BSC Physics Very Short Question Answer

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Ch. Charan Singh University, Meerut

Latest Syllabus

CIRCUIT FUNDAMENTAL AND BASIC ELECTRONICS

 

 

Unit-I

 

Growth and decay of currents through inductive resistances, charging and discharging in R.C. and R.L.C. circuits, Time constant, Measurement of high resistance by Leakage Method, A.C. Bridges, Maxwell’s and Schering’s Bridges, Wien Bridge. Thevenin, Norton, and superposition theorems and their applications.

 

Unit-II 

 

Semiconductors, intrinsic and extrinsic semiconductors, n-type and p-type semiconductors, unbiased diode, forward bias and reverse bias diodes, diode as a rectifier, diode characteristics, zener diode, avalanche and zener breakdown, power supplies, rectifier, bridge rectifier, capacitor input filter, voltage regulation, zener regulator.

Bipolar transistors three doped regions, forward and reverse bias, D.C. alpha, D.C. beta transistor curves.

 

Unit-III

 

Transistor biasing circuits base bias, emitter bias, and voltage divider .bias, D.C. load line. Basic A.C. equivalent circuits, low-frequency model, small-signal amplifiers, common emitter amplifier, common collector amplifiers, and common base amplifiers, current and voltage gain, R.C. coupled amplifier, gain, frequency response, the equivalent circuit at low medium and high frequencies, feedback principles.

 

Unit-IV

 

Input and output impedance, transistor as an oscillator, general discussion, and theory of Hartley oscillator only. Elements of transmission and reception, basic principles of amplitude modulation and demodulation. Principle and design of linear multimeters and their application, cathode ray oscilloscope, and its simple applications.

 

 

भौतिक विज्ञान

(मूल परिपथ तथा प्रारम्भिक इलेक्ट्रॉनिकी) 

 

खण्ड

लघु उत्तरीय प्रश्न?

प्रश्न 1. प्रेरकत्व युक्त परिपथ का कालांक क्या है

उत्तर : प्रेरकत्व युक्त परिपथ का कालांक समय का वह मान है जिसमें धारा का मान शून्य से बढ़कर अपने अधिकतम मान का 0.632 हो जाए।

 

प्रश्न 2. CR-परिपथ का कालांक क्या होता है? इसका संधारित्र के आवेशन व निरावेशन पर क्या प्रभाव पड़ता है

उत्तर : संधारित्रं के आवेशन में आवेश वृद्धि की दर

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प्रश्न 3. 0.5uF धारिता के एक संधारित्र को 10 मेगाओम के प्रतिरोध में निरावेशित किया जाता है। बताइए संधारित्र से आधा आवेश निकल जाने में कितना समय लगेगा? [दिया है : loge 2 = 0.69]

हल : संधारित्र के निरावेशन की समीकरण निम्नवत् है

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प्रश्न 4. अध्यारोपण प्रमेय को लिखिए तथा प्रदर्शित कीजिए।

उत्तर : अध्यारोपण की प्रमेय-किसी ऐसे रेखीय नेटवर्क की किसी शाखा में, जिसमें एक से अधिक विद्युत – वाहक बल के स्रोत हों, धारा का मान धाराओं के बीजगणितीय योग के बराबर होता है जो प्रत्येक विद्युत वाहक बल के स्रोत पर अलग-अलग विचार करने से प्राप्त होती है, जबकि उस समय अन्य सभी स्रोतों को उनकी आन्तरिक प्रतिबाधाओं से प्रतिस्थापित कर दिया गया हो।

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प्रश्न 6. एक LR परिपथ में एक आवेशित संधारित्र निरावेशित होता है। बेतारी तार संचार में इसकी क्या महत्ता है

उत्तर : जब कोई आवेशित संधारित्र किसी प्रेरकत्व व प्रतिरोध वाले परिपथ में निरावेशित होता है तब यदि परिपथ का प्रतिरोध, 2 L/C से कम हो तो संधारित्र का निरावेशन ‘दोलनी’ होता हैं। निरावेशन के दौरान आवेशित संधारित्र की ऊर्जा, प्रेरक कुण्डली में उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र में संचित होती है तथा यह पुन: संधारित्र की प्लेटों के बीच वैद्युत क्षेत्र में वापिस हो जाती है। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। यदि क्षेत्र तेजी से प्रत्यावर्तित हो तो परिपथ में कछ ऊर्जा स्थायी रूप से विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के रूप में बाहर निकल जाती है जो कि आकाश में प्रकाश की चाल से चलती है। यही बेतारी तार संचार का आधार है।

 

प्रश्न 7. वैद्युत परिपथों के सम्बन्ध में किरचॉफ के नियम लिखिए तथा समझाइए। अथवा किरचॉफ के नियमों को लिखिए। 

उत्तर : किरचॉफ के नियमसन् 1842 में जर्मन वैज्ञानिक किरचॉफ ने दो नियम दिए जिनके द्वारा हम जटिल परिपथों के विभिन्न चालकों के बीच धारा का वितरण ज्ञात कर सकते हैं। ये दो नियम निम्नानुसार हैं

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  1. किरचॉफ का धारा नियम— किसी वैद्युत परिपथ में किसी भी । सन्धि पर मिलने वाली धाराओं का बीजगणितीय योग शून्य होता है। / अर्थात् ZI = 0 उदाहरण के लिए, चित्र-1 में चार चालक सन्धि 0 पर. चित्र-3 . मिलते हैं। माना कि इनमें बहने वाली धाराएँ ,i1,i2,i3 व i4 हैं। परिपाटी के अनुसार i1 व i2 धनात्मक हैं (सन्धि की ओर) जबकि i3 व i4 ऋणात्मक हैं (सन्धि से बाहर की ओर)। अत: किरचॉफ के नियमानुसार—

 

                    i1 + i2 – i3 – i4 = 0

अथवा             i1 + i2 = i3+i4

इस प्रकार, किरचॉफ का पहला नियम आवेश के संरक्षण को व्यक्त करता है।

  1. किरचॉफ का वोल्टेज नियम— किसी परिपथ में प्रत्येक बन्द लूप (पाश) के विभिन्न खण्डों में बहने वाली धाराओं तथा संगत प्रतिरोधों के गुणनफलों का बीजगणितीय योग उस पाश में लगने वाले विद्युत वाहक बलों के बीजगणितीय योग के बराबर होता है।

