Bsc 2nd Year Botany IV Part D Question Answer Notes

Bsc 2nd Year Botany IV Part D Question Answer Notes :-

 

 

खण्ड

प्रश्न 1 – एपोमिक्सिस पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – असंगजनन (Apomixis)

असंगजनन (apomixis) शब्द दो शब्दों (apo-without; mixis-mingling) से मिलकर बना है। इसके अन्तर्गत वे सभी अलिंगी प्रजनन तरीके आते हैं जिनमें कि जनन के बीजाणु (spores) बिना fusion के बनते हैं। इसलिए यह लिंगी प्रजनन (sexual reproduction) के ऐसे अलिंगी (asexual) तरीकों से replacement होते हैं जिनमें किसी प्रकार केन्द्रक संगलन (nuclear fusion) नहीं होता है। एपोमिक्सिस (असंगजनन) के प्रकार (Forms of Apomixis) –

एपोमिक्सिस के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हो सकते हैं

(1) पार्थेनोजेनेसिस (अनिषेकजनन), (2) एपोगेमी (अपयुग्मन), (3) एपोस्पोरी (अपबीजाणुता), (4) स्पोरोफिटिक बडिंग।

(1) पार्थेनोजेनेसिस (Parthenogenesis)-इस विधि के अन्तर्गत अण्ड बिना नर यग्मक (male gamete) से मिलन किए हुए भ्रूण में परिवर्तित हो जाता है। फिर परागण हो भी सकता है. लेकिन निषेचन (fertilization) नहीं होता है। यह प्रक्रिया दो प्रकार की होती है

(i) द्विगुणित पार्थेनोजेनेसिस. (Diploid parthenogenesis)-मेगास्पोर का निर्माण बिना अर्द्धसूत्री विभाजन के होता है और इसलिए इस प्रकार के द्विगुणित (diploid) सोर से बना हआ अण्ड (egg) भी द्विगुणित होता है। इस प्रकार सामान्य द्विगुणित भ्रूण अगर्भित अण्ड (egg) से विकसित होता है। ऐसा भ्रूण द्विगुणित होता है, e.g. Thalictrum,Alchemilla आदि।

(ii) हैप्लॉयड पार्थेनोजेनेसिस (Haploid parthenogenesis)-मेगास्पोर सामान्य रुप से हुए  अर्द्धसत्री विभाजन के द्वारा बनता है तथा इसलिए इसकी प्रकृति हैप्लॉयड

(haploid) होती है। इस प्रकार की भ्रणकोष का अण्ड (egg) भी हैप्लॉयड होता है। इस प्रकार की अनिषेचित हैप्लॉयड कोशिका से हैप्लॉयड भ्रूण का निर्माण होता है, e.g. Solanum nigrum.

(2) एपोगेमी (Apogamy)-भ्रूणकोष की दूसरी कोशिकाओं (e.g. synergids, antipodal cells etc.) से भ्रूण के निर्माण की क्रिया को एपोगेमी कहते हैं। यह बहुत-से पौधों में देखी जाती है; जैसे-Allium, Iris आदि।

(3) एपोस्पोरी (Apospory)-इस प्रक्रिया के अन्तर्गत भ्रूणकोष का निर्माण सीधे न्यूसेलस अथवा आर्किस्पोरियम की कोशिकाओं से होता है। अगर भ्रूणकोष का निर्माण आर्किस्पोरियम की कोशिकाओं से होता है, तब इस प्रक्रिया को generative apospory कहते हैं। यदि भ्रूणकोष का निर्माण nucellus की कोशिकाओं से हो रहा है, तब इसे somatic apospory कहते हैं। एपोस्पोरी को Poa, Mallus, Ranunculus आदि पौधों में देखा जा सकता है।

(4) स्पोरोफिटिक बडिंग (Sporophytic budding)-इस प्रक्रिया के अन्तर्गत भ्रूण – का विकास nucellus या ovule के integuments की कोशिकाओं की budding द्वारा होता है, e.g. Citrus, Funkia आदि। इस प्रकार बने हुए भ्रूण सदा द्विगुणित होते हैं।

प्रश्न 2 – बहुभ्रूणता से आप क्या समझते हैं? पॉलीगोनम प्रकार के भ्रूणकोष के विकास का वर्णन कीजिए। 

उत्तर – बहुभ्रूणता (Polyembryony)

