BSc 1st Year Physics inertial Reference Frame Notes
BSc 1st Year Physics inertial Reference Frame Notes:-
Ch. Charan Singh University, Meerut
Latest Syllabus
MECHANICS AND WAVE MOTION
B.Sc. (Part I); Paper 1 Physics
UNIT-I
Inertial reference frame, Newion’s laws of motion, dynamics of particle in rectilinear and circular motion, conservative and non-conservative forces, conservation of energy, linear momentum and angular momentum, collision in one and two dimensional cross-section.
UNIT-II
Rotational energy and rotational inertia for simple bodies, the combined translation and rotational motion of a rigid body on horizontal and inclined planes, simple treatment of the motions of a top. Relations between elastic constants, bending of beams and torsion of cylinder.
UNIT-III
Central forces, two particle central force problem, reduced mass, relative and centre of mass motion. Law of gravitation, Kepler’s laws. motions of planets and satellites, geo-stationary satellites.
UNIT-IV
Simple harmonic motion, differential equation of S.H.M. and its solution, uses of complex notation, damped and forced vibrations composition of simple harmonic motion.
Differential equation of wave motion, plane progressive waves in fluid media, reflection of waves, phase change on reflection, superposition. stationary waves, pressure and energy distribution, phase and aroup velocity.
भौतिक विज्ञान
(यान्त्रिकी एवं तरंग गति)
खण्ड ‘अ‘ : लघु उत्तरीय प्रश्न?
परीक्षा प्रश्न-पत्र में इस खण्ड में एक प्रश्न होगा, जिसके 10 भाग होंगे। सभी भागों का उत्तर देना अनिवार्य होगा।
प्रश्न 1. निर्देश तन्त्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर : ऐसा निर्देश निकाय जिसके सापेक्ष हम किसी कण की स्थितियों का मापन करते हैं निर्देश तन्त्र कहलाता है।
साधारणतया, पृथ्वी पर दृढ़ता से कीलित निर्देश निकाय, स्थिर निर्देश तन्त्र माना जाता है। पृथ्वी के सापेक्ष गतिशील कोई अल्प निर्देश निकाय गतिशील निर्देश तन्त्र कहलाता है।
प्रश्न 2. जड़त्वीय तथा अजड़त्वीय फ्रेम से क्या अभिप्राय है?
उत्तर : जड़त्वीय फ्रेम-वे फ्रेम जिसमें न्यूटन के गति विषयक नियमों का पालन होता है, ‘ जड़त्वीय फ्रेम कहलाते हैं। इस प्रकार के फ्रेम के सापेक्ष एक अत्वरित पिण्ड अत्वरित ही रहता है अर्थात् विराम में अथवा निश्चित रेखीय वेग से गतिशील रहता है।
प्रयोगों से स्पष्ट होता है कि कोई निर्देश फ्रेम जो किसी जड़त्वीय फ्रेम के सापेक्ष निश्चित वेग से गति करता है, जड़त्वीय फ्रेम कहलाता है।
अजड़त्वीय फ्रेम- वे फ्रेम जिसमें न्यूटन के गति विषयक नियम वैध नहीं होते हैं, अजड़त्वीय फ्रेम कहलाते हैं। इस प्रकार के फ्रेम के सापेक्ष एक अत्वरित पिण्ड त्वरित हो जाता है।
पृथ्वी पर जड़ित निर्देश तन्त्र अजड़त्वीय प्रेम होता है, कोई भी फ्रेम, जो प्रतिवर्तन (turning) के योग्य हो, अजड़त्वीय फ्रेम होता है।
प्रश्न 3. कल्पित बल क्या होते हैं? ..
उत्तर : ऐसा बल जो केवल निर्देश फ्रेम के त्वरण के कारण आरोपित हुआ प्रतीत होता है। कल्पित (Fictitious), आभासी (apparent) अथवा छद्म बल (pseudo force) कहलाता है।
प्रश्न 4. न्यूटन कागति का दूसरा नियम बताइए।
उत्तर : न्यूटन के गति के द्वितीय नियम के अनुसार, “प्रत्येक पिण्ड तब तक अपनी विरामावस्था अथवा सरल रेखा में एकसमान गति की अवस्था में रहता है. जब तक कि उस पर अवस्था परिवर्तन के लिए कोई बाह्य बल नहीं लगाया जाता है।”
प्रश्न 5. रेखीय संवेग संरक्षण का नियम लिखिए तथा न्यूटन के गति विषयक तृतीय नियम से इसका निगमन कीजिए।
अथवा
सिद्ध कीजिए कि रेखीय संवेग संरक्षण का नियम न्यूटन के तृतीय नियम के तुल्य होता है।
उत्तर : रेखीय संवेग संरक्षण के नियम के अनुसार, “बाह्य बल की अनुपस्थिति में किसी निकाय का रेखीय संवेग संरक्षित रहता है।”
रेखीय संवेग संरक्षण नियम की उत्पत्ति— माना कोई निकाय दो कणों से मिलकर बना है। परस्पर अन्योन्य क्रिया के कारण पहले कण पर दूसरे कण द्वारा लगाया गया बल F12 तथा दूसरे कण पर पहले कण द्वारा लगाया बल F21 है। इन बलों के कारण t समय में पहले कण के संवेग में परिवर्तन P1 तथा दूसरे कण के संवेग में परिवर्तन p2 है।
अतः बाह्य बल की अनुपस्थिति में दो कणों के निकाय का रेखीय संवेग नियत रहता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि रेखीय संवेग संरक्षण का नियम न्यूटन के ततीय नियो तल्य होता है।
प्रश्न 6. विभिन्न द्रव्यमानों के दो पिण्ड समान संवेग से चल रहे हैं। किसी ऊर्जा अधिक होगी?