EiR= EE

 

इस नियम को लगाते समय, जब हम धारा की दिशा में चलते हैं तो धारा तथा संगत प्रतिरोध की गुणा को धनात्मक लेते हैं तथा सेल के विद्युत अपघट्य के भीतर ऋण इलेक्ट्रोड से धन इलेक्ट्रोड की ओर चलने पर विद्युत वाहक बल को धनात्मक लेते हैं।

 

प्रश्न 8. आन्तर अर्द्धचालक की परिभाषा दीजिए। 

उत्तर : आन्तर अर्द्धचालक— एक शुद्ध अर्द्धचालक, जिसमें कोई अपद्रव्य न हो, आन्तर अर्द्धचालक कहलाता है। इस प्रकार शुद्ध जर्मेनियम तथा शुद्ध सिलिकॉन अपनी प्राकृतिक अवस्था में आन्तर अर्द्धचालक है, तथा उनकी वैद्युत चालकता (जोकि ऊष्मीय उत्तेजन के कारण है) “आन्तर” चालकता है।

 

प्रश्न 9. किसी परिपथ के गुणता कारक Q से आप क्या समझते हैं

उत्तर : किसी अवमंदित दोलनकारी परिपथ के प्रत्येक दोलनकाल में परिपथ में संचित ऊर्जा तथा परिपथ में क्षय ऊर्जा के अनुपात के 2pie गुने को परिपथ का गुणता कारक कहते हैं।

प्रश्न 10. नार्टन प्रमेय को लिखिए तथा इसका परिपथ प्रदर्शित कीजिए। 

उत्तर : नार्टन की प्रमेय (Norton’s Theorem)-अनेक जनित्रों एवं रेखीय प्रतिबाधाओं वाले किसी नेटवर्क के किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच जुड़ी लोड-प्रतिबाधा से होकर बहने वाली धारा का मान वही होता है जबकि यह लोड-प्रतिबाधा किसी ऐसे अकेले धारा-जनित्र (current generator) से जुड़ी हो जिससे उत्पन्न धारा उस धारा के बराबर है जो कि नेटवर्क के उन दो सिरों को लघुपथित (short circuit) करने पर प्राप्त होती है जिनके बीच लोड-प्रतिबाधा जुड़ी है, तथा जो उस प्रतिबाधा के समान्तर-क्रम में हो जो कि उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच से देखने पर नेटवर्क की प्रतिबाधा होती जबकि नेटवर्क में सभी जनित्रों को उनकी आन्तरिक प्रतिबाधाओं से प्रतिस्थापित कर दिया गया हो।

 

चित्र-4 (a) में N अनेक जनित्रों तथा रेखीय प्रतिबाधाओं का नेटवर्क है तथा इसके दो निर्गत सिरे A व B हैं। माना सिरों A तथा B को लघुपथित (short circuit) करने पर इसमें धारा i बहती है, तथा Zi सिरों A व B के बीच से देखने पर नेटवर्क की प्रतिबाधा है जबकि सभी जनित्रों को उनकी आन्तरिक प्रतिबाधाओं से प्रतिस्थापित कर दिया गया है। इस प्रमेय के अनुसार नेटवर्क N किसी बाह्य प्रतिबाधा ZL में, जो A व B के बीच जुड़ी है, वही धारा भेजेगा जो कि प्रतिबाधा Zi के समान्तर-क्रम में जुड़ा तथा i धारा उत्पन्न करने वाला एक अकेला धारा-जनित्र भेजता [चित्र-4 (b)

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प्रश्न 11. ऊर्जा बैण्ड चित्र में अपद्रव्य ऊर्जा स्तर दर्शाइए। 

उत्तर : जब किसी नैज अर्द्धचालक में अपद्रव्य मिश्रित किया जाता है तो मिलाए गए अपद्रव्य की सान्द्रता के आधार पर n-टाइप तथा p-टाइप अर्द्धचालक प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 12. चित्र-6 में दर्शाए गए परिपथ के टर्मिनलों A B के बीच खुले परिपथ की वोल्टता तथा थेवनिन प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। 

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प्रश्न 13. p-प्रकार की धातु में फर्मी ऊर्जा स्तर की स्थिति कहाँ होती है

उत्तर : p-प्रकार की धातु में फर्मी ऊर्जा स्तर संयोजी बैण्ड के पास संयोजी बैण्ड ऊर्जा स्तर के अधिकतम मान के ऊपर होता है।

प्रश्न 14. आन्तर तथा बाह्य अर्द्धचालकों के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : आन्तर तथा बाह्य अर्द्धचालकों के बीच अन्तर निम्न प्रकार हैं

 

क्रमांक आन्तर अर्द्धचालक  बाह्य अर्द्धचालक
1. एक शुद्ध अर्द्धचालक (जिसमें कोई अपद्रव्य न हो) आन्तर अर्द्धचालक कहलाता है। किसी शुद्ध अर्द्धचालक में अपद्रव्य मिश्रित करने पर प्राप्त अर्द्धचालक बाह्य अर्द्धचालक कहलाता है।
2. इनकी वैद्युत चालकता काफी कम होती है। इनकी वैद्युत चालकता काफी अधिक

होती है।

3. इनमें फर्मी स्तर ऊर्जा-अन्तराल के ठीक मध्य में होता है।

उदाहरणजर्मेनियम, सिलिकन।

इनमें फर्मी स्तर ऊर्जा-अन्तराल के मध्य के थोड़ा ऊपर अथवा थोड़ा नीचे होता है

उदाहरण-n-टाइप, p-टाइप अर्द्धचालक।

 

 

प्रश्न 15. सन्धि डायोड का गतिक प्रतिरोध क्या होता है?  

उत्तर : सन्धि डायोड का V- i वक्र यह दर्शाता है कि वोल्टेज के बढ़ने पर धारा रैखिक रूप से नहीं बढ़ती अर्थात् ओम के नियम का पालन नहीं होता। अत: सन्धि डायोड के प्रतिरोध को ‘गतिक प्रतिरोध’ के रूप में परिभाषित करते हैं।

 

सन्धि डायोड का गतिक प्रतिरोध Rd डायोड पर आरोपित वोल्टेज में अल्प परिवर्तन (V) तथा धारा में होने वाले संगत अल्प परिवर्तन (i) के अनुपात में परिभाषित होता है।

Rd = V 

 

प्रश्न 16.p-n सन्धि क्या है? .. 