एक ovule से एक से अधिक भ्रूण (embryo) बनने की क्रिया को बहुभ्रूणता (polyembryony) कहते हैं। पौधों में यह क्रिया सर्वप्रथम ल्यूवेनहॉक (1719) ने देखी। एंजियोस्पर्स में बहुभ्रूणता की क्रिया बहुत कम दिखाई देती है, जबकि जिम्नोस्पर्स (Gymnosperms) में यह सामान्य रूप से पायी जाती है।

अगर विभिन्न भ्रूण (embryo) एक ही embryo sac में विकसित होते हैं, तब यह सत्य बहुभ्रूणता (true polyembryony) कहलाती है। यदि विभिन्न भ्रूण अलग-अलग embryo sacs में विकसित होते हैं, तब इसे कूट बहुभ्रूणता (false polyembryony) कहते हैं। बहुभ्रूणता निम्नलिखित तरीकों से हो सकती है

(1) अधिकांश अवस्थाओं में 0ospore में दरार (cleavage) पड़ जाती है या वह फट जाता है। ऐसा होने से कई भ्रूण बन जाते हैं। ऐसी बहुभ्रूणता को cleavage polyembryony कहते हैं। यह जाइगोट के कई भागों में विभाजित हो जाने से भी हो सकती है। ऐसी विभाजित हुई प्रत्येक कोशिका एक भ्रूण में विकसित हो जाती है।

(2) कभी-कभी embryo, sac के दूसरे भाग (जैसे-synergids आदि) भी भ्रूण बना लेते हैं तथा polyembryony दर्शाते हैं।

(3) कभी-कभी antipodal कोशिकाएँ भी भ्रूण में विकसित होकर बहुभ्रूणता दर्शाती हैं।

(4) कभी-कभी nucellus या integuments से भ्रूण (embryo) बन जाते हैं तथा बहुभ्रूणता दिखाते हैं। (5) Citrus की कुछ जातियों में एक से ज्यादा embryo sac कभी-कभी बन जाते हैं – तथा प्रत्येक से एक भ्रूण बन जाता है।

(6) Allium odorum में एक बीज में पाँच भ्रूण निम्नलिखित प्रकार से विकसित हुए

देखे जाते हैं-2 भ्रूण antipodal कोशिकाओं से, 1 भ्रूण zygotic कोशिका से,

1 भ्रूण synergids से तथा 1 अपस्थानिक भ्रूण (adventitious embryo) से।

आजकल पौधों में कृत्रिम बहुभ्रूणता उत्पन्न करने के काफी नये-नये तरीके खोज निकाले गए हैं। कभी-कभी पौधे के फूलों को उच्च तथा निम्न तापक्रम में क्रम से रखा जाता है। इसके लिए X-rays, हॉर्मोन्स तथा दूसरे रसायन भी काम में लाए जाते हैं।

पॉलीगोनम प्रकार के भ्रूणकोष का विकास 

(Development of Polygonum Type of Embryo Sac) 

इस प्रकार के भ्रूणकोष (embryo sac) को मोनोस्पोरिक (monosporic) भ्रूणकोष या

आठ केन्द्रकों वाला भ्रूणकोष भी कहते हैं। यह सर्वप्रथम Polygonum divaricatum में देखा गया था एवं यह 70% से अधिक आवृतबीजियों में पाया जाता है। इसलिए इसे सामान्य प्रकार (normal type) का भ्रूणकोष भी कहते हैं।

विकास (Development)-कार्यिकी मेगास्पोर (functional megaspore) आकार में बड़ा हो जाता है तथा इसकी आकृति गोल हो जाती है। इस प्रकार से बड़ा मेगास्पोर न्यूसेलस की आस-पास की कोशिकाओं से भोजन सोखता रहता है और इससे यह बड़ा होकर ovule का बड़ा भाग घेर लेता है। इस मेगास्पोर का केन्द्रक विभाजित होकर दो केन्द्रकों का निर्माण करता है। इन दो केन्द्रकों में से एक micropylar सिरे की ओर को चला जाता है तथा दूसरा chalazal सिरे की ओर को। दोनों केन्द्रकों के चारों ओर कोशिकाद्रव्य एकत्र हो जाता है।

भ्रूणकोष के केन्द्र में एक बड़ी रसधानी उपस्थित रहती है। दोनों सिरों पर उपस्थित दोनों केन्द्रक दो बार विभाजित होकर प्रत्येक सिरे पर चार केन्द्रकों का निर्माण करते हैं। इस अवस्था में भ्रूणकोष की संरचना आठ केन्द्रकों वाली होती है। भ्रूणकोष के प्रत्येक सिरे से एक केन्द्रक केन्द्र की तरफ चलता है। इन दोनों केन्द्रकों को polar केन्द्रक कहते हैं। ये दोनों केन्द्र में आकर आपस में मिलकर एक द्विगुणित द्वितीयक केन्द्रक का निर्माण करते हैं। Micropylar सिरे पर बचे तीन केन्द्रक egg apparatus का निर्माण करते हैं जिसमें कि एक egg कोशिका होती है तथा दो synergids होते हैं। Chalazal सिरे पर बचे तीन केन्द्रक 3-antipodal , कोशिकाओं का निर्माण करते हैं।