उत्तर : माना कि दो पिण्ड जिनके द्रव्यमान m1 व m2 हैं, समान संवेग से वेग v1 व v2 गतिमान हैं। चूँकि उनके संवेग, समान हैं, तब
अत: अधिक द्रव्यमान वाले पिण्ड की गतिज ऊर्जा कम होगी।
प्रश्न 7. एकसमान वृत्तीय गति एवं असमान वृत्तीय गति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर : यदि कोई कण किसी स्थिर वृत्त की परिधि पर नियत चाल से घूम रहा हो, तो उस गति को एकसमान वृत्तीय गति कहते हैं। यदि चाल में समय के साथ लगातार परिवर्तन हो, तो उसे असमान वृत्तीय गति कहते हैं।
प्रश्न 8. एकसमान वृत्तीय गति करते कण के अभिकेन्द्र त्वरण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर : जब कोई कण एकसमान वृत्तीय गति करता है तो कण की चाल अचर होते हए भी उसकी दिशा लगातार बदलती रहती है अर्थात् उसका वेग निरन्तर बदलता रहता है। दिशा के इस परिवर्तन के लिए कण पर एक बाह्य बल कार्य करता है, फलतः गति त्वरित कही जाती है। इस बल अथवा त्वरण की दिशा (स्पर्शरेखीय) के लम्बवत् अर्थात् केन्द्र की ओर दिष्ट रहती है। केन्द्र की ओर दिष्ट इसी त्वरण को अभिकेन्द्र त्वरण कहा जाता है।
प्रश्न 9. अभिकेन्द्र बल से क्या अभिप्राय है? अभिकेन्द्र बल के दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर : एकसमान वृत्तीय गति करने वाले कण अथवा पिण्ड पर सदैव ही एक बल कार्य: करता है जिसकी दिशा वृत्तीय पथ के केन्द्र की ओर होती है। इसी कारण इस बल को अभिकेन्द्र बल कहते हैं।
उदाहरण- (1) डोरी से बँधे कण की क्षैतिज वृत्त में गति।
(2) परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की गति।
प्रश्न 10. एक m द्रव्यमान की वस्तु जो एक R लम्बाई की डोरी से बंधा है आरएक कर्ज वत्त में घमायी जा रही है, के लिए ऊर्ध्व वृत्त के उच्चतम बिन्दु पर क्रान्तिका ज्ञात कीजिए जिससे वह वृत्त को पूरा कर सके।
उत्तर : m द्रव्यमान की एक वस्तु जब R त्रिज्या के ऊर्ध्व वृत्त में घुमायी जाती है तब किसी क्षण, वस्तु पर दो बल कार्य करते हैं-वस्तु का भार mg, ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर को तथा डोरी में तनाव T, त्रिज्यतः भीतर की ओर को। वस्तु पर एक स्पर्शरेखीय बल mg sine तथा एक नैट त्रिज्य बल T – mg cos O कार्य करते हैं।
स्पष्ट है कि TB <TA , क्योंकि अब वस्तु का भार भी अभिकेन्द्र बल में योगदान करता है।
वस्तु की चाल VB घटाने पर, तनाव TB घटेगा तथा एक क्रान्तिक चाल VC (माना) पर शून्य हो जाएगा।
वृत्त के उच्चतम बिन्दु पर यदि वस्तु की चाल /Rg से कम होगी तो डोरी बोली – जाएगी तथा वस्तु उच्चतम बिन्दु B से आगे वृत्तीय गति नहीं कर पाएगी।
प्रश्न 11. द्रव्यमान केन्द्र से आप क्या समझते हो?
उत्तर : किसी निकाय (अथवा पिण्ड) का द्रव्यमान केन्द्र वह बिन्दु है जो निकाय (पिण्ड) के साथ इस प्रकार गति करता है जैसे निकाय का सम्पूर्ण द्रव्यमान इसी बिन्दु पर संकेन्द्रित हो तथा निकाय पर लगे सभी बाह्य बल उसी बिन्दु पर कार्यरत हैं।
कणों के एक निकाय का द्रव्यमान केन्द्र
प्रश्न 12. दर्शाइए कि द्रव्यमान-केन्द्र निर्देशांक तन्त्र में निकाय का कुल रेखीय संवेग शून्य होता है।
उत्तर : द्रव्यमान-केन्द्र निर्देशांक तन्त्र में, द्रव्यमान-केन्द्र का वेग vcm शून्य होता है; …. अत: कणों के निकाय का कुल रेखीय संवेग भी शून्य होगा। .