उत्तर : p-n सन्धि— अर्द्धचालक, शुद्ध अथवा अपमिश्रित (p-टाइप अथवा n-टाइप) द्विपाश्विक होते हैं, अर्थात् इनमें वैद्युत धारा किसी भी दिशा में उतनी ही आसानी से प्रवाहित हो सकती है। परन्तु यदि किसी अर्द्धचालक में एक ओर p-टाइप क्षेत्र हो तथा दूसरी ओर n-टाइप क्षेत्र हो तो यह अर्द्धचालक एक-पाश्विक हो जाता है, अर्थात् इसमें वैद्युत धारा केवल एक ही दिशा में आसानी से प्रवाहित हो सकती है। अर्द्धचालक में वह विशिष्ट स्थान जहाँ p-टाइप क्षेत्र n-टाइप क्षेत्र में परिवर्तित होता है ‘p-n सन्धि’ कहलाता है। वह अर्द्धचालक जिसमें p-n सन्धि होती है, अर्द्धचालक डायोड कहलाता है।

 

प्रश्न 17. वोल्टेज नियन्त्रक क्या होता है?

उत्तर : वोल्टेज नियन्त्रक-वह युक्ति- जो शक्ति सम्भरण से निर्गत वोल्टेज को नियत बनाए रखती है, चाहे निवेशी प्रत्यावर्ती-धारा वोल्टेज में कोई परिवर्तन हो अथवा लोड में, ‘वोल्टेज नियन्त्रक’ अथवा. ‘वोल्टेज स्थायीकारी’ अथवा ‘वोल्टेज नियन्त्रक’ कहते है।

 

प्रश्न 18.p-n सन्धि के उत्क्रम अभिनत होने पर अवक्षय क्षेत्र की चौड़ाई क्यों बढ़ जाती है

उत्तर : बैटरी का ऋण टर्मिनल कोटरों को आकर्षित करता है तथा धन टर्मिनल मुक्त इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करता है। इस प्रकार, कोटर तथा मुक्त इलेक्ट्रॉन सन्धि से दूर हटने लगते हैं, फलतः अवक्षय परत, चौड़ा हो जाता है। उत्क्रम वोल्टेज बढ़ाने पर परत की चौड़ाई बढ़ती जाती है।

 

प्रश्न 19. जेनर डायोड (अथवा भंजक डायोड) क्या है? . 

उत्तर : जेनर डायोड एक ऐसा उत्क्रम अभिनत p-n सन्धि डायोड है जो कि इस प्रकार अपमिश्रित किया गया है जिससे कि इसकी एक विशिष्ट तीक्ष्ण भंजक वोल्टता है तथा इसमें पर्याप्त सामर्थ्य-क्षय शक्ति है। व्यापारिक दृष्टि से. जेनर भंजन तथा ऐवेलांश भंजन दोनों ही  प्रकार के सन्धि डायोडों को ‘जेनर डायोड’ कहते हैं। जेनर डायोड का उपयोग वोल्टेज नियन्त्रक के रूप में किया जाता है।

 

 

प्रश्न 20. जेनर भंजन एवं ऐवेलांश भंजन में अन्तर समझाइए। 

उत्तर : जेनर भंजन-सन्धि भंजन की एक क्रियाविधि में, उच्च उत्क्रम वोल्टेज पर सन्धि में उत्पन्न वैद्युत क्षेत्र इतना प्रबल हो जाता है कि यह इलेक्ट्रॉनों को सहसंयोजक बन्धों से सीधे बाहर खींच लेता है। इस प्रकार उत्पन्न इलेक्ट्रॉन-कोटर युग्मों से उत्क्रम-धारा एकदम बढ़ जाती है। इसे जेनर-भंजन कहते हैं। यह अपेक्षाकृत निम्न उत्क्रम वोल्टताओं पर (लगभग 10 वोल्ट) अधिक-अपमिश्रित सन्धियों में होता है। इन सन्धियों में अवक्षय क्षेत्र सँकरा (narrow) होता है, जिससे उनमें वैद्युत क्षेत्र बहुत प्रबल हो जाता है।

सन्धि का ताप बढ़ने पर जेनर भंजन वोल्टेज घटता है। इसका कारण यह है कि ताप बढ़ने पर शुद्ध संयोजक इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जाएँ बढ़ जाती हैं जिससे कि इन इलेक्ट्रॉनों का सहसंयोजक बन्धों से बाहर खिंच आना सुगम हो जाता है। अतः अपेक्षाकृत निम्न उत्क्रम .. वोल्टेज सन्धि में इतना वैद्युत क्षेत्र उत्पन्न करने में सक्षम होता है जो इलेक्ट्रॉनों को सहसंयोजक . बन्धों से बाहर खींच लेता है।

 

ऐवेलांश भंजन दूसरी क्रियाविधि में, जो कि अधिक सामान्य है, डायोड भंजन, जेनर भंजन वोल्टेज की अपेक्षा ऊँचे वोल्टेज (10-1000 वोल्ट) पर होता है। इसमें डायोड पर आरोपित उत्क्रम वोल्टेज से ऊष्मीय जनित इलेक्ट्रॉन व कोटर इतनी गतिज ऊर्जा अर्जित कर लेते हैं कि वे सहसंयोजक बन्धों को तोड़ देते हैं तथा नये इलेक्ट्रॉन व कोटर मुक्त हो जाते हैं। ये इलेक्ट्रॉन व कोटर पुन: बन्धों को तोड़कर अन्य इलेक्ट्रॉन कोटर युग्म उत्पन्न कर देते हैं। यह . प्रक्रिया संचयी होती है तथा बहुत बड़ी संख्या में आवेश वाहक मुक्त हो जाते हैं जिससे कि उत्क्रम धारा एकाएक बहुत बढ़ जाती है। इसे ऐवेलांश भंजनकहते हैं। यह प्राय: अल्प-अपमिश्रित सन्धियों में होता है।

 

सन्धि का ताप बढ़ने पर ऐवेलांश भंजक वोल्टेज बढ़ता है। इसका कारण यह है कि ताप बढ़ने पर क्रिस्टल के परमाणुओं का कम्पन आयाम बढ़ जाता है। इससे इलेक्ट्रॉनों व कोटरों की क्रिस्टल के परमाणुओं से संघट्टों की प्रायिकता बढ़ जाती है। अतः इलेक्ट्रॉन व कोटर दो संघट्टों के बीच इतनी ऊर्जा अर्जित नहीं कर पाते कि वह भंजन प्रक्रिया प्रारम्भ कर सकें। तब भंजन अपेक्षाकृत ऊँचे उत्क्रम वोल्टेज पर हो पाता है।

 

प्रश्न 21. उर्मिका गुणांक क्या होता है?

