Bsc 2nd Year Botany VI Plant Physiology And Biochemisty Part D Notes

Bsc 2nd Year Botany VI Plant Physiology And Biochemisty Part D Notes :-

 

खण्ड ‘इ’ – 

प्रश्न 1 – कार्बोहाइड्रेट्स क्या होते हैं?

उत्तर – कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates)

‘कार्बोहाइडेटस’ (carbohydrates) नामक शब्द लगभग सौ वर्षों पहले सुझाया गया था क्योंकि ऐसा माना गया था कि ये कार्बन के हाइड्रेट्स होते हैं। कार्बोहाइडेटस में ” हाइड्रोजन, ऑक्सीजन और कभी-कभी सल्फर तथा नाइट्रोजन के तत्त्व भी दो कार्बोहाइड्रेट्स का इम्पीरिकल सूत्र है- [C(H2O) ] 

कुछ प्रमुख कार्बोहाइड्रेट्स हैं – ग्लूकोस, फ्रक्टोस, स्टार्च, सेलुलोस आदि।

ये वे पदार्थ होते हैं जिनमें एक ऐल्डिहाइड या एक कीटोन समूह होता है। साथ-साथ इनमें दूसरे कार्बन अणुओं के साथ एक –OH समूह भी होता है। 

कार्बोहाइड्रेट्स का वर्गीकरण (Classification of Carbohydrates)

इन्हें निम्नलिखित तीन समूहों में बाँटा गया है।

  1. मोनोसैकेराइड्स, 2. ओलीगोसैकेराइड्स 3. पॉलिसैकेराइड्सा,
  2. मोनोसैकेराइड्स (Monosaccharides)-ये कार्बोहाइड्रेट्स की सब इकाइयाँ होती हैं जिनमें कि एक कार्बन श्रृंखला होती है। इनका सामान्य सूत्र (Ch2 जैसे-C6H1206। इन्हें कार्बन श्रृंखला की लम्बाई के आधार पर नाम दिया-

ये मुख्यतः निम्न प्रकार के होते हैं –

  1. मण्ड (Starch)-ये जल में अविलेय हैं। पौधों में संचित भोजन पर मिलता है। ये संग्रहकर्ता फल, बीज आदि में बहुतायत से मिलते हैं। परन्त पौधों में भी ये प्रायः मिल जाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-

(i) अस्थायी मण्ड (Temporary starch)-ये प्रकाश संश्लेषण की यह दिन में निर्मित होते हैं, परन्तु रात में ये फिर से शर्करा में बदल जाते हैं।

(ii) स्थायी मण्ड (Permanent starch)-आवश्यकता से अधिक शर्करा परिवर्तित हो जाती है। संचित पदार्थ के रूप में ये भूमिगत तने, जड़, बीज आदि में मिलते हैं।

मण्ड के कण विभिन्न आकार, आमाप तथा संख्या के होते हैं। इनकी आ र प्रकार की होती है। ये गोल, चपटे, अण्डाकार तथा बहुमुखीय होते हैं। जिस जगह “. में परतें बनती हैं उसे नाभिका . (hilum) कहते हैं। इन परतों को स्तर विन (stratification) कहते हैं। स्तर विन्यास के अनुसार मण्ड कण दो प्रकार के होते है

(a) उत्केन्द्री (Eccentric) – इनमें नाभिका (hilum) एक किनारे पर होती है तथा मण्ड की परतें बराबर निर्मित नहीं होती हैं; जैसे-आलू में। 

(b) संकेन्द्री (Concentric) – इनमें हाइलम अथवा नाभिका मण्ड कण के मध्य में होती है। स्तर विन्यास बराबर होता रहता है। जैसे गेहूँ में।

यदि मण्ड कण में एक नाभिका हो तो उसे सरल (simple) और यदि अधिक नाभिका (hilum) हों तो उसे संयुक्त (compound) मण्ड कण कहते हैं।