चूंकि Curl F शून्य है, अतः बल F संरक्षी है।
प्रश्न 14. रेखीय संवेग संरक्षण का नियम लिखिए।
उत्तर : रेखीय संवेग संरक्षण का नियम— ईस नियम के अनुसार, यदि किसी निकाय पर कार्यरत बाह्य बलों का वेक्टर योग शून्य हो, तो निकाय का कुल रेखीय संवेग नियत रहता है।
प्रश्न 15. प्रत्यास्थी व अप्रत्यास्थी संघट्ट समझाइए।
उत्तर : यदि दो संघट्ट करने वाले कणों के मध्य पारस्परिक बल संरक्षित रहते हैं तो संघट्ट . में गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है अर्थात दो कणों के संघट में संघट्ट के बाद उतनी ही गतिज ऊर्जा रहती है जितनी संघट्ट से पूर्व थी। यह प्रत्यास्थी संघट्ट कहलाता है। उदाहरणार्थ परमाण्वीय, नाभिकीय एवं मूल कणों के बीच संघट्ट आदि।
यदि कणों के संघट में गतिज ऊर्जा संरक्षित नहीं रहती (परन्त कल ऊर्जा तथा संवेग संरक्षित रहते हैं) तब संघट्ट अप्रत्यास्थी संघट्ट कहलाता है। उदाहरणार्थ-बन्दूक की गोली व लक्ष्य के मध्य संघट्ट आदि।
प्रश्न 16. संरक्षी एवं असंरक्षी बलों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर : संरक्षी बल- यदि किसी वस्तु पर कार्यरत बल द्वारा अथवा उसके विरुद्ध किया गया कार्य वस्तु की केवल प्रारम्भिक एवं अन्तिम अवस्थाओं पर निर्भर करता है, उनके बीच वास्तविक गमन पथ पर नहीं, तो यह बल संरक्षी बल कहलाता है।
असंरक्षी बल- यदि किसी वस्तु पर कार्यरत बल द्वारा अथवा उसके विरुद्ध किया गया कार्य वस्तु की प्रारम्भिक एवं अन्तिम अवस्थाओं के साथ उनके बीच वास्तविक गमन पथ पर भी निर्भर करता है तो यह बल असंरक्षी बल कहलाता है।
प्रश्न 17.दिखाइए कि संरक्षी बल का कर्ल शून्य होता है।
उत्तर : संरक्षी बल का कर्ल-संरक्षी बल स्थितिज ऊर्जा की ऋणात्मक प्रवणता होता है, अर्थात्
अर्थात् संरक्षी बलका कर्लशून्य होता है। इसका अर्थ है कि संरक्षी बल आघूर्णी होता है।
प्रश्न 18. कार्य-ऊर्जा प्रमेय लिखिए तथा सिद्ध कीजिए।
उत्तर : कार्य-ऊर्जा प्रमेय के अनुसार, “किसी बल द्वारा वस्तु पर किया गया कार्य वस्तु की गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है” अर्थात् कार्य तथा गतिज ऊर्जा एक-दूसरे के समतुल्य है
माना m द्रव्यमान के एक पिण्ड पर एक परिणामी त्वरित बल, X-अक्ष के अनुदिश गतिमान है। जब पिण्ड स्थिति x1 से चलकर स्थिति x2 में होता है, तब इसका वेग v1 से बढ़कर v2 हो जाता है। इस विस्थापन में बल द्वारा किया गया कार्य
अथवा बल द्वारा किया गया कार्य = गतिज ऊर्जा में परिवर्तन
यही कार्य-ऊर्जा प्रमेय है।
प्रश्न 19. कोणीय संवेग संरक्षण का सिद्धान्त बताइए।
उत्तर : यदि किसी पिण्ड पर कार्यरत कुल बाह्य बल-आघूर्ण शून्य हो तो उस पिण्ड का कोणीय संवेग नियत रहता है। इसे कोणीय संवेग संरक्षण का सिद्धान्त कहते हैं।
प्रश्न 20. किसी अक्ष के परितः घूमते पिण्ड के ‘जड़त्व-आघूर्ण‘ की परिभाषा दीजिए।
उत्तर : प्रत्येक पिण्ड, जो किसी अक्ष के चारों ओर घूर्णन करने के लिए स्वतन्त्र है, अपनी वर्तमान विरामावस्था अथवा घूर्णी अवस्था में ही रहने की प्रवृत्ति रखता है। यदि हम उसकी वर्तमान अवस्था में परिवर्तन करने का प्रयत्न करे तो पिण्ड इसका विरोध करता है। पिण्ड के इसी गुण को जड़त्व-आघूर्ण कहते हैं।
प्रश्न 21. सिद्ध कीजिए बल आघूर्ण = जडत्व आघूर्ण x कोणीय त्वरण।
उत्तर : माना कि 0 बिन्दु से जाने वाली स्थिर अक्ष OK के परित: एक दृढ़ पिण्ड के कोणीय वेग से घूर्णन कर रहा है। चूंकि P पर स्थित कण का द्रव्यमान m है, अत: उसका रेखीय संवेग my होगा तथा बिन्दु 0 कि परितः इसके कोणीय संवेग का मान .
प्रश्न 22.घूर्णन त्रिज्या को परिभाषित कीजिए।इसका भौतिक महत्त्व समझाइए।
उत्तर : किसी पिण्ड की किसी घूर्णन-अक्ष के परित: घूर्णन-त्रिज्या अक्ष से वह दूरी है जिसके वर्ग को पिण्ड के कुल द्रव्यमान से गुणा कर देने पर, पिण्ड का उस घूर्णन-अक्ष के