उत्तर : उर्मिका गुणांक-दिष्टकारी की निर्गत धारा (अथवा वोल्टेज) एकदिशीय तो होती है परन्तु स्थायी नहीं होती। यह स्पन्दमान होती है। निर्गत धारा के फोरियर विश्लेषण (Fourier analysis) से पता चलता है कि इसमें i0 / pie परिमाण का दिष्ट-धारा अवयव तथा w, 2w,4w,… आवृत्तियों के प्रत्यावर्ती-धारा अवयव विद्यमान हैं, जबकि i0 निर्गत धारा का शिखरमान है तथा o निवेशी आवृत्ति/प्रत्यावर्ती अवयवों को उर्मिकायें (ripples) कहते हैं। इन उर्मिकाओं के संगत निर्गत वोल्टेज-अवयव को उर्मिका वोल्टेजकहते हैं।

निर्गत धारा अथवा वोल्टेज के स्थायीपन से विचलन को उर्मिका गुणांक ‘r’ कहते हैं।

 

प्रश्न 22. उत्क्रम अभिनत सन्धि डायोड में बहने वाली अल्प उत्क्रम धारा संतृप्त धाराकहलाती है। क्यों

उत्तर : उत्क्रम धारा ऊष्मीयजनित अल्पसंख्यक वाहकों से बनती है। शब्द ‘संतृप्त’ यह बताता है कि हम ऊष्मीय ऊर्जा के कारण उत्पन्न अल्पसंख्यक वाहकों की संख्या नहीं बढ़ा सकत। दूसर शब्दों में, उत्क्रम वोल्टेज बढ़ाने से अल्पसंख्यक वाहकों की संख्या अर्थात उत्क्रम धारा नहीं बढ़ेगी। उत्क्रम धारा केवल ताप पर निर्भर है।

 

प्रश्न 23. दृश्य प्रकाश के लिए प्रकाश उत्सर्जक डायोड किस पदार्थ के बनाए जाते हैं

उत्तर : दृश्य प्रकाश के लिए प्रकाश उत्सर्जक डायोड GaP के बनाए जाते हैं।

 

प्रश्न 24. Si डायोड में, उतने ही आकार के Ge डायोड की अपेक्षा, उत्क्रम धारा बहुत अल्प होती है। क्यों? ‘ 

उत्तर : Si में विभव प्राचीर 0.7 V है जबकि Ge में 0.3 V है। इसका तात्पर्य है कि Si के सहसंयोजक बन्ध Ge की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। अत: Si डायोड में, उसी आकार के Ge डायोड की तुलना में, ऊष्मीयजनित अल्पसंख्यक वाहक कम होते हैं फलस्वरूप Si डायोड में उत्क्रम धारा, Ge डायोड की अपेक्षा बहुत अल्प होती है। यही कारण है कि Ge डायोड की अपेक्षा Si डायोड अधिक अच्छा स्विच होता है।

 

प्रश्न 25. सन्धि डायोड में पृष्ठ-क्षरण धारा क्या होती है

उत्तर : उत्क्रम अभिनत डायोड में ऊष्मीयजनित अल्पसंख्यक वाहकों से निर्मित उत्क्रम धारा के अतिरिक्त, क्रिस्टल के पृष्ठ पर भी एक अल्प धारा बहती है। इसे पृष्ठ-क्षरण धारा कहते हैं। यह क्रिस्टल में पृष्ठीय अपद्रव्यों तथा अपूर्णताओं के कारण उत्पन्न होती है।

 

प्रश्न 26. क्या सन्धि डायोड में विभव प्राचीर सन्धि के ताप पर निर्भर करता है

उत्तर : हाँ, निर्भर करता है। उच्च ताप अधिक संख्या में मुक्त इलेक्ट्रॉन तथा कोटर उत्पन्न करता है। ये अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन तथा कोटर अवक्षय परत की चौड़ाई को कम कर देते हैं जो कि विभव प्राचीर कम हो जाने के तुल्य है। व्यवहार में, प्रत्येक 1°C ताप-वृद्धि के लिए विभव प्राचीर में 2 mV की कमी हो जाती है।

 

प्रश्न 27. एक उभयनिष्ठ आधार (CB) ट्रांजिस्टर परिपथ में उत्सर्जक धारा का मान 2 मिलीऐम्पियर परिवर्तन होता है, जबकि धारा लाभ 8 उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास म मान 50 है, संगत संग्राहक धारा में परिवर्तन ज्ञात कीजिए। 

हल : दिए गए धारा लाभ B (CE विन्यास में) से धारा लाभ a (CB विन्यास में) ज्ञात करने के लिए,

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प्रश्न 28.अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी के लिए ऊर्मिका घटक के लिए व्यंजक ज्ञात कीजिए। 

उत्तर : अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी का ऊर्मिका गुणांक— ऊर्मिका गुणांक की परिभाषा निम्न प्रकार है—

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ऊर्मिका गुणांक का मान 1 से अधिक है। इसका अर्थ है कि निर्गत धारा में प्रत्यावर्ती अवयव दिष्ट अवयव से अधिक है। 

 

प्रश्न 29. L- सेक्शन फिल्टर का परिपथ चित्र बनाइए।

उत्तर : L- सेक्शन फिल्टर को चोक-निवेशी फिल्टर भी कहते हैं।

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प्रश्न 30. नियन्त्रित तथा अनियन्त्रित शक्ति सम्भरण क्या है