सम्पूर्ण विकसित भ्रूणकोष में इस प्रकार एक egg apparatus होता है जो कि एक egg कोशिका तथा दो synergids का बना होता है। इसके केन्द्र में एक secondary nucleus तथा दूसरे सिरे पर तीन antipodal कोशिकाएँ स्थित होती हैं। पॉलीगोनम प्रकार का भ्रूणकोष 4 केन्द्रकी, परन्तु 7 कोशिकीय होता है।

प्रश्न 3 आवृतबीजी में लघुबीजाणुजनन तथा नर युग्मकोद्भिद् के विकास का वर्णन कीजिए।

उत्तर – लघुबीजाणुजनन

(Microsporogenesis) 

प्रत्येक परागकोश (anther sac) में प्राथमिक बीजाणुजनन ऊतक (primary sporogenous tissue) होते हैं तथा इससे बहुत-सी लघुबीजाणु मातृ कोशिकाएँ (microspore mother cells) बनती हैं। इसमें से कुछ microspore mother cells मुरझा जाती हैं तथा कुछ काम करने योग्य रह जाती हैं। Meiosis तथा cytokinesis की क्रियाएँ प्रत्येक काम करने लायक microspore mother cells में होती हैं तथा इस तरह की प्रत्येक कोशिका में 4 लघुबीजाणु (microspores) बन जाते हैं। ये चारों microspores एक-दसरे से tetrahedral ढंग से जुड़े रहते हैं। कभी-कभी isobilateral या linear ढंग से भी ये जुड़े रहते हैं। ऐसे बने हुए लघुबीजाणु (microspores) नर युग्मकोद्भिद् की प्रथम कोशिका के रूप में कार्य करते हैं।

लघु  बीजाणु (Microspores)-ये प्रत्येक फूल के नर जननांग में होते हैं। इन्हें परागकण कहते हैं। प्रत्येक सूक्ष्मबीजाणु एककोशिकीय तथा एक केन्द्रक वाला होता है तथा दो परतों वाली दीवार से घिरा रहता है। इसकी बाहर की परत exine कहलाती है। Exine खुरदुरी क्यूटिकिल वाली तथा sculpturous होती है। अन्दर की परत को intine कहते हैं। यह पतली, नाजुक तथा सेलुलोस की बनी हुई होती है। मोटी exine में कुछ पतले germ pores भी होते हैं।

नर युग्मकोदभिद का विकास (Development of Male Gametophyte)

नर बीजाणु या लघु बीजाणु (microspore) का विकास तभी शुरू हो जाता है, जब यह लघु बीजाणुधानी (microsporangium) के अन्दर ही होता है। लघु बीजाणु का केन्द्रक विभाजित होकर दो केन्द्रकों में बँट जाता है जिन्हें generative nucleus तथा tube nucleus कहते हैं। ट्यूब केन्द्रक को vegetative केन्द्रक भी कहते हैं। एक कोशिका भित्ति द्वारा दोनों केन्द्रक अलग-अलग होकर एक छोटी generative कोशिका तथा दूसरी बड़ी tube कोशिका बनाते हैं। बाद में generative कोशिका की आकृति लेंस या spindle के आकार की हो जाती है।

इन दो कोशिकाओं वाली अवस्थाओं में यह इस प्रकार बना हुआ छोटा-सा युग्मकोद्भिद् नर बीजाणधानी से परागण की प्रक्रिया के लिए झड़ जाता है। परागण (pollination) की इस क्रिया में anthers से microspores उसी फूल के stigma तक पहुँचते हैं। अगर microspores उसी के फूल के stigma तक पहुंचते हैं, तब यह क्रिया स्व-परायण (self-pollination) कहलाती है। अगर microspores दूसरे फूल के stion पहंचते हैं, तब इस क्रिया को पर-परागण cross-pollination) कहते है ।

परागण की किया के बाद में दो कोशिकाओं वाले ऐसे pollen grains बाद में तीन बन जाते हैं क्योंकि generative कोशिका दो नर कोशिकाओं में विभाजित होजाती है। प्रत्येक नर युग्मक (male gamete) एक गोलाकार रचना होती है जिसमें कि मेजर पाटटोप्लाज्म से घिरा रहता है।