परित: जड़त्व-आघूर्ण प्राप्त हो जाता है। अत: यदि पिण्ड की किसी अक्ष के परितः घूर्णन त्रिज्या k हो तो पिण्ड का उस अक्ष के परितः जड़त्व-आघूर्ण
भौतिक महत्त्व-किसी अक्ष के परितः घूर्णन करते पिण्ड का जड़त्व-आघूर्ण ज्ञात करने के लिए, हम पिण्ड के सम्पूर्ण द्रव्यमान को घूर्णन-अक्ष से त्रिज्य दूरी K पर संकेन्द्रित मान सकते हैं (पिण्ड के द्रव्यमान केन्द्र पर नहीं)।
प्रश्न 23. पलायन वेग तथा कक्षीय वेग में सम्बन्ध प्राप्त कीजिए।
उत्तर : पलायन वेग तथा कक्षीय वेग में सम्बन्ध–किसी पिण्ड को पृथ्वी से पलायन करने के लिए, पृथ्वी-तल से प्रक्षेपित करने का वेग
यह पलायन वेग तथा कक्षीय वेग में सम्बन्ध है।
प्रश्न 25. समान्तर अक्षों की प्रमेय लिखिए।
उत्तर : समान्तर अक्षों की प्रमेय—किसी पिण्ड का किसी अक्ष के परितः . जड़त्व-आघूर्ण (I), उस पिण्ड के द्रव्यमान-केन्द्र (centre of mass) से होकर जाने वाली एक अन्य समान्तर अक्ष के परितः जड़त्व-आघूर्ण (Icm) तथा पिण्ड के द्रव्यमान व दोनों अक्षों के बीच की लम्ब-दूरी के वर्ग के गुणनफल के योग के बराबर होता है। इस प्रकार
I = Icm + Mh2
जहाँ M पिण्ड का द्रव्यमान तथा h दोनों अक्षों के बीच की लम्ब-दूरी है।
प्रश्न 26. पुरस्सरण गति क्या है? लट्ट के लिए पुरस्सरण कोणीय वेग का सूत्र दीजिए।
उत्तर : पुरस्सरण गति— जब किसी घूमते हुए पिण्ड पर कोई ऐसा बलाघूर्ण लगाया जाता है जिसकी अक्ष पिण्ड की घूर्णन-अक्ष के लम्बवत् है, तब पिण्ड के घूर्णन की दर तो नियत रहती है परन्तु घूर्णन-अक्ष की दिशा बदलती रहती है। घूर्णन-अक्ष के इस घूमने को ‘पुरस्सरण गति’ कहते हैं। वह अक्ष जिसके परितः पिण्ड की घूर्णन-अक्ष की दिशा घूमती है,
पुरस्सरण-अक्ष कहलाती है।
प्रश्न 27. प्रत्यास्थता की परिभाषा दीजिए।
उत्तर : वस्तु के इस गुण को जिसके कारण वह किसी विरूपक बल के द्वारा उत्पन्न साइज या रूप में होने वाले परिवर्तन का विरोध करती है तथा विरूपक बल को हटा लिए जाने पर अपनी पूर्व अवस्था को प्राप्त कर लेती है, प्रत्यास्थता कहते हैं।
प्रश्न 28. यंग प्रत्यास्थता गुणांक तथा आयतनात्मक प्रत्यास्थता गुणांक की परिभाषा दीजिए।
उत्तर : यंग प्रत्यास्थता गुणांक-“प्रत्यास्थता की सीमा में, किसी वस्तु में उत्पन्न अनुदैर्ध्य प्रतिबल तथा उसके संगत उत्पन्न अनुदैर्घ्य विकृति के अनुपात को उस वस्तु के पदार्थ का यंग प्रत्यास्थता गुणांक कहते हैं।” इसे ‘Y’ से प्रदर्शित करते हैं।
आयतनात्मक प्रत्यास्थता गुणांक- “प्रत्यास्थता की सीमा में वस्तु में उत्पन्न अभिलम्ब प्रतिबल तथा आयतन विकृति के अनुपात को उस वस्तु के पदार्थ का आयतनात्मक प्रत्यास्थता गुणांक कहते हैं।” इसे ‘B’ से प्रदर्शित करते हैं।
प्रश्न 29. हुक का नियम क्या है?
उत्तर : हुक का नियम– सन् 1679 ई० में रॉबर्ट हुक ने यह बताया कि “लघु विकृतियों की सीमा के भीतर, पदार्थ में उत्पन्न विकृति पदार्थ पर कार्यरत प्रतिबल के अनुक्रमानुपाती होती है।” किसी दी हुई वस्तु के पदार्थ के लिए प्रतिबल तथा विकृति का अनुपात एक नियतांक (E) होता है। इस प्रकार
प्रश्न 30. बंकन आघूर्ण समझाइए।
उत्तर : जब कोई दण्ड बाह्य बलयुग्म द्वारा मोड़ा जाता है तो उसके प्रत्येक अनुप्रस्थ काट पर प्रत्यास्थता के कारण, एक आन्तरिक प्रत्यानयन बलयुग्म उत्पन्न हो जाता है। साम्यावस्था में, प्रत्यानयन बलयुग्म, बाह्य बलयुग्म के बराबर एवं विपरीत होता है। प्रत्यानयन बलयुग्म के आघूर्ण को बंकन आघूर्ण कहते हैं तथा यह बाह्य बलयुग्म के बराबर होता है।
प्रश्न 31. इकाई ऐंठन कोण के लिए बल-आघूर्ण C का मान लिखिए।
उत्तर : इकाई ऐंठन कोण के लिए बल-आघूर्ण C का मान , है।
प्रश्न 32. किसी बेलन की मरोड़ी दृढ़ता अथवा ऐंठन दृढ़ता का क्या अर्थ है?