  1. इन्यूलिन (Inulin)-इन्यूलिन प्रायः कोशिका रस (cell sap) में पाया जाता है तथा यह फ्रक्टोस (fructose) का बहुलक (polymer) है। आवश्यकतानुसार यह शर्करा में बदलता रहता है। यह डहेलिया (Dahlia) के कन्दिल मूल (tuberous roots) में बहुतायत में मिलता है। इसकी जड़ों को काटकर ऐल्कोहॉल अथवा ग्लिसरीन में रखने से यह जड़ की कोशिकाओं में पंखों के आकार के क्रिस्टल बना लेता है. (चित्र-G)। इसके अतिरिक्त यह डेन्डेलियन (Dandelion) तथा टेरेक्सकम (Taraxacum) में भी पाया जाता है।
  1. सेलुलोस (Cellulose)-यह कोशिका भित्ति का एक महत्त्वपूर्ण घटक आर ग्लूकोस का बहुलक (polymer) है। पौधों में लगभग 50% सेलुलोस हाता हार संरचनात्मक तत्त्व है। मनुष्य में इसका पाचन नहीं होता. परन्त चरने वाले पशुआ (grat animals) में अपेन्डिक्स (appendix) विकसित होने के कारण इसमें सेलुलोस का होता है। कपास के रेशे शद्ध सेललोस से निर्मित होते हैं। सेललोस से कागज भी बनाया सेललोस के अतिरिक्त हेमीसेललोस की भित्ति निर्मित होने के कारण खजर का बाज कठोर होता है। इसमें D-ग्लूकोस के अणओं की लम्बी श्रृंखला होती है जा P” ग्लाइकोसाइडिक बन्ध’ से जुड़ते हैं। रासायनिक रूप से यह निष्क्रिय होता ह। १९ अघुलनशील, परन्तु श्विट्जर अभिकर्मक (Schwitzer’s reagent) अथ हाइड्रॉक्साइड के अमोनिकल घोल में घुलनशील होता है। जलीय अपघटन का आन यह सेलोबायोज (cellobiose) में परिवर्तित हो जाता है। 

4. ग्लाइकोजन (Glycogen)-यह 12-18 ग्लुकोस इकाइयों का श्रृंखला होती है। यह कवकों (fungi) में प्रायः संचित भोजन के रूप में मिलता है। यह मनुष्यों

उत्तर- विकर (Enzymes) – 

विकर जैविक उत्प्रेरक (biological catalyst) होते हैं तथा जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं (biochemical reactions) की गति को तीव्र करते हैं। ये स्वयं क्षय अथवा नष्ट हुए बिना अभिक्रियाओं की गति तथा विशिष्टता को नियन्त्रित करते हैं। ये केवल जीवित कोशिकाओं से उत्पन्न होते हैं। अतः अन्य उत्प्रेरकों से भिन्न होते हैं।

वर्गीकरण तथा नामकरण

(Classification and Nomenclature) 

विकर (एन = में, जाइम = यीस्ट) का शाब्दिक अर्थ है ‘यीस्ट में’। जैसे-जैसे विकरों के विषय में जानकारी बढ़ती गई, उनके वर्गीकरण तथा नामकरण की आवश्यकता होने लगी। । भिन्न-भिन्न आधारों का प्रयोग एवं विविध पद्धतियों का विकास हुआ।

एक पद्धति के अनुसार विकर का नाम अवस्तर (substrate) के नाम के आधार पर (जिस पर यह विकर कार्य करता हो) रखकर प्रत्यय ‘ऐज’ (ase) जोड़ दिया जाता है। उदाहरण के लिए कार्बोहाइड्रेट पर क्रिया करने वाले विकर कार्बोहाइड्रेटेज (carbohydratase), लिपिड पर क्रिया करने वाले विकर लाइपेज (lipase) व प्रोटीन पर क्रिया करने वाले विकर प्रोटीनेज (proteinase) आदि कहलाते हैं।

एक अन्य पद्धति के अनुसार अभिक्रिया के प्रकार (types of reaction) के आधार पर (जो विकर द्वारा उत्प्रेरित हो) विकर का नाम रखा जाता है। उत्प्रेरित अभिक्रिया के नाम के आगे प्रत्यय ऐज’ (ase) जोड़ा जाता है जैसे हाइड्रोलेज (hydrolase) जल अपघटन में, ट्रान्सएमीनेज (transaminase) ट्रांसएमीनेशन में, फॉस्फोराइलेज (phosphorylase) फॉस्फेटीकरण में आदि। देखने में दोनों ही पद्धतियाँ सरल प्रतीत होती हैं, परन्तु पहली पद्धति से अभिक्रिया के प्रकार का तथा दूसरी से अवस्तर (substrate) का पता नहीं चलता है।

सन् 1961 में अन्तर्राष्ट्रीय जैव रसायनज्ञ संघ (IUB) ने विकर वर्गीकरण व नामकरण की एक नवीन पद्धति का अनुसरण किया। इसके अनुसार विकर का नाम ‘स्वव्याख्या’ (self explanatory) सम्पन्न होता है। इस पद्धति के अनुसार विकरों का वर्गीकरण छह मुख्य वर्गों में किया जाता है-

  1. ऑक्सीडोरिडक्टेजेज (Oxidoreductases)

ऑक्सीकरण-अपचयन (oxidation-reduction) की अभिक्रियाएँ उत्प्रेरित करने वाले विकर इस वर्ग में आते हैं। ये इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण (electron transport) को उत्प्रेरित करते हैं।

उदाहरण. 