परतों वाली दीवार से घिरा रहता है। इसकी बाहर की परत exine कहलाती है। Exine खुरदुरी क्यूटिकिल वाली तथा sculpturous होती है। अन्दर की परत को intine कहते हैं। यह पतली, नाजुक तथा सेलुलोस की बनी हुई होती है। मोटी exine में कुछ पतले germ pores भी होते हैं। नर युग्मकोदभिद का विकास (Development of Male Gametophyte)

नर बीजाणु या लघु बीजाणु (microspore) का विकास तभी शुरू हो जाता है, जब यह लघु बीजाणुधानी (microsporangium) के अन्दर ही होता है। लघु बीजाणु का केन्द्रक विभाजित होकर दो केन्द्रकों में बँट जाता है जिन्हें generative nucleus तथा tube nucleus कहते हैं। ट्यूब केन्द्रक को vegetative केन्द्रक भी कहते हैं। एक कोशिका भित्ति द्वारा दोनों केन्द्रक अलग-अलग होकर एक छोटी generative कोशिका तथा दूसरी बड़ी tube कोशिका बनाते हैं। बाद में generative कोशिका की आकृति लेंस या spindle के आकार की हो जाती है।

image

इन दो कोशिकाओं वाली अवस्थाओं में यह इस प्रकार बना हुआ छोटा-सा युग्मकोद्भिद् नर बीजाणधानी से परागण की प्रक्रिया के लिए झड़ जाता है। परागण (pollination) की इस क्रिया में anthers से microspores उसी फूल के stigma तक पहुँचते हैं। अगर microspores उसी के फूल के stigma तक पहुंचते हैं, तब यह क्रिया स्व-परायण (self-pollination) कहलाती है। अगर microspores दूसरे फूल के stion पहंचते हैं, तब इस क्रिया को पर-परागण cross-pollination) कहते है।

परागण की किया के बाद में दो कोशिकाओं वाले ऐसे pollen grains बाद में तीन बन जाते हैं क्योंकि generative कोशिका दो नर कोशिकाओं में विभाजित होजाती है। प्रत्येक नर युग्मक (male gamete) एक गोलाकार रचना होती है जिसमें कि मेजर पाटटोप्लाज्म से घिरा रहता है।

मादा पुष्प के stigma पर जब ऐसी pollen grains उपस्थित होती हैं, तब ये पानी को सोखकर फूल जाती हैं। इनकी मोटी exine germ pore के स्थान पर फट जाती है। फटने के इस स्थान में intine एक नली के रूप में बाहर निकलती है। यह नली पॉलेन नलिका (pollen tube) कहलाती है। इस tube केन्द्रकं का कार्य क्या होता है इसका निश्चित ज्ञान नहीं है। इसे एक Vestigial अंग कहा जाता है। नर युग्मक (male gametes) बिना किसी flagella के होते हैं तथा इस अवस्था में गर्भाधान के लिए तैयार रहते हैं।

प्रश्न 4-स्त्रीकेसर की आकारिकीय प्रकृति का वर्णन कीजिए। 

उत्तर- स्त्रीकेसर की आकारिकीय प्रकृति

(Morphological Nature of Carpel) 

स्त्रीकेसर केन्द्रकी तथा व्याससममित (radially symmetrical), खोखली नलिकाकार संरचना है। इसकी प्रकृति वाद का विषय है। क्लासिकल सिद्धान्त (Classical concept) के अनुसार गोथे (Goethe) ने कहा कि कार्पल जननक्षम (fertile) पत्ती के समान संरचना है जिस पर बीजाण्ड किनारों पर मिलते हैं।

प्रोफेसर पुरी (Puri) ने अण्डप के किनारों को अन्दर की ओर मुड़ने को इन्डुप्लीकेट फोल्डिंग (induplicate folding) कहा। उनके अनुसार कार्पल की त्रिविम संरचना (3D structure) के अनुसार इसमें अभ्यक्ष (dorsal), अपाक्ष (ventral) व पार्श्व (lateral) अथवा किनारे की – (marginal) सतह होती है। बीजाण्ड किनारे के थोड़ा अन्दर (submarginal) की ओर होते हैं।

बेले वस्वामी (Bailey and Swamy) ने सन् 1951 में डेजीनेरिया (Degenaria) के कार्पल का वर्णन किया तथा उसमें कन्डुप्लीकेट फोल्डिंग (conduplicate folding) का वर्णन किया। उनके अनुसार बन्ध्य किनारे सीधे ऊपर की ओर मुड़े रहते हैं (upward folding)।