उत्तर : नियन्त्रित शक्ति सम्भरण-वह दिष्ट धारा शक्ति सम्भरण जो निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज अथवा लोड में परिवर्तन होने पर भी, लोड के सिरों के बीच निर्गत वोल्टेज को नियत बनाए रखता है, नियन्त्रित दिष्ट धारा शक्ति सम्भरण कहलाता है।

 

अनियन्त्रित शक्ति सम्भरण—   यह एक पूर्ण तरंग दिष्टकारी (full wave rectifier) है जिसके साथ एक प्रेरक-धारिता फिल्टर (L-C filter) जुड़ा है। दिष्टकारी से निर्गत वोल्टेज (rectified output) स्प0 न्दमान (pulsating) होता है क्योंकि इसमें प्रत्यावर्ती धारा अवयव (a.c. components) उपस्थित रहते हैं। फिल्टर इन अवयवों को दूर कर देता है तथा लोड RL को दिष्ट धारा वोल्टेज प्राप्त हो जाता है।

 

प्रश्न 31. फिल्टर परिपथ का क्या कार्य है? L-सेक्शन तथा स-सेक्शन फिल्टरों में से आप किसे चुनेंगे

उत्तर : फिल्टर परिपथ किसी दिष्टकारी के निर्गत से a.c. अवयवों (ऊर्मिकाओं) को हटाता है तथा इस प्रकार नियत d.c. सप्लाई सुनिश्चित करता है। L-सेक्शन फिल्टर pie-सेक्शन फिल्टर की अपेक्षा ज्यादा उपयोगी है क्योंकि इसमें Pie-सेक्शन फिल्टर की अपेक्षाकृत अधिक उत्तम वोल्टेज नियन्त्रण प्राप्त होता है।

 

प्रश्न 32. Pie-खण्ड फिल्टर की कार्यविधि संक्षेप में समझाइए। 

उत्तर : Pie-खण्ड फिल्टर की कार्यविधि-सर्वप्रथम दिष्टकारी से निर्गत वोल्टेज (rectifier output) संधारित्र C1 को अपने शिखरमान तक आवेशित करता है। उत्तरोत्तर वोल्टेज-स्पन्दों के बीच, C1 के सिरों के बीच  वोल्टेज, प्रेरकत्व L तथा लोड के माध्यम से upur थोड़ा-सा निरावेशन होने के कारण, कुछ गिर जाता है, परन्तु फिर भी यह शिखरमान के

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आस-पास ही बना रहता है। धारा में बचे a.c. अवयवों में कुछ प्रेरकत्व L द्वारा रोक लिए जाते हैं तथा कुछ संधारित्र C2 के उपमार्ग से वापस लौट जाते हैं। इस प्रकार के कई फिल्टर श्रेणी में जोडकर धारा को और अधिक समकारी (smoothing) किया जा सकता है।

संधारित्र निवेशी फिल्टर में लोड के सिरों के बीच उपलब्ध d.c. वोल्टेज, चोक निवेशी फिल्टर की तुलना में अधिक होता है, परन्तु वोल्टेज नियन्त्रण की दृष्टि से चोक निवेशी फिल्टर श्रेष्ठ होता है। संधारित्र निवेशी फिल्टर से प्राप्त d.c. वोल्टेज लोड धारा में वृद्धि होने पर घट जाता है।

संधारित्र निवेशी फिल्टर का प्रयोग कम धारा वाली पावर सप्लाई में किया जाता है।

 

 

प्रश्न 33. प्रवर्धक में बैण्ड-चौड़ाई से आप क्या समझते हो

उत्तर : बैण्ड-चौड़ाई— वह आवृत्ति-परिसर जिसमें किसी प्रवर्धक का वोल्टेज-लाभ, अधिकतम वोल्टेज-लाभ के 70.7% के बराबर अथवा इससे अधिक होता है, ‘बैण्ड-चौड़ाई’ कहलाता है।

 

प्रश्न 34. दिष्ट भार रेखा को आरेखित तथा परिभाषित कीजिए। 

उत्तर : दिष्ट भार रेखा (d.c. load line)-यह ट्रांजिस्टर की निर्गत अभिलाक्षणिक वक्रों पर खींची गई वह रेखा है जो a.c. सिगनल की अनुपस्थिति में, अर्थात् शून्य सिगनल की स्थिति में, ic व VcE के मान निरूपित करती है।

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प्रश्न 35. सन्धि डायोड धारा समीकरण लिखिए तथा इस पर ताप के प्रभाव की व्याख्या कीजिए। 

उत्तर : सन्धि डायोड धारा समीकरण …

 

i = i0(eV/nvT – 1)

 

जहाँ । धारा, V वोल्टेज, i0 संतृप्त धारा, (for Ge) = 1, VT = वोल्ट तुल्य है।

ताप का प्रभाव-ताप बढ़ने पर धारा का मान बढ़ता है।

 

प्रश्न 36. ट्रांजिस्टर से क्या तात्पर्य है

उत्तर : ट्रांजिस्टर एक ऐसी अर्द्धचालक युक्ति है जिसमें एक ही अर्द्धचालक क्रिस्टल के सिरों पर दो एक ही प्रकार के अर्द्धचालक क्षेत्र (दोनों p-p अथवा दोनों n-n) होते हैं जबकि इनके बीच विपरीत प्रकार के अर्द्धचालक (n अथवा p) की पतली परत होती है। इसी आधार पर ट्रांजिस्टर दो प्रकार के (p-n-p तथा n-p-n) होते हैं।

 

प्रश्न 37. एक उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास ट्रांजिस्टर में धारा प्रवर्धन गुणांक व धारा लाभ a में सम्बन्ध बताइए। 

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प्रश्न 38. ट्रांजिस्टर प्रवर्धक में उचित शून्य सिगनल संग्राहक धारा की आवश्यकता । क्यों होती है

उत्तर : यह सुनिश्चित करने के लिए कि a.c. सिगनल के सम्पूर्ण चक्र के दौरान आधार उत्सर्जक सन्धि अग्र अभिनत बनी रहे।

 