(i) एल-ग्लूटामेट : एन०ए०डी०पी० ऑक्सीडोरिडक्टेज (ग्लूटामिक डीहाइड्रोजिनेज, glutamic dehydrogenase) आदि। 

(ii) साइटोक्रोम-सी : 02 ऑक्सीडोरिडक्टेज (साइटोक्रोम ऑक्सीडेज,

cytochrome oxidase) आदि। 

(iii) ऐल्कोहॉल : एन०ए०डी० ऑक्सीडोरिडक्टेज (ऐल्कोहॉल डीहाइडोजिनेज,

alcohol dehydrogenase) आदि।

प्रश्न 19 – विकर नियमन का विस्तार से वर्णन कीजिए। 

उत्तर – विकर नियमन (Enzyme Regulation)

विकर बहुत अस्थायी होते हैं, उनका संश्लेषण व विघटन तीव्रता से कोशिका में निरन्तर होता रहता है। अधिकांश विकर की हाफ लाइफ (half life) अथवा अर्द्ध-आयु कुछ घण्टों की होती है। विकर की क्रियाशीलता का नियमन विकर अणुओं के संश्लेषण, विघटन अथवा रूपान्तरण (modulation) द्वारा किया जा सकता है।

  1. संश्लेषण स्तर पर नियमन (Regulation at the Level of Synthesis)-वे विकर जो किसी उद्दीपन की अनुक्रिया से बनते हैं, इन्ड्यूसिबिल विकर (Inducible enzymes) कहलाते हैं। कुछ विकर कोशिका में स्थायी रूप से मिलते हैं चाहे उनकी आवश्यकता भी न हो। ऐसे विकर कॉन्स्टीट्यूटिव विकर (Constitutive enzymes) कहलाते हैं। 

इन्ड्यूसर विकर जीन की क्रिया से बनते हैं। mRNA के अनुलेखन में इनका महत्त्व है। ब्रिटेन एवंम् डेविडसन (Britten and Devidson, 1969) के अनुसार जीन एक समूह में कार्य करते हैं। यह समूह 3-4 प्रकार के जीनों से बनता है; जैसे-प्रोड्यूसर जीन, इन्टीग्रेटर जीन, रिसेप्टर जीन, सेन्सर जीन आदि। इन सभी के कारण विकर निर्मित होता है। विकर के बनना आरम्भ करने के लिए सेन्सर जीन सन्देश देती है, यह सेन्सर जीन हॉर्मोन अथवा अन्य विकर का अणु हो सकता है। यदि यह रसायन हो तो सेन्सर जीन के साथ बन्ध बना लेगा। सेन्सर जीन के सक्रिय होते ही इन्टीग्रेटर जीन स्वतः सक्रिय हो जाती है और RNA का अनुलेखन आरम्भ होता है। mRNA के अनुवादन के फलस्वरूप ही विकर निर्माण होता है।

  1. विकर के विघटन स्तर पर नियमन (Regulation at Enzyme Degradation Level)-विकर के अणु अस्थायी होते हैं। अत: जल्दी विघटित हो जाते हैं। विकर के विघटन के लिए प्रोटिएज विकर आवश्यक है क्योंकि सामान्यतः एन्जाइम प्रोटीन होते हैं। कोशिका में रिक्तिका तथा लाइसोसोम में प्रोटिएज विकर मिलता है।

3. क्रिया के मॉडुलेशन द्वारा नियमन (Regulation by Modulation of Activity)-कुछ विकर अणुओं के अस्थायी मॉडुलेशन (modulation) द्वारा यह किया होती है। जब विकर की क्रिया उपापचय में आन्तरिक रूप से नियन्त्रित हो तो ऐसे विकर एलोस्टेरिक विकर (Allosteric enzyme) कहलाते हैं। कोई कम अणु भार (molecular weight) वाला उत्पाद विकर के सक्रिय स्थल को छोड़कर अन्य स्थान से जड जाता है. परन्तु उसके कारण सक्रिय स्थल अधिक क्रियाशील हो जाता है। साल ग्लकोस-6-फॉस्फेट में परिवर्तन हेक्सोकाइनेज (एलोस्टेरिक विकर) के कारण होता है।

(5) विटामिन्स की अधिकता होने पर इनका उत्सर्जन हो जाता 

(6) कुछ विटामिन्स कृत्रिम रूप से संश्लेषित किए गए हैं जो पर विटामिन्स के समान ही होते हैं। 

