण बनने पर भ्रूणपोष समाप्त हो जाता है; जैसे-दलहन में।

(4) भ्रूणपोष की अनुपस्थिति में (आर्किडेसी) दूसरे पोषक ऊतक भी मिलते हैं। ।

(5) कुछ अनाजों में भ्रूणपोष के अनेक स्तर आधार पर ट्रांसफर कोशिकाओं के रूप में __मिलते हैं जिनमें कोशिका भित्ति की वृद्धि मिलती है।

नारियल का भ्रूणपोष एक बहुत अच्छा पोषक भ्रूणपोष है तथा यह न केवल अपने भ्रूण को पोषण प्रदान करता है वरन् यह अन्य भ्रूण को तथा अन्य भागों को भी विकास के लिए पोषण प्रदान करता है। इसमें काइनेटिन मिलता है। अखरोट, मक्का आदि का नवभ्रूणपोष भी काइनेटिनयुक्त होता है। नारियल पानी भ्रूण व अन्य ऊतकों में विभेदन प्रेरित कर सकता है। परिपक्व भ्रूणपोष में हॉर्मोन नहीं मिलता है। ये वृद्धि के लिए निरोधक भी हो सकते हैं। नवभ्रूणपोष में ऑक्सिन, साइटोकाइनिन, जिबरेलिन आदि मिलते हैं। मक्का के भ्रूणपोष में .. जिएटिन (साइटोकाइनिन) मिलता है।

यह पाया गया है कि यदि भ्रूणपोष निकाल दिया जाए तो नवभ्रूण का विकास नहीं होता है

चाहे उसे किसी उच्च पोषक माध्यम पर ही क्यों न रखा जाए। इसका अर्थ है कि भ्रूण के विकास का नियमन भ्रूणपोष द्वारा होता है।

प्रश्न 49 निमेक प्रक्रम से आप क्या समझते हैं

उत्तर निमेक प्रक्रमः

(Nemec Phenomenon)

सामान्यत: एक परिपक्व परागकण में केन्द्रकों की संख्या 2 अथवा 3 होती है. परन्त कळ दशाओं में परागकण में केन्द्रक की संख्या 8 तक होती है। नर युग्मक में 8 केन्द्रक के होने से उसकी स्थिति भ्रूणकोष के समान होती है। 8 केन्द्रक भी पॉलीगोनम भ्रूणकोष (Polygonum type embryo sac) के समान व्यवस्थित रहते हैं। निमेक (Nemec) ने सर्वप्रथम इस क्रिया को हायसिन्थ ओरिएन्टेलिस (Hyacinth orientalis) के परागकणों में देखा और इन्हें Giant pollen grain कहा। मोल (1923) तथा नथानी (1937) ने भी इस तथ्य की पुष्टि की और इस क्रिया को निमेक प्रक्रम (Nemec Phenomenon) कहा।

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