किनारों के ऊपरी भाग वर्तिकाग्र के समान परागकणों को ग्रहण करते हैं। बीजाण्ड को वेन्ट्रल

व डॉर्सल बन्डल दोनों से ही संवहन पूल प्राप्त होता है। विकास के समय पर्ल का ऊपरी बन्ध्य भाग वर्तिका व वर्तिकान में परिवर्तित हुआ तथा निचला जननक्षम बीजाण्डयुक्त भाग अण्डप में।

मेलविले (Melville ने सन 1962 में गोनोफिल वाद (Gonophyll theory) दिया । जिसके अनुसार प्रत्येक गायनोफिल इकाई बन्ध्य चित्र–इन्डुप्लीकेट कार्पल।। पत्ती तथा पर्णलग्न (epiphyllous) द्विशाखा शाखित मादा जनन अंगयुक्त तन्त्र है। गोनोफिल जिसमें केवल नर जनन अंग मिलता है, उसे एन्ड्रोफिल तथा केवल मादा जनन अंगयुक्त होने पर गायनोफिल कहते हैं। बन्ध्य पत्ती को टेगोफिल (tagophyll) कहते हैं। विकास के समय मुक्त स्तम्भीय बीजाण्डन्यास (free central placentation) युक्त अण्डप, ओव्यूलीफेरस शाखा के केन्द्रीय प्लेसेन्टल कॉलम से संलग्न होने का परिणाम है। अण्डप भित्ति (ovary wall) टेगोफिल के संलग्न होने से बनी है। फॉलिकल (follicle) का निर्माण एक संघनित (single condensed) गायनोफिल से हुआ जिसमें वेन्ट्रल बन्डल डाइकोटोमस ओव्यूलीफेरस शाखा के दो अर्द्ध भागों (two halves) से बना है।

म्यूसे (Meeuse) ने सन् 1963 में जायांग की दो मुख्य केटेगरी बताईं स्यूडोएन्जियोस्पर्स (Pseudoangiospermous) तथा स्यूडोफिल्लोस्पोरस (Pseudophyllosporous) प्रकार। उन्होंने बताया कि वर्तिकाग्र माइक्रोपाइल की वृद्धि से बनता है जो नग्न बीजाण्ड के आगे बढ़ जाती है। उन्होंने नीटम (Gnetum) से इसकी तुलना की। उन्होंने स्यूडोफिल्लोस्पोरस जायांग को गोनोक्लेड (Gonoclad) तथा स्टेगोक्लेड (Stagoclad) के रूप में समझाया तथा स्त्रीकेसर की भित्ति को बाह्य अध्यावरण के समान बताया।

प्रश्न 5 – आवृतबीजी में ओनाग्रेड प्रकार के भ्रूण के विकास का वर्णन कीजिए। –

अथवा द्विबीजपत्री पौधों में भ्रूण विकास का वर्णन कीजिए। 

उत्तर – ओनाग्रेड प्रकार के भ्रूण का विकास

(Development of Onagrad Type of Embryo) 

द्विबीजपत्री पौधों में सर्वाधिक पाया जाने वाला भ्रूण का विकास ओनाग्रेड प्रकार का ही होता है। यह बहुत सरलता से Brassicaceae अथवा Cruciferae कुल के पौधे Capsella bursa-pastoris में देखा जा सकता है।

इस प्रकार के भ्रूण के विकास में जाइगोट एक अनुप्रस्थ काट द्वारा दो कोशिकाओं में विभाजित हो जाता है-आधार कोशिका (basal cell अथवा suspensor cell) एवं अन्तस्थ कोशिका (terminal cell अथवा embryo cell)। इनमें से आधार कोशिका (basal cell) फिर एक अनुप्रस्थ काट से विभाजित होती है तथा अन्तस्थ कोशिका में एक ऊर्ध्व काट (vertical division) से विभाजन होता है। इस प्रकार से एक चार कोशिकाओं वाला प्राकभ्रण (proembryo) बनता है जो कि उल्टे T (L) के आकार का होता है। दोनों आधार कोशिकाएँ कुछ और अनुप्रस्थ काटों से विभाजित होती हैं तथा एक 6-10 कोशिकाओं वाला निलम्बकाया सस्पेंसर (suspensor) बनाती हैं। यह सस्पेंसर भ्रूण की कोशिकाओं को एण्डोस्पी धकेलता है। सस्पेंसर की सबसे ऊपर की कोशिका काफी बड़ी हो जाती है तथा अपने भ्रूणकोष के micropylar के सिरे में जोड़ लेती है एवं एक चूषक (haustorium) की सबसे नीचे की कोशिका हाइपोफाइसिस की तरह से कार्य करती है। हाइपोफाइसिस (hypophysis) शीघ्र ही गोल हो जाता है तथा कई बार होकर आठ कोशिकाओं वाला हो जाता है। इसकी ऊपर की चार कोशिकाएँ जड की एपिडर्मिस