उत्तर : किसी बेलन में एकांक रेडियन ऐंठन कोण उत्पन्न करने के लिए आवश्यक बलयुग्म को उस बेलन की ऐंठन दृढ़ता कहते हैं।
प्रश्न 33. किसी बेलन में 90° ऐंठन उत्पन्न करने हेतु आवश्यक बल-युग्म की गणना कीजिए।
हल : बेलन में क रेडियन की ऐंठन उत्पन्न करने के लिए आवश्यक बल-युग्म
प्रश्न 34. पॉयसन निष्पत्ति से क्या अभिप्राय है? इसका सैद्धान्तिक मान क्या होता है? अथवा पॉयसन निष्पत्ति क्या है? इसका सैद्धान्तिक सीमान्त मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर : प्रत्यास्थता की सीमा में पार्श्व विकृति तथा अनुदैर्घ्य विकृति का अनुपात नियत रहता है, जिसे पॉयसन निष्पत्ति कहते हैं। इसे ‘a’ से प्रदर्शित करते हैं।
पॉयसन निष्पत्ति एक विमाहीन राशि है जिसका कोई मात्रक नहीं होता। यह एक विशुद्ध संख्या है, जिसका मान सैद्धान्तिक रूप से -1 और 0 • 5 के बीच होता हैं।
प्रश्न 35. उदासीन पृष्ठ को परिभाषित कीजिए।
उत्तर : जब किसी दण्ड के सिरों पर बराबर परन्तु विपरीत बलयुग्म लगाते हैं तो दण्ड एक वृत्तीय चाप के रूप में मुड़ जाता है। मुड़ने में, दण्ड के उत्तल पक्ष में स्थित अनुदैर्घ्य तन्तु लम्बाई में विस्तृत हो जाते हैं तथा अवतल पक्ष में स्थित तन्तु लम्बाई में संकुचित हो जाते हैं। परन्तु दण्ड में एक परत ऐसी होती है जिसके तन्तुओं की लम्बाई में कोई परिवर्तन नहीं होता। इस परत को उदासीन पृष्ठ कहते हैं। यह दण्ड की अनुप्रस्थ काटों के केन्द्रों में से होकर गुजरता है।
प्रश्न 36. सिद्ध कीजिए कि जब कोई कण केन्द्रीय बल के अन्तर्गत गति करता है तो कोणीय संवेग नियत रहता है।
उत्तर : जब कोई कण केन्द्रीय बल के अन्तर्गत गति करता है, तो कण पर कोई बलाघर्ण नहीं लगता। अतः कण का बल के केन्द्र के परित: कोणीय संवेग संरक्षित रहता है।
इस निष्कर्ष को गणितीय रूप से सिद्ध करने के लिए, माना कोई कण निम्न केन्द्रीय बल के अन्तर्गत गतिमान है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि केन्द्रीय बल के अन्तर्गत कण का कोणीय संवेग नियत (सरक्षित) रहता है। उदाहरणार्थ, सूर्य के परितः पृथ्वी का कोणीय संवेग तथा हाइड्रोजन परमाणु में नाभिक के परित: इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग संरक्षित रहता है।
प्रश्न 37. बल-आघूर्ण समझाइए।
उत्तर : यदि किसी कण की मूलबिन्दु के सापेक्ष स्थिति सदिश न हो तथा इस पर बल F
कार्यरत हो, तब कण का मूलबिन्दु के सापेक्ष बल-आघूर्ण r व F के सदिश गुणनफल के बराबर होगा अर्थात् r = r x F
प्रश्न 38. केन्द्रीय बल क्या है? ऐसे बलों के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर : केन्द्रीय बल-वह बल जो सदैव एक स्थिर बिन्दु की ओर अथवा उससे दूर स्थित बिन्दु की ओर दिष्ट होता है तथा जिसका परिमाण केवल उस बिन्दु से दूरी पर निर्भर करता है, केन्द्रीय बल कहलाता है। बल कहलाता है। . उदाहरण-गुरुत्वाकर्षण बल, स्थिर वैद्युत बल आदि।
प्रश्न 39. केपलर के ग्रहीय गति के नियम क्या हैं?
उत्तर : केपलर ने खगोलीय प्रेक्षणों के आधार पर ग्रहों की सूर्य के चारों ओर गति के सम्बन्ध में निम्न तीन नियम प्रतिपादित किए हैं
(i) दीर्घवृत्ताकार कक्षाओं का नियम– प्रत्येक ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार कक्षा में परिक्रमण करता है तथा सूर्य कक्षा के एक फोकस पर होता है।
(ii) क्षेत्रों का नियम- किसी भी ग्रह को सूर्य से मिलाने वाली रेखा, अर्थात् ग्रह का सूर्य के सापेक्ष त्रिज्या-वेक्टर, समान समयान्तरालों में समान क्षेत्रफल पार करती है, अर्थात ग्रह की क्षेत्रीय चाल नियत रहती है।
(iii) हार्मोनिक नियम- किसी भी ग्रह का सूर्य के परितः परिक्रमण-काल का वर्ग, दीर्घवृत्ताकर कक्षा की अर्द्ध-दीर्घ अक्ष की तृतीय घात के अनुक्रमानुपाती होता है।
प्रश्न 40. पलायन वेग क्या है?
उत्तर : पलायन वेग-“वह न्यूनतम वेग जिससे किसी पिण्ड को पृथ्वी-तल से ऊपर फेंकने पर वह पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र से बाहर निकल जाए और पृथ्वी पर कभी वापस लौटकर न आ सके,
पिण्ड का पलायन वेग कहलाता है। “इसे ve से प्रदर्शित करते हैं तथा इसकी विमा [LT-1] है। पलायन वेग से फेंकने के लिए पिण्ड को दी गई गतिज ऊर्जा पलायन ऊर्जा कहलाती है।
प्रश्न 41. गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा को परिभाषित कीजिए।
उत्तर : गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा-“किसी पिण्ड को अनन्त से गुरुत्वीय क्षेत्र में किसी बिन्दु तक लाने में गुरुत्वीय क्षेत्र के विरुद्ध कृत कार्य उस बिन्दु पर पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कहलाता है।” चूँकि अनन्त से किसी पिण्ड को पृथ्वी की ओर लाने में कार्य गुरुत्वीय क्षेत्र द्वारा किया जाता है अर्थात् हमें कार्य प्राप्त होता है (करना नहीं पड़ता है) और अनन्त पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा शून्य मानी जाती है इसलिए गुरुत्वीय क्षेत्र के भीतर किसी पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा सदैव ऋणात्मक होती है। यह अदिश राशि है। इसका मात्रक जूल तथा विमीय सूत्र [ML2T-2] है।
प्रश्न 42. गतिपालक चक्र का द्रव्यमान कहाँ संकेन्द्रित होता है?