(7) सामान्यतः विटामिन्स ऐल्कोहॉल, कार्बनिक अम्ल, ऐल्डिहाइल तथा न्यूक्लिओटाइड के व्युत्पन्न से बनते हैं। 

वर्गीकरण (Classification)

विटामिन्स को दो भागों में विभाजित किया गया हैं-

(A) जल में घुलनशील विटामिन्स; जैसे-विटामिन B. CK 

(B) वसा में घुलनशील विटामिन्स; जैसे-विटामिन A, E

जल में घुलनशील विटामिन्स साधारण रूप से C, H, N व के ये उत्प्रेरक का भी कार्य करते हैं। जल में घुलनशील विटामिन्स अधिक मात्रा में नहीं रह पाते। अत: ये उत्सर्जित हो जाते हैं। शरीर को इनकी अल्प मात्रा ही काफी __

वसा में घुलनशील विटामिन्स यकृत में संचित होते हैं तथा ये उत्सर्जित इनकी अधिक मात्रा शरीर के लिए आविष होती है और इनकी अधिकता से विचार होने का भय रहता है।

प्रश्न 21 – विटामिन K व विटामिन C के सामान्य कार्य, न्यूनता व लशा लिखिए।

उत्तर – विटामिन ‘K’ (Vitamin ‘K’)

विटामिन ‘K’ एक जटिल असंतृप्त हाइड्रोकार्बन है। यह जल में घुलनशील होता है। यह दो रूपों-फाइटोक्वीनोन (K) तथा मेनोक्वीनोन (K,) में पाया जाता है। रुधिर में भी यह पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। यह यकृत में संचित होता है। संश्लेषित विटामिन K जल में घुलनशील नहीं होता है। पालक, बथुआ, अण्डा, पनीर, टमाटर आदि में विटामिन K बहुतायत . में पाया जाता है। 

सामान्य कार्य (General Functions)

(1) यह इलेक्ट्रॉन कैरियर को-एन्जाइम Q के रूप में कार्य करता है। 

(2) यह ऑक्सीकरणीय फॉस्फेटीकरण तथा प्रकाश संश्लेषण में महत्त्वपूर्ण काय करता 

(3) यह कार्बोक्सीलेज के को-फेक्टर के रूप में कार्य करता है। 

(4) यह वसा अवशोषण में सहायक होता है। 

(5) रुधिर स्कंदन के समय यह विटामिन यकत कोशिकाओं में तथा प्रोथ्रााम सरलषण में महत्त्वपूर्ण कार्य करता है।

न्यूनता लक्षण (Deficiency Symptoms)

(1) इसकी न्यूनता के कारण रक्त में थ्रोम्बिन कम होने से रक्त का थक्का नही जमता है।

(2) विटामिन K की कमी से अधिक समय तक रक्तस्त्राव होने लगता हैं।

विटामिन ‘C’ (Vitamin ‘C’)

विटामिन ‘C’ को ऐस्कॉर्बिक अम्ल भी कहते हैं। यह विटामिन सफेद रग में होता है। यह जल में घुलनशील विटामिन है। यह स्वाद में खट्टा होता है। गर्म करने से यह नष्ट हो जाता है तथा क्षार में यह ऑक्सीकृत हो जाता है। यह न तो संश्लेषित होता है और न ही मंचित किया जा सकता है। यह ताजे फल, सब्जी, नींबू, सन्तरा, टमाटर, अमरूद, आँवला, अंगुर आदि में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। 

सामान्य कार्य (General Functions)

(1) यह विकर को सक्रिय करता है। 

(2) यह ऐमीनो अम्ल का उपापचय करता है। 

(3) यह नॉरएपीनेफ्रिन का संश्लेषण करता है। 

(4) यह अन्तराकोशिक पदार्थ का निर्माण करता है। 

(5) यह घाव भरने में सहायक होता है। 

(6) यह रक्त के कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायक होता है। 

(7) यह ऑक्सीकरण अभिक्रियाओं में महत्त्वपूर्ण कार्य करता है।

(8) यह संयोजी ऊतक के तन्तुक तथा कोलेजन के निर्माण में सहायक होता है। 

न्यूनता लक्षण (Deficiency Symptoms)