प्रश्न 39. p-n-p ट्रांजिस्टर की कार्यविधि का वर्णन कीजिए। 

उत्तर : p-n-p ट्रांजिस्टर की कार्यविधिनिम्नांकित चित्र-9 में p-n-p ट्रांजिस्टर का उभयनिष्ठ आधार परिपथ दिखाया गया है। इसके दोनों p-क्षेत्रों में आवेश वाहक (धन) कोटर होते हैं, जबकि n-क्षेत्र में आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसमें बायीं ओर की उत्सर्जक-आधार (p-n) सन्धि को बैटरी से थोड़ा-सा अग्र अभिनत विभव VEB देते हैं, जबकि दायीं ओर की आधार- संग्राहक (n-p) सन्धि को बैटरी से बड़ा उत्क्रम अभिनत विभव VCB देते हैं।

 

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उत्सर्जक-आधार (p-n) सन्धि के उत्सर्जक आधार संग्राहक अग्र अभिनत होने के कारण, p-क्षेत्र में उपस्थित कोटर आधार की ओर गति करते हैं, जबकि n-क्षेत्र में उपस्थित इलेक्ट्रॉन p-क्षेत्र (उत्सर्जक) की ओर गति करते हैं। चूंकि आधार बहुत पतला है इस कारण इसमें प्रवेश करने वाले अधिकतर कोटर | अग्र अभिनत By उत्क्रम अभिनत (लगभग 98%) इसे पार करके संग्राहक C तक पहुँच जाते हैं, जबकि उनमें से बहुत कम (लगभग 2%) आधार में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों से संयोग करते हैं। जैसे ही कोई कोटर इलेक्ट्रॉन से संयोग करता है वैसे ही उत्सर्जक में बैटरी के धन ध्रुव के निकट एक सहसंयोजक बन्ध टूट जाता है। बन्ध टूटने से उत्पन्न इलेक्ट्रॉन बैटरी के धन ध्रुव से बैटरी में प्रवेश कर जाता है। ठीक इसी क्षण एक नया इलेक्ट्रॉन बैटरी VER के ऋण सिरे से निकलकर आधार B में प्रवेश करता है। ठीक इसी क्षण एक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक E में से निकलकर बैटरी VER के धन सिरे पर पहुँचता है। इस कारण उत्सर्जक E में एक कोटर उत्पन्न हो जाता है, जो आधार की ओर चलना प्रारम्भ कर देता है। इस प्रकार आधार उत्सर्जक परिपथ में एक क्षीण आधार धारा (IB) बहने लगती है।

 

जो कोटर संग्राहक में प्रवेश कर जाते हैं, वे उत्क्रम अभिनत के कारण टर्मिनल C पर पहुँच जाते हैं। जैसे ही कोई कोटर टर्मिनल C पर पहुँचता है, बैटरी Vcb के ऋण सिरे से एक इलेक्ट्रॉन आकर उसे उदासीन कर देता है, पुनः ठीक इसी क्षण एक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक E से निकलकर बैटरी VEB के धन सिरे पर पहुँच जाता है। इस कारण उत्सर्जक में एक कोटर उत्पन्न हो जाता है

 

जो आधार की ओर चलना प्रारम्भ कर देता है। इस प्रकार संग्राहक उत्सर्जक परिपथ में संग्राहक धारा I बहने लगती है। आधार टर्मिनल B से चलने वाली धारा को आधार धारा IC तथा संग्राहक टर्मिनल C से बाहर जाने वाली धारा को संग्राहक धारा IC कहते हैं। धाराएँ IB तथा IC मिलकर उत्सर्जक E में प्रवेश करती हैं, अत: इसे उत्सर्जक धारा IE कहते हैं।

अत:                IE = IB + IC

इस प्रकार p-n-p ट्रांजिस्टर के अन्दर धारा प्रवाह कोटरों के उत्सर्जक से संग्राहक की ओर चलने के कारण होता है, जबकि बाहरी परिपथ में इलेक्ट्रॉनों के चलने के कारण होता है।

आधार के बहुत पतला होने के कारण आधार में संयोजित होने वाले कोटर-इलेक्ट्रॉनों की संख्या बहुत कम होती है। इस कारण लगभग सभी कोटर, जो उत्सर्जक से आधार में प्रवेश करते हैं, संग्राहक तक पहुँच जाते हैं इसलिए संग्राहक धारा IC उत्सर्जक धारा IE से कुछ ही कम होती है।

 

प्रश्न 40. सन्धि ट्रांजिस्टर क्या होते हैं? n-p-n ट्रांजिस्टर, p-n-p ट्रांजिस्टर की तुलना में क्यों अधिक प्रयोग में लाए जाते हैं

उत्तर : सन्धि ट्रांजिस्टरसन्धि ट्रांजिस्टर एक त्रि-अवयव अर्द्धचालक युक्ति है जिसमें अपमिश्रित अर्द्धचालक (n-टाइप अथवा p-टाइप) की एक महीन तराश को दो समान परन्तु विपरीत अपमिश्रित अर्द्धचालक (p अथवा n) गुटकों के बीच दबाकर दो p-n सन्धियाँ बनायी जाती हैं। यह एक द्विध्रुवीय (bipolar) युक्ति है क्योंकि इसमें बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक दोनों प्रकार के वाहक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सन्धि ट्रांजिस्टर दो प्रकार के होते हैं-p-n-p ट्रांजिस्टर तथा n-p-n ट्रांजिस्टर। n-p-n ट्रांजिस्टर अधिक उपयोग में लाए जाते हैं क्योंकि इसमें धारा वाहक मुख्यत: इलेक्ट्रॉन होते हैं जो कि कोटरों की अपेक्षा तेज गतिशील होते हैं। (p-n-p में कोटर मुख्य धारा वाहक होते हैं।)

 

प्रश्न 41. ट्रांजिस्टर में अग्र अभिनति, उत्क्रम अभिनति से सदैव कम रखी जाती है। क्यों

उत्तर : ट्रांजिस्टर में उत्सर्जक अग्र अभिनत होता है तथा संग्राहक उत्क्रम अभिनत होता है। यदि अग्र अभिनति (अग्र वोल्टता) अधिक होगी तो बहुसंख्यक वाहक उत्सर्जक से आधार में होते हुए संग्राहक में उच्च वेग से पहुँचेंगे। इससे अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होगी जो ट्रांजिस्टर को क्षतिग्रस्त कर देगी।