उत्तर : गतिपालक चक्र का द्रव्यमान चक्र के किनारों पर संकेन्द्रित होता है।
प्रश्न 43. पलायन वेग तथा कक्षीय वेग में सम्बन्ध प्राप्त कीजिए।
प्रश्न 44. एक कृत्रिम उपग्रह में भारहीनता का अनुभव होता है जबकि चन्द्रमा पर भारहीनता का अनुभव नहीं होता है। समझाइए।
उत्तर : यद्यपि चन्द्रमा भी पृथ्वी का एक उपग्रह है, परन्तु चन्द्रमा पर व्यक्ति भारहीनता का अनुभव नहीं करता क्योंकि चन्द्रमा का द्रव्यमान अधिक होने के कारण वह स्वयं व्यक्ति पर गुरुत्वाकर्षण बल लगाता है, यही चन्द्रमा पर व्यक्ति का भार है। कृत्रिम उपग्रह का भार कम होने के कारण वह अन्तरिक्ष यात्री पर कोई गुरुत्व बल नहीं लगाता। अतः कृत्रिम उपग्रह में वस्तु भारहीन होती है।
प्रश्न 45. पृथ्वी के समीप स्थित कक्षा में किसी उपग्रह की बन्धन ऊर्जा क्या होती है?
उत्तर : पृथ्वी के समीप स्थित कक्षा में किसी उपग्रह की बन्धन ऊर्जा GMm/2r होती है।
प्रश्न 46. रॉकेट की गति किस सिद्धान्त पर कार्य करती है?
उत्तर : रॉकेट की गति न्यूटन के गति के तृतीय नियम वं संवेग संरक्षण के सिद्धान्त पर कार्य करती है।
प्रश्न 47. यदि उपग्रह की ऊर्जा शून्य हो तब क्या होगा?
उत्तर : उपग्रह की ऊर्जा शून्य होने पर वह कक्षा से पलायन कर जाता है तथा इसका पथ परवलयाकार होता है।
प्रश्न 48. उपग्रह को परिभाषित कीजिए। कृत्रिम उपग्रह के भीतर भारहीनता क्यों होती है?
उत्तर : उपग्रह- कुछ आकाशीय पिण्ड जो ग्रहों के चारों ओर परिक्रमण करते रहते हैं उपग्रह (satellites) कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमण करता है, अत: यह पृथ्वी का एक उपग्रह है।
कृत्रिम उपग्रह के भीतर भारहीनता-वे उपग्रह जिन्हें मानव प्रयास के द्वारा किसी प्राकृतिक ग्रह अथवा उपग्रह की कक्षा में रखा जाता है, उन्हें कृत्रिम उपग्रह कहते हैं।
किसी वस्तु के भार का अनुभव उस प्रतिक्रिया बल के कारण होता है जो उस वस्तु पर किसी अन्य वस्तु द्वारा लगाया जाता है। उदाहरणार्थ, जब कोई व्यक्ति किसी तल पर खड़ा होता है तो उसे अपने भार का प्रभाव अपने पैरों पर तल की प्रतिक्रिया ‘R’ के कारण होता है। यदि परिस्थितिवश यह प्रतिक्रिया बल R शून्य हो जाए तो व्यक्ति को अपना भार शून्य प्रतीत होगा। यही भारहीनता (weightlessness) की अवस्था कहलाती है। भारहीनता का अनुभव कृत्रिम उपग्रह में बैठे अन्तरिक्ष यात्री को भी होता है।
प्रश्न 49. भू-स्थायी उपग्रह क्या है? इसकी कक्षा की त्रिज्या क्या होती है?
उत्तर : भू-स्थायी उपग्रह-यदि किसी कृत्रिम उपग्रह की ‘वृत्तीय’ कक्षा पृथ्वी के विषुवतीय तल (equatorial plane) में पृथ्वी से इतनी ऊँचाई पर हो कि उपग्रह का परिक्रमण काल ठीक पृथ्वी के अपनी अक्ष के परितः परिक्रमण काल (24 घण्टे) के बराबर हो तो वह उपग्रह पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर रहेगा। इस प्रकार के उपग्रह को भू-स्थायी अथवा तल्यकाली उपग्रह (geostationary satellite) कहते हैं। यह उपग्रह किसी निश्चित स्थान के सापेक्ष स्थिर रहते हुए वहाँ के चित्र पृथ्वी को भेज सकता है। इस प्रकार के उपग्रह से टेलिविजन सिगनलों (T.V. Signals) को परावर्तित करके विभिन्न कार्यक्रमों को सुदूर स्थित टेलिविजन सैटों पर दिखाया जाता है। भूस्थायी उपग्रह की कक्षा की त्रिज्या लगभग 42164 किमी होती है।
प्रश्न 50. सरल आवर्त गति की परिभाषा दीजिए।
उत्तर : जब कोई वस्तु अपनी साम्य स्थिति के दोनों ओर. एक सरल रेखा में इस प्रकार दोलनी गति करती है कि उस पर कार्यरत बल वस्तु के विस्थापन के अनुक्रमानुपाती हो तथा सदैव साम्य स्थिति की ओर दिष्ट हो, तब वस्तु की यह गति सरल आवर्त गति कहलाती है।
यदि सरल आवर्त गति करती वस्तु का किसी क्षण विस्थापन y तथा उस पर कार्यरत बल हो तो
प्रश्न 51. त्वरित गति से नीचे आती लिफ्ट में स्थित लोलक के आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर : जब लिफ्ट त्वरित गति से नीचे आती है; तब ‘g’ का प्रभावी मान घट जाता है तथा लोलक का आवर्तकाल बढ़ जाता है।
प्रश्न 52. यदि लिफ्ट की डोरी टूट जाए तो लिफ्ट की छत से लटके हुए लोलक का आवर्तकाल क्या होगा?
उत्तर : यदि लिफ्ट की डोरी टूट जाए, तब लिफ्ट मुक्त पिण्ड की तरह नीचे को गिरेगी तथा ‘g’ का प्रभावी मान शून्य हो जाएगा तथा लोलक का आवर्तकाल अनन्त हो जाएगा।
प्रश्न 53. अवमन्दित दोलन क्या होते हैं? .