तथा मूलगोप (root cap) का निर्माण करती हैं, जबकि नीचे की चार कोशिकाएँ जड़ के है कॉर्टेक्स की initials बनाती हैं।

साथ-साथ ही दो अन्तस्थ कोशिकाएँ एक-दूसरे से ऊर्ध्व काट (vertical divisions) द्वारा विभाजित हो जाती हैं जो कि पहले ऊर्ध्व काट से समकोण (right angle) पर होता है। इस प्रकार चार कोशिकाओं वाली चतुष्क अवस्था (quadrant stage) का निर्माण होता है। चारों कोशिकाएँ अनुप्रस्थ काट के द्वारा 8-कोशिकाओं वाली अष्टक अवस्था (octant stage) का निर्माण करती हैं। सस्पेंसर के आगे की चार कोशिकाएँ हाइपोबेसल कोशिकाएँ कहलाती हैं, जबकि दूसरी बची हुई चार कोशिकाएँ एपीबेसल कोशिकाएँ (epibasal cells) कहलाती हैं। इन एपीबेसल कोशिकाओं से प्रांकुर (plumule) एवं दो बीजपत्र (cotyledons) विकसित होते हैं, जबकि हाइपोबेसल (hypobasal) कोशिकाओं से हाइपोकोटाइल (hypocotyl) का निर्माण होता है।

भ्रण की आठों कोशिकाओं में परीक्लाइनल (periclinal) विभाजन से आठ बाहर की तथा आठ अन्दर की कोशिकाएँ बनती हैं। बाहर की आठ कोशिकाओं में एन्टीक्लाइनल 1 ) विभाजन होता है जिससे बाहर की बाह्यत्वचा (epidermis) या डर्मेटोजन (dermatogen) का निर्माण होता है। अन्दर की कोशिकाएँ अनुप्रस्थ तथा लम्बवत् (transverse and longitudinal) विभाजनों द्वारा विभाजित होकर केन्द्रीय ऊतक प्लीरोम Trome) का निर्माण करती हैं। डर्मेटोजन (dermatogen) एवं प्लीरोम (plerome) के बीच में कॉर्टेक्स का निर्माण होता है। पेरीब्लेम (periblem) से कॉर्टेक्स का निर्माण होता है,

जबकि प्लीरोम (plerome) से स्टील (stele) बनता है। जैसे-जैसे वृद्धि होती रहती है, भ्रूण का स्वतन्त्र भाग गोल या हृदयाकार हो जाता है। इसके दोनों गोल भाग दो बीजपत्रों (cotyledons) का निर्माण करते हैं। दोनों बीजपत्र (cotyledons) के बीच एक प्रांकुर (plumule) विकसित होता है। इस प्रकार प्रांकर (plumule) की स्थिति शीर्ष पर एवं बीज पत्रों (cotyledons) की स्थिति पार्श्व (lateral) होती है।

प्रश्न 6–विस्तृत टिप्पणी लिखिए-भ्रूणपोष की प्रकृति व प्रकार। 

उत्तर- भ्रूणपोष की प्रकृति व प्रकार

(Nature and Types of Endosperm) 

आवृतबीजी (एन्जियोस्पर्मस) पौधों में भ्रूणपोष एक triploid ऊतक होता है। यह निषेचन की क्रिया के बाद में विकसित होता है तथा नये विकसित होने वाले भ्रूण (embryo) को पोषण देने का कार्य करता है। वास्तव में यह triple / fusion की प्रक्रिया के बाद विकसित होता है। Triple fusion का अर्थ है-एक sperm केन्द्रक तथा दो polar केन्द्रकों का । मिलना। इस मिलन से ही endosperm बनता है। जिम्नोस्पर्स । पौधों में endosperm haploid होता है तथा angiosperms में यह triploid होता है।

भ्रूणपोष की रचना तीन प्रकार की होती है-

(1) केन्द्रकीय प्रकार (Nuclear type)—इसमें भ्रूणपोष केन्द्रक (endosperm nucleus) में स्वतन्त्र केन्द्रकीय विभाजन (free-nuclear divisions) होते हैं तथा बीच में भित्ति निर्माण (wall formation) नहीं होता है। इसीलिए भ्रूणपोष में केन्द्रक स्वतन्त्र रूप में रहते हैं।