 

प्रश्न 42. किसी ट्रांजिस्टर के नियंत्रक का मान 0.90 है। उभयनिष्ठ उत्सर्जक व्यवस्था में आधार धारा के 0.3 मिलीऐम्पियर के परिवर्तन के साथ संग्राहक धारा में कितना परिवर्तन होगा

हल : उभयनिष्ठ उत्सर्जक व्यवस्था में धारा प्रवर्धन B होता है जो उभय आधार व्यवस्था में धारा प्रवर्धन a से निम्न प्रकार सम्बन्धित है—

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प्रश्न 43. एक प्रवर्धक का वोल्टता लाभ बिना फीडबैक के 20 है। यदि निर्गत वोल्टता का 10% ऋणात्मक फीडबैक परिपथ द्वारा पुनः निविष्ट कर दिया जाए तो लाभ कितना हो जाएगा? 

हल : यदि बिना फीडबैक के वोल्टता लाभ Av हो, तो ऋणात्मक फीडबैक के साथ वोल्टता लाभ 

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प्रश्न 44. स्थायित्व गुणक की परिभाषा दीजिए। 

उत्तर : स्थायित्व गुणक-कार्यकारी-बिन्दु को स्थायी बनाए रखने के लिए, क्षरण-धारा icBO में परिवर्तन होने पर भी संग्राहक-धारा ic को नियत रखना आवश्यक है। जिस सीमा तक ic को नियत रखा जा सकता है, उसकी माप एक स्थायित्व गुणक S से की जाती है।

 

प्रश्न 45. बहुचरण प्रवर्धक क्या होते हैं

उत्तर : एक अकेले ट्रांजिस्टर प्रवर्धक का वोल्टेज प्रवर्धन सीमित होता है तथा अनेक व्यावहारिक अनुप्रयोगों के लिए अपर्याप्त रहता है। जब अधिक वोल्टेज प्रवर्धन की आवश्यकता होती है तब दो अथवा अधिक प्रवर्धक सोपानी क्रम में (in cascade) में लगाए जाते हैं, अर्थात् पहले चरण से निर्गत वोल्टेज दूसरे चरण में निवेशी वोल्टेज के रूप में प्रयुक्त होता है तथा यही प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है, तब सम्पूर्ण वोल्टेज प्रवर्धन विभिन्न चरणों के वोल्टेज प्रवर्धनों की गुणा के बराबर होता है। सोपानी प्रवर्धकों का यह प्रबन्ध बहुचरण प्रवर्धक (multistage amplifier) कहलाता है।

 

प्रश्न 46. एक धनात्मक फीडबैक प्रवर्धक एक दोलित्र बन जाता है, बताइए।

उत्तर : धनात्मक फीडबैकं से प्रवर्धक का लाभ बढ़ता है, परन्तु इससे विकृति भी उसी गुणक से बढ़ती है। यदि BAN = 1 हो तो लाभ अनन्त हो जाता है जिसका अर्थ है कि प्रवर्धक बिना किसी निवेशी वोल्टेज के ही निर्गत वोल्टेज दे देता है, अत: इस प्रकार धनात्मक फीडबैक प्रवर्धक एक दोलित्र (oscillator) बन जाता है।

 

प्रश्न 47. इलेक्ट्रॉनिक दोलित्र क्या होता है? इसकी तुलना प्रवर्धक से कीजिए। 

उत्तर : इलेक्ट्रॉनिक दोलित्र एक ऐसी वैद्युत युक्ति है जिसके द्वारा d.c: वैद्युत शक्ति को इच्छित आवृत्ति की a.c: वोल्टता (अथवा धारा) में परिवर्तित करते हैं। यह आवृत्ति कुछ हर्ट्स (Hz) से लेकर गीगा हर्ट्स (GHz) तक हो सकती है। सैद्धान्तिक रूप से, दोलित्र एक धनात्मक फीडबैक प्रवर्धक है जिसका वोल्टता लाभ अनन्त है।

 

प्रश्न 48. दीर्घकालीन दोलनों के लिए बार्कहाउजेन की कसौटी की विवेचना कीजिए। 

उत्तर : दीर्घकालीन दोलनों के लिए बार्कहाउजेन की कसौटी— बार्कहाउजेन की दीर्घकालीन दोलनों के लिए कसौटी को निम्न प्रकार समझा जा सकता है

  1. दोलनी टंकी परिपथ इसमें एक प्रेरकत्व कुण्डली L तथा उसके समान्तर में एक संधारित्र C होता है। परिपथ के वैद्युत दोलनों की आवृत्ति, L व C के मानों से निर्धारित होती है। अतः टंकी परिपथ को आवृत्ति-निर्धारक परिपथ (Frequency-Determining Network or FDN) भी कहते हैं।
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  1. ट्रांजिस्टर प्रवर्धक-यह एक बैटरी से d.c. शक्ति प्राप्त करके इसे a.c. शक्ति में परिवर्तित करता है तथा टंकी परिपथ में होने वाली हानियों की पूर्ति के लिए, टंकी परिपथ में भेज देश है। टंकी परिपथ में जनित L-Cदोलन ट्रांजिस्टर प्रवर्धक में निवेशित कर दिए जाते हैं जो इन्हें प्रवर्धित कर देता है।

 

3.धनात्मक फीडबैक परिपथ- यह ट्रांजिस्टर प्रवर्धक से निर्गत सिगनल ऊर्जा के एक अंश का L-C टंकी परिपथ में, सही कला में, पुनः निविष्ट करता है और इस प्रकार L.C दोलनों को बनाए रखता है। पुन: निविष्ट ऊर्जा, L-C परिपथ में होने वाली हानि i-R की पूर्ति करने के लिए पर्याप्त होती है।

धनात्मक फीडबैक के साथ, प्रवर्धक का वोल्टेज लाभ

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यह सम्बन्ध स्थायी दोलनों के लिए बार्कहाउजेन की कसौटी के नाम से जाना जाता है। इसमें यह प्रतिबन्ध शामिल है कि ट्रांजिस्टर प्रवर्धक तथा फीडबैक परिपथ द्वारा उत्पन्न नेट कला-परिवर्तन शून्य होना चाहिए, अर्थात् फीडबैक धनात्मक होना चाहिए। व्यावहारिक दोलित्रों के लिए, BAV >1 होता है।