उत्तर : यदि किसी दोलन पिण्ड का आयाम समय के साथ घटता जाता है तथा अन्त में पिण्ड अपनी साम्य स्थिति में आकर विराम में आ जाता है तो पिण्ड के दोलनों को अवमन्दित दोलन कहा जाता है तथा क्षयकारी बल को अवमन्दक बल कहते हैं।
प्रश्न 54. मुक्त एवं प्रणोदित दोलनों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : मुक्त दोलन (Free oscillations)–यदि किसी दोलन कर सकने वाली वस्तु को उसकी मध्यमान स्थिति से विस्थापित कर छोड़ दिया जाए तो वस्तु दोलन करने लगती है। इस प्रकार के दोलनों को मुक्त दोलन कहते हैं तथा इनकी आवृत्ति वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति कहलाती है। यदि माध्यम में घर्षण न हो तो वस्तु अपने प्रारम्भिक आयाम से ही दोलन करती रहेगी, परन्तु माध्यम में घर्षण बल लगने से मुक्त दोलनों का आयाम लगातार कम होता जाता है और अन्त में शून्य हो जाता है। इस प्रकार के दोलनों को अवमंदित दोलन कहते हैं।
प्रणोदित दोलन (Forced oscillations)-जब किसी वस्तु पर कोई बाह्य आवर्त बल लगाया जाता है तो प्रारम्भ में वस्तु अपनी स्वाभाविक आवृत्ति से दोलन करती है परन्तु शीघ्र ही वस्तु, लगाए गए बल की आवृत्ति से दोलन करने लगती है। इस प्रकार के दोलनों को प्रणोदित अथवा अध्यारोपित दोलन कहते हैं। दोलन करने वाले निकाय को प्रणोदित आवर्त दोलक तथा बाह्य बल को प्रणोदी बल कहते हैं। प्रायः प्रणोदित दोलनों का आयाम कम होता है, परन्तु यदि लगाए गए बल की आवृत्ति, वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो तो वस्तु के प्रणोदित दोलनों का आयाम बहुत बड़ा हो जाता है। इस घटना को अनुनाद कहते हैं। यदि बाह्य बल और वस्तु की आवृत्ति में थोड़ा-सा ही अन्तर होने पर आयाम बहुत कम हो जाता है तो इसे तीक्ष्ण अनुनाद और यदि आयाम थोड़ा-सा ही कम होता है तो इसे स्पष्ट अनुनाद कहते हैं।
प्रश्न 55. एक अवमन्दित आवर्ती दोलन के लिए गुणता कारक व श्रांतिकाल को परिभाषित कीजिए।
उत्तर : अवमन्दित आवर्ती दोलन के लिए गुणता कारक व श्रांतिकाल जब हम किसी लोलक को साम्य स्थिति से विस्थापित करके छोड़ते हैं तो यह दोलन करने लगता है। इन दोलनों का आयाम घटता जाता है और अन्त में लोलक साम्य स्थिति में आकर ठहर जाता है। ऐसे दोलनों को ‘अवमंदित (damped) दोलन‘ कहते हैं तथा क्षयकारी बल को ‘अवमंदक (damping) बल‘ कहते हैं।
गुणता कारक (Quality Factor)-किसी दोलित्र का गुणता कारक Q, दोलित्र की ऊर्जा-क्षय की दर को निरूपित करता है। यह दोलित्र में संचित ऊर्जा तथा प्रति दोलनकाल क्षय-ऊर्जा के अनुपात का 2pie गुना होता है, अर्थात् . .
स्पष्ट है कि गुणता कारक Q एक विमाहीन राशि है। अवमंदन (damping) जितना अधिक होगा, प्रति दोलनकाल ऊर्जा-क्षय भी उतना ही अधिक होगा तथा Q उतना ही कम होगा।
श्रांतिकाल (Relaxation Time)—जितने समयान्तराल में दोलित्र की यांत्रिक ऊर्जा क्षय होकर अपने प्रारम्भिक मान का 1/e रह जाती है, उसे दोलित्र का ‘श्रांतिकाल’ कहते हैं।
प्रश्न 56. प्रणोदित दोलनों में आयाम अनुनाद क्या है? इसकी तीक्ष्णता क्या है?