(2) कोशिकीय प्रकार (Cellular type)-इस प्रकार की भ्रूणपोष की रचना में वास्तव में भ्रूणपोष का केन्द्रक विभाजित तो होता है, लेकिन इसके साथ-साथ ही भित्ति निर्माण (wall formation) भी होता रहता है। इस प्रकार बाद में बहुकोशीय भ्रूणपोष आता है।

(3) हीलोबियल प्रकार (Helobial type)-इस प्रकार की भ्रूणपोष रचना केन्द्रीय प्रकार तथा कोशिकीय प्रकार के बीच की होती है। इस प्रकार की भ्रूणपोष रचना में पहले तो केन्द्रकों के विभाजन के साथ-साथ भित्ति निर्माण (wall formation) भी होता रहता है लेकिन बाद में केन्द्रकों के विभाजन के साथ-साथ भित्ति निर्माण (wall formation नहीं होता है। बाद में बने हुए सभी केन्द्रक स्वतन्त्र रहते हैं। इसीलिए भ्रूणपोष का कळ भाग कोशिकीय (cellular) होता है तथा बाद में बने भाग में केन्द्रक स्वतन्त्र रूप में (free-nuclear stage) रहते हैं।

भ्रणपोष की प्रकृति (Nature of endosperm)-भ्रूणपोष triploid होने के कारण इसकी प्रकृति का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता। भ्रूणपोष की प्रकृति के बारे में वैज्ञानिकों के तीन प्रकार के मत हैं।

(1) छोटे-से भ्रूण (embryo) के लिए भोजन को संचित रखने के कारण कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार भ्रूणपोष एक मादा युग्मकोद्भिद् (female _gametophyte) है। Strasburger (1900) के अनुसार यह युग्मकोद्भिद् का vegetative ऊतक होता है।

(2) Sargent (1906) के अनुसार भ्रूणपोष की प्रकृति sporophytic होती है। यह विशेष रूप से इसीलिए होती है क्योंकि इसमें secondary केन्द्रक और दूसरे नर युग्मक (second male gamete) का fusion होता है।

(3) कुछ दूसरे वैज्ञानिकों के अनुसार भ्रूणपोष न तो gametophytic प्रकृति का होता है और न ही sporophytic प्रकृति का बल्कि यह एक भिन्नित ऊतक (differentiated tissue) माना जाता है।,

प्रश्न 7-बीजाण्ड क्या है तथा ये कितने प्रकार के होते हैं? अथवा बीजाण्ड की संरचना एवं विभिन्न प्रकार के बीजाण्डों का वर्णन कीजिए। 

उत्तर – बीजाण्ड (Ovule)

बीजाण्ड एक छोटी गोल अण्डाकार रचना होती है जो कि अण्डाशय (ovary) के प्लेसेन्टा से एक छोटे वृन्त (funicle) के माध्यम से जुड़ा रहता है।

बीजाण्ड की संरचना

(Structure of Ovule) 

एक प्रारूपिक आवृतबीजी बीजाण्ड (angiospermic ovule) की आन्तरिक ” संरचना का अध्ययन अनुलम्ब काट (longitudinal section) में किया जाता है। परिपक्व बीजाण्ड, लगभग गोल या अण्डाकार होता है। बीजाण्डद्वार (micropyle) को छोड़कर बीजाण्ड प्रायः चारों ओर से दोहरे अध्यावरण से घिरा होता है। इसे द्विअध्यावरणी (bitegmic) बीजाण्ड कहते हैं। कुछ पौधों में अध्यावरण एक पर्त से बना होता है, इसे एकअध्यावरणी (unitegmic) बीजाण्ड कहते हैं। लीची, जायफल आदि में बीजचोल (aril) के रूप में एक तीसरा अध्यावरण पाया जाता है। बीजचोल की उत्पत्ति बीजाण्ड के आधार से होती है। बीजाण्ड का मुख्य भाग मृदूतक से बुना बीजाण्डकाय (nucellus) होता है, जो अध्यावरण से घिरा रहता है। परिपक्व बीजाण्डकाय में भ्रूणकोष (embryo. sac) स्थित होता है। यह मादा युग्मकोद्भिद् (female gametophyte) होता है। भ्रूणकोष में बीजाण्डद्वार की ओर तीन कोशिकाओं से बना अण्ड उपकरण (egg apparatus) होता है। इसके मध्य में स्थित बड़ी कोशिका को अण्डाणु या अण्ड कोशिका (oosphere or egg cell) तथा पार्वीय दोनों कोशिकाओं को सहायक कोशिकाएँ (synergids) कहते हैं। निभाग छोर पर स्थित तीन कोशिकाओं को प्रतिमुख कोशिकाएँ (antipodal cells) कहते हैं। भ्रूणकोष के मध्य में ध्रुवीय केन्द्रक संयुक्त होकर द्वितीयक केन्द्रक (secondary nucleus) बनाते हैं (चित्र देखिए)।