 

प्रश्न 49. R-Cयुग्मित प्रवर्धक का वोल्टेज लाभ निम्न तथा उच्च आवृत्तियों पर क्यों गिरता है

उत्तर : R-C युग्मित प्रवर्धक में निम्न आवृत्तियों पर प्राथमिक कुण्डली का प्रेरण-प्रतिघात और इस कारण लोड-प्रतिबाधा घट जाती है। अतः प्रवर्धन गिर जाता है। आवृत्ति जितनी कम होती जाती है, प्रवर्धन भी उतना ही गिरता जाता है।

उच्च आवृत्तियों पर, ट्रांसफॉर्मर के कुण्डलनों की वितरित धारिताओं तथा अवांछित धारिताओं के प्रतिघात इतने लघु हो जाते हैं कि लोड-प्रतिबाधा पार्श्व-पथित (shunted) हो जाती है। इससे लोड-प्रतिबाधा का प्रभावी मान घट जाता है; फलतः प्रवर्धन गिर जाता है।

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प्रश्न 51. रेडियो अभिग्राहित्र का क्या कार्य है? ये कितने प्रकार के होते हैं? संक्षेप में बताइए।

उत्तर : रेडियो अभिग्राहित्रएक रेडियो अभिग्राहित्र एक ऐसा यन्त्र है जो किसी अभीष्ट रेडियो आवृत्ति सिगनल (अर्थात् मॉडुलित तरंग) को ग्रहण कर इसमें स्थिर मूल सूचना को पुनः प्राप्त करता है। रेडियो अभिग्राहित्रों को निम्नलिखित प्रकार वर्गीकृत किया जाता है |

 

1.आयाम मॉडुलन प्रसारण अभिग्राहित्र- ये दीर्घ, मध्यम तथा अल्प तरंग बैण्डों पर आयाम मॉडुलन प्रसारण संचारियों से विकिरित भाषण अथवा संगीत आदि प्रसारण प्रोग्रामों के सुनने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।

 

  1. आवृत्ति मॉडुलन प्रसारण अभिग्राहित्र- ये अत्यन्त उच्च आवृत्ति परास में F.M. प्रसारण संचारियों से प्रसारित प्रोग्रामों को प्राप्त करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।

 

  1. टेलीविजन अभिग्राहित्र- ये अत्यन्त उच्च आवृत्ति परास के टेलीविजन प्रसारण प्रोग्रामों को प्राप्त करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।

 

  1. रेडार अभिग्राहित्र- ये रेडार (रेडियो संसूचन तथा ऋजुरेखन) सिगनलों को प्राप्त करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।

 

प्रश्न 52. आयाम मॉडुलेशन की परिभाषा दीजिए।

उत्तर : आयाम मॉडुलेशन-आयाम मॉडुलन में वाहक तरंग की आवृत्ति तथा कला को स्थिर रखते हुए वाहक तरंग का आयाम मॉडुलक सिगनल के अनुसार परिवर्तित होता है। अतः समस्त सूचना आयाम पद में रहती है।

 

प्रश्न 53. विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के मॉडुलन से आप क्या समझते हैं? .. 

उत्तर : रेडियो प्रसारण स्टेशन के प्रेषक ऐन्टिना से रेडियो सिगनल उत्सर्जित होते हैं जो भाषण, संगीत तथा अन्य सूचनाओं को दूरस्थ स्थानों तक ले जाते हैं। इन सिगनलों में, किसी दोलित्र द्वारा उत्पादित रेडियो आवृत्ति की विद्युत-चुम्बकीय तरंगों पर समाचारों की श्रव्य आवृत्ति की तरंगें (जिसका प्रेषण करना होता है) अध्यारोपित होता है। श्रव्य तरंगों की रेडियो तरंगों पर अध्यारोपित करने की प्रक्रिया को मॉडुलन कहते हैं। रेडियो आवृत्ति तरंगें जो समाचार ले जाती हैं, वाहक तरंगें कहलाती हैं।

 

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प्रश्न 56. CRO के मुख्य उपयोगों को लिखिए। 

उत्तर : कैथोड किरण दोलनदर्शी (CRO) का मुख्य उपयोग तेजी से परिवर्तित होने वाली वैद्युत अवस्थाओं, जैसे a.c. परिपथों में होने वाले परिवर्तनों के अध्ययन में किया जाता है। प्रायः यह निम्नलिखित कार्यों के लिए प्रयोग में लाया जाता है—

 

  1. a.c. सिगनलों की आवृत्तियों तथा कलाओं की तुलना में।
  2. इलेक्ट्रॉनिक वाल्वों तथा ट्रांजिस्टर के अभिलक्षणिक वक्रों का पर्दे पर चित्रण करने में।
  3. a.c. विभवों तथा धाराओं को गने में।
  4. संगीत यंत्रों की ध्वनि के तरंग-रूपा के अध्ययन में।
  5. टेलीविजन तथा रेडार में।
  6. दाब-वैद्युत प्रभाव का उपयोग करके यांत्रिक प्रतिबलों के अध्ययन में।
  7. लौह चुम्बकीय पदार्थों के शैथिल्य लूपों के चित्रण में।
  8. समयान्तरालों को मापने में।

 

प्रश्न 57. लिस्साजु चित्र क्या होते हैं? आप लिस्साजु चित्रों को C.R.0. के पर्दे पर किस प्रकार प्राप्त करते हो

उत्तर : जब किसी कण पर दो परस्पर लम्बवत् सरल आवर्त गतियाँ एकसाथ अध्यारोपित होती हैं. तो कण का परिणामी पथ लिस्साज चित्र कहलाता है। जब कथाड किरण कम्पनदशा का दोनों प्लेट-युग्मों (X तथा Y) पर एकसाथ दो प्रत्यावर्ती विभव लगाते हैं तो अकाश बिन्दु दा परस्पर लम्बवत् सरल आवर्त बलों के अन्तर्गत गति करता है तथा पर्दे पर लिस्साजु चित्र बनने लगता है।

 


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