उत्तर : आयाम अनुनाद— प्रणोदित आवृत्ति के उन मानों पर जो कि दोलित्र की स्वाभाविक आवृत्ति के लगभग बराबर है, किसी विशेष आवृत्ति के लिए दोलनों का आयाम अधिकतम होता है। आयाम के अधिकतम हो जाने की घटना को ‘आयाम अनुनाद’ कहते हैं।
अनुनाद की तीक्ष्णता— प्रणोदित दोलनों का आयाम तब. अधिकतम होता है जब आरोपित बल की आवृत्ति अनुनाद की शर्त को सन्तुष्ट करती है। जब आवृत्ति के अनुनादी मान से थोड़ा ही बदलने पर आयाम में काफी अधिक कमी हो जाती है, तो अनुनाद ‘तीक्ष्ण’ कहा जाता है।
प्रश्न 57. त्वरित गति से ऊपर जाती लिफ्ट में स्थित लोलक के आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर : जब किसी लिफ्ट में एक लोलक स्थित हो तथा लिफ्ट त्वरित गति से ऊपर जा रही हो, तब ‘g’ का मान बढ़ जाता है फलस्वरूप लोलक का आवर्तकाल घट जाता है।
प्रश्न 58. अप्रगामी तरंग किसे कहते हैं? एक अप्रगामी तरंग की समीकरण लिखिए। निस्पंदों तथा प्रस्पंदों की स्थितियाँ बताइए।
उत्तर : जब दो एकसमान अनुप्रस्थ अथवा अनुदैर्घ्य प्रगामी तरंगें किसी बद्ध माध्यम में परस्पर विपरीत दिशाओं में गति करती हैं तो उनके परस्पर अध्यारोपण के फलस्वरूप माध्यम में एक नई प्रकार की तरंग उत्पन्न होती है जो माध्यम में किसी भी दिशा में गति नहीं करती अपितु अपने ही स्थान पर स्थिर प्रतीत होती है, इस तरंग को अप्रगामी तरंग कहते हैं। ,
प्रश्न 59. दो तरंगों की तीव्रताओं में अनुपात 16 : 9 है। यदि ये दो तरंगें व्यतिकरण करें तो अधिकतम व न्यूनतम तीव्रताओं का अनुपात ज्ञात कीजिए।
प्रश्न 60. व्यतिकरणं व विस्पन्द में अन्तर पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : व्यतिकरण व विस्पन्द में अन्तर-जब व्यतिकरण में भाग लेने वाली दो ध्वनियों की आवृत्तियाँ ठीक बराबर होती हैं तो किसी बिन्दु पर उनमें कालान्तर नियत रहता है। अत: उस बिन्दु पर ध्वनि की तीव्रता भी नियत रहती है। इस प्रकार, एकान्तर क्रम में बने अधिकतम व न्यूनतम तीव्रता के ध्वनि क्षेत्र स्थिर होते हैं। दूसरे शब्दों में, व्यतिकरण प्रतिरुप स्थिर बना रहता है। इस घटना को केवल व्यतिकरण कहते हैं।
परन्त यदि दोनों तरंगों की आवृत्तियों में कुछ अन्तर है तो किसी भी बिन्दु पर उनके बीच कालान्तर समय के साथ परिवर्तित होता रहता है। यदि किसी विशेष क्षण पर दोनों तरंगें एक ही कला में हैं तो थोड़े समय पश्चात्, जब उनमें आधे कम्पन्न का अन्तर हो जाता है तो वे विपरीत कला में हो जाते हैं। यही क्रम चलता रहता है। इस प्रकार ये तरंगें एक ही बिन्दु पर एकान्तर क्रम में अधिकतम तथा न्यूनतम तीव्रता उत्पन्न करती है। यह ‘समय में व्यतिकरण’ होने की घटना है जिसे ‘विस्पन्द‘ कहते हैं। –
प्रश्न 61. अप्रगामी तरंगों के गुण बताइए।
उत्तर : (1) तरंग में विक्षोभ एक विशेष क्षेत्र में (प्रारम्भ बिन्दु व परावर्तन बिन्द) बँधे होते हैं।
(2) अप्रगामी तरंग से सम्बद्ध कुल ऊर्जा, प्रत्येक आपतित तथा परावर्तित तरंग की ऊर्जा से दोगुनी होती है। लेकिन अप्रगामी तरंग के अनुदिश ऊर्जा का प्रवाह या स्थानान्तरण नहीं होता है।
(3) अप्रंगोमी तरंग में कुछ बिन्दु सदैव विश्राम में रहते हैं उन्हें निस्पंद कहते हैं तथा दो क्रमागत निस्पंदों के बीच की दूरी 2/2 होती है।
(4) अप्रगामी तरंगों में कुछ बिन्दुओं पर आयाम सदैव अधिकतम होता है। इन बिन्दुओं
को प्रस्पंद कहते हैं। किन्हीं दो लगातार निस्पंद व प्रस्पंद के बीच की दूरी 2/4 होती है।
(5) निस्पंदों पर स्थित कणों के अतिरिक्त सभी कण सरल आवर्त गति करते हैं।
(6) जब कोई कण अपनी माध्य स्थिति से गुजरता है तो उसका वेग प्रस्पंदों पर अधिकतम व निस्पंदों पर शून्य होता है।
(7) एक ही क्षेत्र के सभी कण समान कला में कम्पन करते हैं तथा दो लगातार क्षेत्रों के कण कला में 180° के अन्तर पर होते हैं।
प्रश्न 62. लिस्साजू चित्र क्या होते हैं? लिस्साजू चित्रों के क्या उपयोग हैं?
उत्तर : लिस्साजू चित्र-जब किसी कण पर दो परस्पर लम्बवत् सरल आवर्त गतियाँ एक साथ अध्यारोपित होती हैं तो कण का परिणामी पथ लिस्साजू चित्र कहलाता है। लिस्साजू चित्रों के निम्नलिखित उपयोग हैं
(1) यदि दो कम्पायमान निकायों की आवृत्तियों में अनुपात कोई पूर्णांक हो तो लिस्साजू आकृति देखकर यह अनुपात तुरन्त ज्ञात हो जाता है।
(2) इनके द्वारा लगभग समान आवृत्ति के दो स्वरित्र द्विभुजों को ठीक समस्वरित कर सकते हैं।
(3) दो सरल आवर्त गतियों की आवृत्तियों की तुलना करने में।
(4) कपड़ा उद्योग में नए-नए डिजाइन विकसित करने में।
(5) छड़ों के कम्पनों के अध्ययन में।
प्रश्न 63. ध्वनिक प्रतिबाधा क्या है?
उत्तर : ध्वनिक प्रतिबाधा-जब कोई ध्वनिक (अनुदैर्ध्य) तरंग किसी माध्यम में संचरित होती है तो माध्यम के एक कण से दूसरे कण पर दाब परिवर्तित होता रहता है। माध्यम के किसी कण पर तात्क्षणिक दाब-आधिक्य तथा उस कण के तात्क्षणिक वेग को निष्पत्ति को माध्यम की ध्वनिक प्रतिबाधा कहते हैं। इस प्रकार
BSc Botany Economic Importance Of Lichens Question Answer Notes