(1) दाँत का हिलना। 

(2) घाव का न भरना। 

(3) अस्थिओं में सूजन। 

(4) संक्रमण की अधिकता। 

(5) मसूड़ों से रक्त बहना। 

(6) वृक्क, आंत आदि में अन्त:रक्त स्राव का होना। 

प्रश्न 22 – विटामिन A, D तथा E के सामान्य कार्य व न्यूनता लक्षण लिखिए।

उत्तर – विटामिन ‘A’ (Vitamin ‘A’) : विटामिन ‘A’ को रेटीनॉल अथवा एण्टीजीरोफ्थैल्मिक भी कहते हैं। यह वसा में घुलनशील एक अत्यधिक असंतृप्त प्राथमिक ऐल्कोहॉल है। यह अण्डे के पीले भाग, यकृत, मक्खन, कॉड लिवर ऑयल, पीले फल व सब्जियों जैसे-टमाटर, खूबानी, गाजर, पपीता, सेब आदि में तथा B-कैरोटीन के रूप में प्राप्त होता है।

इस विटामिन की बच्चों को 2000-3000IU, शिशुओं को 1,500IU, गर्भवती स्त्रियों को 6-8000IU तथा सामान्य मानव को 5,000IU के लगभग आवश्यकता होती है। 

सामान्य कार्य (General Functions)

(1) दाँतों व हड्डियों के निर्माण को तीव्र करना।। 

(2) कोशिका कला की पारगम्यता तथा समस्थैतिकता को बनाए रखना। 

(3) त्वचा, म्यूकोसा, एपीथीलियमी कोशिकाओं में समाकलन बनाए रखना। 

(4) रेटीनोइक अम्ल, ग्लाइको प्रोटीन संश्लेषण तथा विटामिन ‘A’ कॉन्ड्रॉइटिन सल्फेट

के संश्लेषण में आवश्यक होता है। 

न्यूनता लक्षण (Deficiency Symptoms)

(1) डर्मेटोसिस (Dermatosis) (2) जीरोफ्थैल्मिया (Xerophthalmia) (3) रतौंधी (Nightblindness)

(4) मन्द वृद्धि (Retarded Growth). 

(5) वृक्क संक्रमण (Renal Infection) 

(6) संक्रमण के प्रति प्रभाव्यता (Susceptibility to Infection)

(7) वृषण व अण्डाशय का अपघटन (Decomposition of Testes and Ovary)

विटामिन ‘D’ (Vitamin ‘D’)

यह स्टेरॉल का समूह है जो न तो ऑक्सीकृत होता है और न ही नाम कैल्सीफेरॉल तथा अगोंकैल्सीफेरॉल प्रोविटामिन D हैं। कैल्सीफेरॉल जैविक रूप होता है। विटामिन D का संश्लेषण यकृत व वृक्क में होता है। यह विटामिन मछली मक्खन, पनीर से प्राप्त होता है। विटामिन D सूर्य के प्रकाश से प्रचुर मात्रा में स्वतः ही पार निर्मित हो जाता है। 

सामान्य कार्य (General Furictions)

(1) कैल्सियम का अवशोषण। 

(2) अस्थियों का खनिजीकरण।

(3) फॉस्फेट के. उत्सर्जन में वृद्धि। …

(4) आंत के निचले भाग का pH कम करना। – 

न्यूनता लक्षण (Deficiency Symptoms)

(1) अस्थिमृदुता (Osteomalacia) 

(2) रिकेट्स (Rickets)

(3) रीनल ओस्टियोडिस्ट्रॉफी (Renal Osteodystrophy) 3. 

(4) पीलिया (Jaundice)। 

विटामिन ‘E’ (Vitamin ‘E’)

विटामिन ‘E’ को टोकोफेरॉल भी कहते हैं। यह वसा में घुलनशील पीले रंग का तैलीय पदार्थ है। ये ताप व अम्ल के लिए प्रतिरोधी होते हैं, परन्त क्षार व ऑक्सीकरण से नष्ट हा जाते हैं। ये मूंगफली, सोयाबीन, अरण्ड, कपास आदि के तेलों में मिलते हैं। इनके आतारक्त पालक व सलाद में भी पाए जाते हैं। 

सामान्य कार्य (General Functions).

(1) एण्टीऑक्सीडेन्ट। __

(2) हिपेटिक ऊतकक्षय से बचाव।

(3) विटामिन A की क्षति को रोकना।

(4) माइटोकॉण्ड्रिया की कला को सुरक्षा प्रदान करना। 

न्यूनता लक्षण (Deficiency Symptoms)

(1) बन्ध्यता 

(2) पेशीय दुरावशोषण 

(3) रात्रि में पेशी ऐंठन 

(4) एथिरोस्क्ले रोसिस रोग 

(5) फाइब्रोसाइटोसिस रोग 

(6) एरिथ्रोसाइट्स का जीवन कम होने से हीमोलाइसिस.कीटोन्यरिया आदि रागों का होना।

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