बीजाण्ड एक वृन्त के द्वारा बीजाण्डासन के साथ जुड़ा रहता है। इसे बीजाण्डवृन्त (funicle) कहते हैं। जिस स्थान पर बीजाण्डवृन्त बीजाण्ड से जुड़ता है, उसे हायलम (hilum) कहते हैं। बीजाण्डद्वार का विपरीत छोर जहाँ अध्यावरण की पर्ते बीजाण्डकाय के साथ जुड़ी रहती हैं, उस स्थान को निभाग (chalaza) कहते हैं। बीजाण्ड बीजाण्डासन (placenta) से पोषण प्राप्त करता है।

बीजाण्ड के प्रकार 

(Type of Ovule)

बीजाण्ड छह प्रकार के होते हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

(1) ऑर्थोट्रोपस (Orthotropous type)-ऐसे बीजाण्ड में माइक्रोपाइल, चेलेजा एवं फ्यूनिकल एक सीधी लाइन में रहते हैं तथा अण्ड का शरीर प्लेसेन्टा की सतह से सीधा खड़ा रहता है।

(2) एनाट्रोपस (Anatropous type) इस प्रकार के बीजाण्ड में फ्यूनिकल लम्बा हो जाता है एवं बीजाण्ड का शरीर पीछे की ओर 180° के कोण से मुड़ा रहता है। इसलिए माइक्रोपाइल हाइलम एवं प्लेसेन्टा के पास आ जाता है। यहाँ माइक्रोपाइल व चेलेजा, फ्यूनिकल के समान्तर होते हैं।

(3) हैमिट्रोपस (Hemitropous type)-इस प्रकार के बीजाण्ड में बीजाण्ड का शरीर 90° के कोण पर मुड़ा रहता है जिससे यह फ्यूनिकल के साथ एक समकोण (right angle) बनाता हुआ फ्यूनिकल के नीचे की धुरी के बीच में लगा रहता है। इसमें micropyle प्लेसेन्टा से दूर रहता है। माइक्रोपाइल व चेलेजा, फ्यूनिकल से 90° का कोण बनाते हैं।

(4) कम्पाइलोट्रोपस (Campylotropous type)-यह बीजाण्ड hemitropous बीजाण्ड के प्रकार का ही होता है. लेकिन इसमें माइक्रोपाइल सहित बीजाण्ड का ऊपरी भाग तथा nucellus एवं embryo sac नीचे की ओर को झुके रहते हैं। यहाँ फ्यूनिकल व चेलेजा के बीच 120° का कोण बनता है तथा embryo sac सीधा होता है।

(5) एम्फीटोपस (Amphitropous type)—यह बीजाण्ड एनाट्रोपस प्रकार के बीजाण्ड से मिलता है, लेकिन इस प्रकार के बीजाण्ड में बीजाण्ड का झुकाव घोड़े के पर का भात

एइसम embryo sac एवं nucellus एक अर्द्धगोलाकार रूप में झुके रहते हैं। ।

(6) सर्सिनोट्रोपस (Circinotropous type)-इस प्रकार के बीजाण्ड में फ्यूनिकल असामान्य रूप में लम्बा होता है तथा अण्ड 360° के कोण से घूम जाता है। इस प्रकार से यह फ्यूनिकल द्वारा चारों ओर से घिरा रहता है। इस प्रकार के अण्ड में माइक्रोपाइल ऊपर की ओर को रहता है। जैसे-नागफनी में।

नोट-इस प्रश्न-पत्र को पाँच खण्डों-अ, ब, स, द एवं इ में विभाजित किया गया है। खण्ड-अ (लघु उत्तरीय प्रश्न) में एक लघु उत्तरीय प्रश्न है, जिसके दस भाग हैं। ये सभी दस भाग अनिवार्य हैं। खण्डों-ब, स, द एवं इ (विस्तृत उत्तरीय प्रश्न) प्रत्येक में दो प्रश्न हैं। प्रत्येक खण्ड से एक प्रश्न कीजिए।

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